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नीति नवाचार : जाति जनगणना को लेकर आखिर असमंजस में क्यों है सरकार

- जातिगत जनगणना caste census के लिए भाजपा के अनिच्छुक होने की वजह यह डर है कि इससे क्षेत्रीय दलों को ओबीसी आरक्षण को फिर आकार देने का नया मुद्दा मिल सकता है।- ओबीसी आंकड़े विवाद का पिटारा खोल सकते हैं, जिसे संभालना मुश्किल हो सकता है।
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caste census
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संजय कुमार

(लेखक प्रोफेसर, सीएसडीएस और लोकनीति के सहनिदेशक हैं)

caste census : संविधान निर्माताओं ने भारतीय समाज में मौजूद सामाजिक और आर्थिक असमानता social and economic inequality के उन्मूलन के लिए आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान करके सुरक्षात्मक (caste reservation) उपायों की परिकल्पना की थी। दुख की बात है कि पिछले सात दशकों से ज्यादा समय में आरक्षण राजनीतिक मुद्दा बन गया है। दलितों और आदिवासी समुदायों के लिए आरक्षण कायम है, क्योंकि बड़ी संख्या में दलित और आदिवासी अब भी सामाजिक रूप से शोषित हैं। 1990 के दशक की शुरुआत में वीपी सिंह की अगुवाई वाली राष्ट्रीय मोर्चे की सरकार ने मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू कर ओबीसी के लिए भी आरक्षण विस्तारित किया। ओबीसी को आरक्षण देने के बाद से ओबीसी की गिनती करने की मांग लगातार की जा रही है।

2011 की जनगणना के समय यह मांग उठाई गई थी और 2021 में होने जा रही जनगणना में भी यही मांग उठी है। जाति आधारित जनगणना के लिए जहां क्षेत्रीय दल एकजुट हैं और सरकार पर दबाव बना रहे हैं, तो वहीं भाजपा इससे हिचक रही है। इस मुद्दे पर राय विभाजित प्रतीत होती है। दुख की बात यह है कि शायद ही कोई पार्टी सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचितों के कल्याण में वास्तविक दिलचस्पी लेती हो। वोट बैंक की राजनीति ही इसके विरोध और समर्थन की महत्त्वपूर्ण वजह है।

मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद क्षेत्रीय दल ओबीसी मतदाताओं के बीच काफी लोकप्रिय हुए थे। वे जातिगत जनगणना पर इसलिए जोर देने की कोशिश कर रहे हैं कि उन्हें भरोसा है कि वे ओबीसी हितों के लिए लडऩे वाले दल के रूप में उभरेंगे। मंडल युग के दो दशकों बाद तक कई राज्यों में सत्ता में रहे क्षेत्रीय दलों ने ओबीसी और कट्टर समर्थकों के बीच अपनी लोकप्रियता खोई है। बिहार में राजद और जद (यू), यूपी में समाजवादी पार्टी जैसे दल 1990 के दशक के अंत तक ओबीसी का समर्थन हासिल करने में कामयाब रहे। अब ये दल उसी आधार को फिर हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं।

ओबीसी मतदाताओं की बड़ी संख्या है और क्षेत्रीय दलों में उनका धु्रवीकरण हुआ है। इसलिए भाजपा को 'कमंडल' राजनीति के जरिए 'मंडल' राजनीति का मुकाबला करने में कई वर्ष लगे। 1998 और 1999 में भाजपा ने लोकसभा चुनाव जीता और कुछ क्षेत्रीय सहयोगियों के साथ मिलकर एनडीए सरकार बनाई, लेकिन क्षेत्रीय दलों का प्रभुत्व रहा। इन्हें इन चुनावों में क्रमश: 35.5 प्रतिशत और 33.9 प्रतिशत वोट हासिल हुए थे। यहां यह भी अहम है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में जब भाजपा ने 31 फीसदी वोटों के साथ बहुमत की सरकार बनाई थी, तब भी क्षेत्रीय दलों को 39 प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने ओबीसी मतदाताओं के बीच भारी पैठ बनाई, जिससे क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक में सेंध लग गई। भाजपा को डर है कि अगर सामाजिक न्याय के नाम पर क्षेत्रीय दलों ने आक्रामक लामबंदी की तो ओबीसी समर्थन खिसक सकता है।

मुझे लगता है कि जातिगत जनगणना के लिए भाजपा के अनिच्छुक होने की वजह यह डर है कि इससे क्षेत्रीय दलों को ओबीसी आरक्षण को फिर आकार देने का नया मुद्दा मिल सकता है और सत्तारूढ़ सरकार पर दबाव बढ़ेगा। डर की वजह यही लगती है कि ओबीसी आंकड़े विवाद का पिटारा खोल सकते हैं, जिसे सरकार के लिए संभालना भारी पड़ सकता है। उच्च जातियों में अपना समर्थन खोने के भय से न तो वह ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का समर्थन कर सकती और न ही कई राज्यों में ओबीसी का समर्थन खोने के भय से ओबीसी आरक्षण बढ़ाने का विरोध ही कर सकती है।

Published on:
27 Aug 2021 08:56 am