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बोतलबंद पानी के बढ़ते कारोबार के बीच जल संकट

पानी का असली महत्त्व तब है, जब वह सबके लिए सहज और सुरक्षित रूप से उपलब्ध हो। यदि पानी भी केवल ब्रांड और बोतलों तक सीमित हो गया, तो यह केवल संसाधन का नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच का भी संकट होगा। सरकारी स्तर पर भी शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना बड़ी जिम्मेदारी है। जल शोधन संयंत्रों को प्रभावी बनाना, पाइपलाइन व्यवस्था को दुरुस्त रखना और पानी की नियमित जांच करना अत्यंत आवश्यक है।

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May 19, 2026
drinking water

स्वच्छ-सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता में भारत की स्थिति चिंताजनक

डॉ. ईश मुंजाल
(पूर्व सदस्य, राजस्थान मेडिकल काउंसिल)

कभी सहज और सदैव मुफ्त उपलब्ध होने वाला पानी अब बीते जमाने की कहानी बन चुका है। जीवन का आधार कहे जाने वाले नदी, कुएं और तालाब स्वत: ही कम नहीं हो रहे, बल्कि इन्हें खत्म किया जा रहा है। अब हालात ऐसे बदल गए हैं कि बोतलों में बंद पानी एक बड़ा कारोबार बन चुका है। शुद्धता के नाम पर कहें या बदलती जीवनशैली का असर, पानी भी अब ‘ब्रांड’ बनकर खूब बेचा-खरीदा जा रहा है। भारत स्वच्छ और सुरक्षित पेयजल की उपलब्धता के मामले में 122 देशों में से 120वें स्थान पर है। स्वच्छ व सुरक्षित पेयजल के हिसाब से यह स्थिति वास्तव में चिंताजनक है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, देश में 60 करोड़ से अधिक लोग पानी की गंभीर कमी का सामना कर रहे हैं और 2030 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी हो सकती है। दुनिया में सबसे साफ पेयजल वाले शीर्ष 10 देश सभी यूरोप में हैं। स्विट्जरलैंड दुनिया में सबसे स्वच्छ और सुरक्षित पीने योग्य नल के पानी के लिए जाना जाता है।
भारत में पानी की गुणवत्ता और आपूर्ति से जुड़ी गंभीर चुनौतियां बनी हुई हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में पीने के पानी का 85 प्रतिशत हिस्सा भूजल से प्राप्त होता है। कई शहर और गांव अभी भी बिना उपचारित जल स्रोतों पर निर्भर हैं। एक सर्वेक्षण में पाया गया कि केवल 5 प्रतिशत भारतीय घरों को ही स्थानीय आपूर्ति से पीने योग्य गुणवत्ता वाला पानी मिलता है, जबकि 65 प्रतिशत लोग घरेलू जल शोधक (आरओ, फिल्टर, उबालना) का उपयोग करते हैं। एक अनुमान के मुताबिक सुरक्षित पानी की अपर्याप्त उपलब्धता के कारण हर साल लगभग दो लाख लोगों की मृत्यु हो जाती है। पानी कोई विलासिता नहीं है, कोई ’इच्छा’ नहीं है और न ही केवल जीवनशैली में सुधार लाने का साधन है। यह जीवन की मूलभूत आवश्यकता है। जब कोई देश जल उपलब्धता सुनिश्चित करने में विफल होता है, तो वह शासन के सबसे बुनियादी स्तर पर विफल माना जाता है।
बोतलबंद पानी के कारोबार की असली शुरुआत तब हुई, जब लोगों का भरोसा सार्वजनिक जल आपूर्ति पर कम होने लगा। पाइपलाइन का दूषित पानी, नदियों का प्रदूषण और भूजल की खराब गुणवत्ता ने लोगों को सुरक्षित विकल्प तलाशने पर मजबूर किया। इसी खाली जगह को बाजार ने पकड़ लिया और कंपनियों ने शुद्ध पानी के नाम पर बोतलबंद पानी बेचना शुरू कर दिया। हालांकि प्लास्टिक की बोतलों में लंबे समय तक रखा गया पानी पूरी तरह सुरक्षित नहीं माना जा सकता। खासकर जब बोतलें धूप या अधिक तापमान के संपर्क में आती हैं, तब प्लास्टिक के कुछ रसायन पानी में घुलने का खतरा बढ़ जाता है। कई बार बोतलें लंबे समय तक गोदामों या दुकानों में पड़ी रहती हैं और उनकी गुणवत्ता पर पर्याप्त निगरानी नहीं होती। ऐसे में शुद्धता का दावा कमजोर पड़ जाता है।
नदियां, कुएं और तालाब केवल पानी के स्रोत नहीं, बल्कि हमारी विरासत भी हैं। यदि इन्हें बचाने की दिशा में गंभीर प्रयास नहीं किए गए, तो आने वाली पीढिय़ों के लिए ये केवल इतिहास की बातें बनकर रह जाएंगी। इसलिए यह समय चेतने का है, ताकि जल स्रोत केवल कम न हों, बल्कि फिर से जीवनदायी बन सकें। पानी शुद्ध हो, इसके प्रयास युद्धस्तर पर किए जाएं और दूषित पेयजल की सप्लाई रोकी जाए। जरूरत इस बात की है कि सरकारें सार्वजनिक जल व्यवस्था को मजबूत करें और समाज भी अपने पारंपरिक जल स्रोतों को बचाने की दिशा में सक्रिय प्रयास करे। भारत में वर्षा जल संचयन कोई नई अवधारणा नहीं है। पुराने समय में गांवों में तालाब, जोहड़, कुएं और बावडिय़ां इसी उद्देश्य से बनाए जाते थे, ताकि बारिश का पानी सहेजा जा सके।

पिछले कुछ समय से सरकारों ने वाटर हार्वेस्टिंग को अनिवार्य बनाने की दिशा में कदम उठाए हैं। कई राज्यों में नए भवनों के निर्माण के समय वर्षा जल संचयन प्रणाली लगाना जरूरी कर दिया गया है। स्कूलों, सरकारी इमारतों और कॉलोनियों में भी इस व्यवस्था को लागू करने की कोशिश की जा रही है। हालांकि कागजों पर यह व्यवस्था काफी व्यापक दिखाई देती है, लेकिन जमीन पर इसकी स्थिति अभी भी संतोषजनक नहीं कही जा सकती। इसे भी प्रभावी ढंग से लागू किया जाना चाहिए। पानी का असली महत्त्व तब है, जब वह सबके लिए सहज और सुरक्षित रूप से उपलब्ध हो। यदि पानी भी केवल ब्रांड और बोतलों तक सीमित हो गया, तो यह केवल संसाधन का नहीं, बल्कि व्यवस्था और सोच का भी संकट होगा। सरकारी स्तर पर भी शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराना बड़ी जिम्मेदारी है। जल शोधन संयंत्रों को प्रभावी बनाना, पाइपलाइन व्यवस्था को दुरुस्त रखना और पानी की नियमित जांच करना अत्यंत आवश्यक है।

Published on:
19 May 2026 04:14 pm
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