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अविनाश जोशी, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार
शब्द ही शक्ति हैं। यह सत्य जीवन के हर क्षेत्र में प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया जा सकता है। शब्द न केवल संवाद का माध्यम हैं, बल्कि वे मन को आकार देते हैं, रिश्तों को मजबूत या कमजोर करते हैं और कभी-कभी पूरे समाज को परिवर्तित कर देते हैं। प्राचीन काल से ही शब्दों की महिमा गाई जाती रही है। वेदों और उपनिषदों में कहा गया है कि ‘वाक्’ ही ब्रह्म का रूप है। शब्दों के बिना न सोचना संभव है और न ही कोई कार्य। एक सकारात्मक शब्द व्यक्ति को हताशा के गर्त से निकाल सकता है, जबकि कटु शब्द ऐसा घाव दे सकता है, जो वर्षों तक भरता नहीं। उदाहरणस्वरूप, महात्मा गांधी ने अपने शब्दों से अहिंसा का संदेश फैलाया और ब्रिटिश साम्राज्य को झुकने पर मजबूर कर दिया। उनके ‘सत्याग्रह’ और ‘रामराज्य’ जैसे शब्द आज भी प्रेरणा स्रोत हैं। शब्दों की यह शक्ति इसलिए है, क्योंकि वे भावनाओं को जगाते हैं और विचारों को दिशा प्रदान करते हैं। मनोविज्ञान में भी सिद्ध है कि सकारात्मक भाषा मस्तिष्क में डोपामाइन जैसे रसायनों को सक्रिय करती है, जो खुशी और ऊर्जा का संचार करते हैं। दैनिक जीवन में शब्दों का प्रभाव सर्वाधिक स्पष्ट दिखाई देता है। माता-पिता का एक प्रोत्साहनपूर्ण वाक्य बच्चे के आत्मविश्वास को दोगुना कर देता है। वहीं, बार-बार की नकारात्मक टिप्पणी उसे हीन भावना का शिकार बना सकती है। कार्यस्थल पर बॉस का सराहनीय शब्द कर्मचारी को अधिक उत्पादक बनाता है।
शोध बताते हैं कि प्रशंसा से प्रेरित टीम 30 प्रतिशत अधिक कुशलता दिखाती है। लेकिन इसका उल्टा होने पर एक अनावश्यक आलोचना रिश्ते तोड़ सकती है। विवाह परामर्श में 70 प्रतिशत मामले शब्दों के दुरुपयोग से उत्पन्न होते हैं। इसलिए कहा जाता है कि बोले गए शब्द तीर के समान है- एक बार निकल जाएं, तो लौटकर नहीं आते। सोच-समझकर बोलना ही शब्दों की सच्ची शक्ति को समझने का माध्यम है। शब्दों की शक्ति राजनीति और सामाजिक परिवर्तन में भी देखी जा सकती है। नेताओं के भाषण इतिहास रचते हैं। नेल्सन मंडेला ने ‘मुक्ति’ के शब्दों से रंगभेद के खिलाफ संघर्ष को नई ऊर्जा दी। भारत में स्वामी विवेकानंद के शिकागो भाषण ने ‘बहनों और भाइयों’ कहकर विश्व को हिंदू दर्शन से परिचित कराया। आधुनिक समय में सोशल मीडिया पर एक वायरल पोस्ट लाखों लोगों को प्रभावित कर सकती है। ‘मी टू’ अभियान के शब्दों ने महिलाओं के खिलाफ उत्पीडऩ को वैश्विक मुद्दा बना दिया। लेकिन खतरा भी उतना ही बड़ा है। फेक न्यूज या भडक़ाऊ भाषण दंगे भडक़ा सकते हैं। 2020 के अमेरिकी दंगे या भारत के कई सांप्रदायिक तनाव शब्दों के विषैले प्रयोग का परिणाम रहे हैं। अत: शब्दों का चयन जिम्मेदारी से करना आवश्यक है।
आध्यात्मिक दृष्टि से शब्द परम शक्ति के सृजनकर्ता हैं। भगवतगीता में श्रीकृष्ण कहते हैं, ‘शब्दों से ही विश्व की रचना हुई।’ मंत्रों का जाप शब्दों की कंपन से चमत्कार करता है। ओमकार का उच्चारण मन को शांत करता है, यह वैज्ञानिक रूप से भी सिद्ध है। ध्यान में प्रयुक्त शब्द ब्रेनवेव्स को अल्फा अवस्था में ले जाते हैं, जो तनाव कम करती है। योगी और संत शब्दों को अस्त्र मानते हैं। तुलसीदास ने रामचरितमानस में लिखा है—
विनय न करइ न तप न तपस्वी।
बिनु वचन भजन न होइ रघुनाथजी॥
