बेस ईयर वह स्थिर पैमाना है, जो यह समझने में मदद करता है कि विकास वास्तविक है या कीमतों की बढ़ोतरी का असर है। वर्तमान में जीडीपी की गणना का आधार वर्ष देश में 2011-12 है। वर्ष 2026 देश में जो भी उत्पादन हो रहा है, उसकी तुलना 2011 की कीमतों से की जा रही है।
विजय गर्ग, अर्थशास्त्री
आज के समय में किसी भी देश की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण पत्र उसकी जीडीपी यानी सकल घरेलू उत्पाद को माना जाता है। अक्सर यह सुनाई देता है कि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है। भारत जल्द ही पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने वाला है। ये आंकड़े नि:संदेह उत्साह जगाते हैं। राष्ट्रीय आत्मविश्वास को बढ़ाते हैं, लेकिन इन चमकते हुए आंकड़ों के बीच जब एक आम भारतीय नागरिक अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में झांकता है तो तस्वीर कुछ अलग दिखाई देती है। बाजार में सब्जियों के दाम बढ़े हुए हैं। स्कूल की फीस हर साल ऊपर जा रही है। किराया और दवाओं का खर्च बढ़ता जा रहा है। ऐसे में वह स्वाभाविक रूप से सोचता है कि यदि देश इतनी तेजी से आगे बढ़ रहा है तो उसकी अपनी आर्थिक स्थिति क्यों मजबूत नहीं दिख रही। यहीं से अर्थशास्त्र का एक अपेक्षाकृत कम चर्चित, लेकिन बेहद महत्वपूर्ण शब्द 'बेस ईयर' यानी आधार वर्ष सामने आता है। यह वही बिंदु है, जिसके सहारे अर्थव्यवस्था की असली गति को मापा जाता है।
यदि इसे सरल उदाहरण से समझें तो मान लीजिए कि कोई व्यक्ति हर साल अपनी ऊंचाई मापना चाहता है, लेकिन हर बार अलग-अलग पैमाना इस्तेमाल करता है। तब यह तय करना मुश्किल हो जाएगा कि वास्तव में उसकी ऊंचाई बढ़ी है या पैमाना ही बदल गया है। अर्थव्यवस्था में बेस ईयर वही स्थिर पैमाना है, जो हमें यह समझने में मदद करता है कि विकास वास्तविक है या केवल कीमतों की बढ़ोतरी का असर है। भारत में वर्तमान में जीडीपी की गणना का आधार वर्ष 2011-12 है। इसका अर्थ यह है कि आज वर्ष 2026 में देश में जो भी उत्पादन हो रहा है, उसकी तुलना 2011 की कीमतों से की जा रही है। यही कारण है कि अर्थशास्त्र में नॉमिनल और रियल जीडीपी जैसे शब्द सामने आते हैं। नॉमिनल जीडीपी वह है, जिसमें कीमतों की बढ़ोतरी भी शामिल रहती है, जबकि रियल जीडीपी महंगाई के प्रभाव को हटाकर वास्तविक उत्पादन वृद्धि को दर्शाती है। किसी भी अर्थव्यवस्था के वास्तविक स्वास्थ्य को समझने के लिए रियल जीडीपी अधिक महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसकी गणना पूरी तरह आधार वर्ष पर निर्भर करती है।
समस्या यह है कि अर्थशास्त्र के सामान्य सिद्धांत के अनुसार बेस ईयर को हर पांच से दस वर्ष में बदल देना चाहिए, ताकि आर्थिक संरचना में हुए बदलावों को सही ढंग से मापा जा सके, लेकिन भारत का वर्तमान बेस ईयर लगभग 14 साल पुराना हो चुका है। इन 14 वर्षों में भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति ही बदल गई है। आम नागरिक के लिए यह सवाल स्वाभाविक है कि आधार वर्ष बदलने से उसके जीवन में क्या फर्क पड़ेगा? पहली नजर में यह केवल एक सांख्यिकीय सुधार लगता है, लेकिन इसका असर कई स्तरों पर दिखाई देता है। सही आधार वर्ष से प्रति व्यक्ति आय का अधिक सटीक अनुमान सामने आता है। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि समाज के कौन-से वर्ग वास्तव में आर्थिक रूप से कमजोर हैं और किन्हें सरकारी सहायता की आवश्यकता है। यदि डेटा ही गलत होगा तो लाभार्थियों की पहचान भी गलत हो सकती है।
इसके अलावा, जीडीपी और महंगाई के आंकड़े देश की मौद्रिक नीति को भी प्रभावित करते हैं। भारतीय रिजर्व बैंक इन्हीं संकेतकों को देखकर ब्याज दरों का निर्णय लेता है। यदि विकास और महंगाई का आकलन वास्तविक स्थिति से अलग होगा तो ब्याज दरें भी उसी अनुपात में प्रभावित हो सकती हैं। इसका असर सीधे आम लोगों की ईएमआइ बचत और निवेश पर पड़ता है। सही डेटा से यह भी स्पष्ट होता है कि किस क्षेत्र में आर्थिक गतिविधि बढ़ रही है और कहां रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं? हालांकि, नया बेस ईयर चुनना भी आसान काम नहीं होता।
इसके लिए जरूरी है कि वह वर्ष आर्थिक दृष्टि से अपेक्षाकृत स्थिर रहा हो। उसमें कोई असाधारण संकट या भारी आर्थिक झटका न आया हो। भारत के लिए पिछला दशक कई चुनौतियों से भरा रहा है। उपभोग सर्वेक्षण को लेकर विवाद, वैश्विक आर्थिक उतार-चढ़ाव और फिर कोविड-19 जैसी महामारी ने आर्थिक गतिविधियों को असामान्य रूप से प्रभावित किया। कोविड के दौरान अर्थव्यवस्था में भारी गिरावट आई थी, इसलिए उस वर्ष को आधार बनाना उचित नहीं माना गया। अब कई अर्थशास्त्री मानते हैं कि वर्ष 2022-23 या उसके आसपास का कोई वर्ष नया बेस ईयर हो सकता है, क्योंकि अब आर्थिक गतिविधियां धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौट चुकी हैं। दुर्भाग्य से भारत में आर्थिक आंकड़े कई बार राजनीतिक बहस का हिस्सा बन जाते हैं। सरकारें उन्हें अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत करती हैं और विपक्ष उन पर सवाल उठाता है। इस खींचतान के बीच सबसे बड़ा नुकसान आंकड़ों की विश्वसनीयता को होता है। वास्तव में आर्थिक आंकड़े किसी सरकार के नहीं, बल्कि पूरे देश के होते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय सांख्यिकी प्रणाली को पूरी तरह स्वतंत्र और पारदर्शी तरीके से काम करने दिया जाए।
बेस ईयर को नवीनतम करना केवल एक तकनीकी प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह उस दर्पण को साफ करने जैसा है, जिसमें देश अपनी आर्थिक स्थिति को देखता है। यदि दर्पण धुंधला होगा तो विकास की तस्वीर भी साफ दिखाई नहीं देगी। वर्ष 2011 के आंकड़ों से वर्ष 2026 की अर्थव्यवस्था को समझने की कोशिश कुछ वैसी ही है, जैसे कोई डॉक्टर पुराने मेडिकल रिकॉर्ड के आधार पर आज की बीमारी का इलाज करने लगे। समय की मांग यही है कि भारत अपनी आर्थिक गणना प्रणाली को वर्तमान वास्तविकताओं के अनुरूप नवीनतम करे। जब बेस ईयर सही होगा, तभी विकास की तस्वीर भी स्पष्ट दिखाई देगी।