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लोक संस्कृति से जुड़े रहने को आवाज लगाती डोल्लू

वास्तव में यह फिल्म कर्नाटक के ही किसी गांव की नहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या राजस्थान के किसी भी गांव की हो सकती है, जो आज युवाओं से लगभग खाली हो चुके हैं, वे रोजी-रोटी के लिए महानगर का रुख कर चुके हैं। जाहिर है कि गांवों की परंपराएं दम तोड़ रही हैं। यह फिल्म युवा वर्ग से गांव लौटने की भावुक जिद तो नहीं करती, लेकिन गांव से जुड़े रहने का संदेश जरूर देती है।     '

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Sep 01, 2024

विनोद अनुपम
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार प्राप्त कला समीक्षक

दक्षिण भारत में मंदिर नृत्य संगीत के केंद्र माने जाते रहे हैं। खास बात यह भी कि हरेक कला किसी न किसी धार्मिक कथानक से जुड़ी है। शायद आरंभिक दिनों में शास्त्रीय कला के प्रति आम जन को आकर्षित करने के लिए धार्मिक कथानकों का सहारा लिया होगा, जैसे कि दादा साहब फाल्के ने सिनेमा को आमजन में लोकप्रिय बनाने के लिए शुरुआत में अधिकतर फिल्में धार्मिक कथानकों पर ही बनाईं। कर्नाटक के उत्तरी भाग के कुरबा समुदाय में ऐसा ही एक नृत्य प्रचलित है, डोल्लू कुनीथा, जो एक खास वाद्ययंत्र डोल्लू के रिद्म पर किया जाता है।
डोल्लूू की कहानी भगवान शंकर से जुड़ी है, कथा के अनुसार डोल्लू एक अत्याचारी राक्षस था, लेकिन उसने तपस्या कर भगवान शंकर को प्रसन्न कर लिया और उनसे अमर होने का वरदान मांगा। भगवान शंकर ने इस वरदान को देने में असमर्थता जताई और कहा कि प्रकृति के नियम को भंग करना उनके अधिकार में भी नहीं। तो डोल्लू ने कहा आप मेरे उदर में समा जाओ। भगवान ने सूक्ष्म रूप धरा और डोल्लू ने उन्हें निगल लिया। तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। भगवान शंकर ने सोचा अब सबक सिखाने की मेरी बारी, उन्होंने पेट में ही अपना आकार बड़ा करना शरू किया। इतना बडा कि डोल्लू का पेट फट गया और भगवान बाहर आ गए। उन्होंने डोल्लू के चमड़े से एक वाद्ययंत्र बनाया और अपने भक्तों को दे दिया कि जाओ, जब भी इसे बजाकर मुझे बुलाओंगे, मैं तुम्हारे पास आऊंगा। डोल्लू बजाने और उसके साथ नृत्य की परंपरा वहां भगवान शंकर के रूप बीरेश्वरा के मंदिरों में आज भी चल रही है। आधुनिकता और भौतिक सुख की चाह ने आने वाली पीढिय़ों को जिस तरह अपनी परंपराओं से दूर किया है, डोल्लू कुनीथा भी उससे अलग नहीं। कन्नड़ फिल्म 'डोल्लू' इसी विडंबना को पूरी संवेदना से रेखांकित करती है। वर्ष 2022 में सर्वश्रेष्ठ कन्नड़ फिल्म के 'राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार' से इसे सम्मानित भी किया गया था।
कहानी युवा डोल्लू नर्तक भद्रा की है, जिसे बचपन से ही पिता ने डोल्लू की पवित्रता और परंपरा की सीख दी है। भद्रा परंपरा के रूप में इसे स्वीकार करता है और इसे अपने मंदिर के वार्षिक समारोह में जारी रखना चाहता है। लेकिन डोल्लू के लिए 10 से 15 लोगों का दल चाहिए, जबकि उसके साथ बचपन में अभ्यास करने वाले सभी साथी एक-एक कर कमाई के लिए गांव छोड़ बेंगलूरु निकल चुके हैं। भद्रा बेंगलूरु जाकर उनसे मिलता है और कहता है साल भर तो तुम्हारे हैं, बस साल में चार दिन अपने गांव, अपने मंदिर और अपने डोल्लूू को दे दो, लेकिन कोई तैयार नहीं होता। गांव के बुजुर्ग मान लेते हैं कि यह परंपरा अब खत्म हो जाएगी। लेकिन, भद्रा परंपरा बचाने की राह निकालता है। जिन महिलाओं और दलितों को डोल्लू के दल में शामिल नहीं किया जाता था, उन्हें वह साथ लेता है और उसी उत्साह के साथ पूरा गांव डोल्लू के प्रदर्शन में शामिल होता है।
आमतौर पर जब एक-एक कर लोककलाएं हमारे हाथों से फिसलती जा रही हैं, डोल्लू को बचाने की जिद संतोष देती है। डोल्लू को लोककला संरक्षण के एक अभियान के रूप में देखा दिखाया जाना चाहिए। वास्तव में यह फिल्म कर्नाटक के ही किसी गांव की नहीं, बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश या राजस्थान के किसी भी गांव की हो सकती है, जो आज युवाओं से लगभग खाली हो चुके हैं, वे रोजी-रोटी के लिए महानगर का रुख कर चुके हैं। जाहिर है कि गांवों की परंपराएं दम तोड़ रही हैं। यह फिल्म युवा वर्ग से गांव लौटने की भावुक जिद तो नहीं करती, लेकिन गांव से जुड़े रहने का संदेश जरूर देती है। '

Published on:
01 Sept 2024 09:26 pm
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