अर्थात् शब्द ही भक्ति का आधार हैं। आधुनिक न्यूरो-साइंस भी पुष्टि करती है कि बोले गए शब्द क्वांटम स्तर पर प्रभाव डालते हैं। सकारात्मक अफर्मेशन्स से डीएनए तक परिवर्तन संभव है। इस प्रकार शब्द न केवल बाहरी जगत को, बल्कि आंतरिक आत्मा को भी परिवर्तित करते हैं।
साहित्य और कला में शब्द राजा हैं। कविता, कहानी या उपन्यास शब्दों के जाल से जीवंत हो उठते हैं। प्रेमचंद के गोदान ने ग्रामीण भारत की पीड़ा को शब्द दिए। कबीर के दोहे आज भी प्रासंगिक हैं, क्योंकि उनके शब्द सीधे हृदय को भेदते हैं—
‘बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिल्या कोय।
जो मन देखा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥’
यह पंक्ति आत्मपरिवर्तन का संदेश देती है। पत्रकारिता में शब्द सत्य का आईना होते हैं। एक सशक्त संपादकीय नीतियां बदल सकता है। लेकिन जिम्मेदार पत्रकार ही शब्दों की सही शक्ति समझते हैं। फर्जी खबरें विश्वास तोड़ती हैं। इसलिए लेखन में शुद्धता अनिवार्य है।
व्यक्तिगत विकास में शब्दों का योगदान अपार है। मोटिवेशनल स्पीकर्स शब्दों से लाखों लोगों को प्रेरित करते हैं। टोनी रॉबिंस कहते हैं, ‘शब्द तुम्हारी वास्तविकता बनाते हैं।’ डायरी लेखन या अफर्मेशन्स से लक्ष्य प्राप्ति आसान हो जाती है। खेल में कोच के शब्द खिलाड़ी को विजेता बनाते हैं। माइकल फेल्प्स ने स्वयं कहा कि उनके कोच के प्रोत्साहनपूर्ण शब्दों ने उन्हें ओलंपिक स्वर्ण दिलाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। व्यापार में नेगोशिएशन शब्दों का खेल है। स्टीव जॉब्स की प्रस्तुतियां शब्दों के जादू से सफल हुईं। इस प्रकार हर क्षेत्र में शब्द सफलता की कुंजी हैं। लेकिन शब्दों की शक्ति का दुरुपयोग भी आम है। ट्रोलिंग और साइबर बुलिंग से युवा अवसादग्रस्त हो रहे हैं। एक कटु टिप्पणी किसी को आत्महत्या जैसे कदम तक ले जा सकती है। स्कूलों में बुलिंग 40 प्रतिशत बच्चों को प्रभावित करती है। राजनीति में भाषणबाजी वोट तो लूटती है, लेकिन विकास नहीं करती। सोशल मीडिया पर हेट स्पीच समाज को विषाक्त बनाती है। इसका उपाय है-ठहराव की शक्ति। प्रतिक्रिया देने से पहले सोचना। जस्टिस ओ. मैल्कम की पुस्तक द पावर ऑफ नॉट रिएक्टिंग यही सिखाती है। गहरी सांस लें, विचार करें, तब बोलें। इससे शब्द सशक्त बनते हैं। बौद्ध दर्शन में मौन को सर्वोच्च शब्द माना गया है।
शिक्षा प्रणाली में शब्दों की भूमिका अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। शिक्षक के शब्द छात्र का भविष्य गढ़ते हैं। सकारात्मक फीडबैक से सीखने की प्रक्रिया तीव्र होती है। राजस्थान जैसे राज्य में, जहां परंपरा और आधुनिकता का मेल है, स्थानीय बोलियां शब्दों को सांस्कृतिक शक्ति प्रदान करती हैं। मारवाड़ी या राजस्थानी के मधुर शब्द रिश्तों को मजबूत करते हैं। लेकिन अंग्रेजी का बढ़ता प्रभाव स्थानीय शब्दों को विस्थापित कर रहा है। इनके संरक्षण की आवश्यकता है। पॉडकास्ट और लेखन के माध्यम से नई पीढ़ी को इनसे जोडऩा होगा। अंतत: कहा जा सकता है कि शब्द ही शक्ति हैं, परंतु उनकी शक्ति उत्तरदायित्वपूर्ण प्रयोग से ही फलित होती है। प्रतिक्रिया न देकर ठहरना और सकारात्मक शब्द चुनना ही सच्ची बुद्धिमत्ता है। दैनिक अभ्यास से शब्दों को अपना सेवक बनाइए, वे आपको विजेता बनाएंगे। जीवन एक कैनवास है और शब्द उसकी रंगत हैं। सावधानीपूर्वक चित्रण से ही अमर कृति रची जा सकती है। यदि इस सत्य को आत्मसात कर लिया जाए, तो सफलता निश्चित है।
Published on:
19 May 2026 04:29 pm
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