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शरीर ही ब्रह्माण्ड: विदाई : शून्यता से पूर्णता तक

संतान को जन्म देना, उसका पालन-पोषण करके समाज को सौंपना पवित्र यज्ञ है। बेटी की विदाई पुण्यकाल है, वह सृष्टिक्रम को आगे बढ़ाने के लिए एक नवीन कुल से जुड़ती है। वेद दोनों ही अवसरों को अंधकार से प्रकाश की ओर गमन का प्रतीक मानते हैं।
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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Sep 19, 2026

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फोटो: पत्रिका

संतान को जन्म देना, उसका पालन-पोषण करके समाज को सौंपना पवित्र यज्ञ है। बेटी की विदाई पुण्यकाल है, वह सृष्टिक्रम को आगे बढ़ाने के लिए एक नवीन कुल से जुड़ती है। वेद दोनों ही अवसरों को अंधकार से प्रकाश की ओर गमन का प्रतीक मानते हैं। गर्भ से विदा हुआ जीवात्मा संसार में आकर जीवन का प्रकाश फैलाता है। पिता की चौखट से विदा हुई पुत्री नए घर में कुल का दीपक बनती है।

शास्त्रों के अनुसार जीवात्मा का गर्भ से निकलकर संसार में आना और बेटी का विदा होकर पतिगृह गमन करना वस्तुत: वियोग और सृजन दोनों भावों से युक्त रहता है। एक प्रकृति का नियम है और दूसरा समाज का। काश्यप संहिता के अनुसार दोनों अवस्थाओं में जीव का आश्रय और आधार बदलता है। गर्भ से विदाई के समय शिशु अपने नाभि-नाल से अलग होकर स्वतंत्र भाव से अन्न ग्रहण, श्वसन, आदि क्रियाएं करता है। गर्भस्थ अवस्था में मां ही उसके समस्त जीवनीय रसों की पोषिका थी। गर्भच्युति के साथ ही वह मां को मातृत्व का गौरव और समृद्धि प्रदान करता है। स्त्री की पूर्णता मातृत्व भाव ही है। महाभारत शांतिपर्व में भी कहा है-माता से बढ़कर कोई देवता नहीं है। संतान के मुख को देखकर जो आनंद और उत्साह मिलता है, उससे बड़ा सुख दूसरा नहीं है।

पुत्री की विदाई का क्षण भी उतना ही सुख और संतोष का होता है। महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुन्तलम् में शकुन्तला को पतिगृह भेजने के प्रसंग में पिता को कहते हुए बताया है कि कन्या पराया धन होती है। आज उसे पतिगृह भेजकर मेरा आत्मा परम शांत और प्रसन्न है, मानों किसी की धरोहर को सुरक्षित लौटा दिया हो-
अर्थो हि कन्या परकीय एव तामद्य संप्रेष्य परिग्रहीतु:।
जातो ममायं विशद: प्रकामं प्रत्यर्पितन्यास इवान्तरात्मा।

(अभिज्ञान शाकुन्तलम् 4.22)
दोनों ही विदाइयों में मां अपने आशीर्वाद और शुभकामनाओं से संतान के भविष्य को सुरक्षित और समृद्ध बनाने की कामना करती है। गर्भ-विदाई में यह संबंध मात्र मां और शिशु के मध्य रहता है। गीता के अनुसार गर्भ से विदाई परा प्रकृति का कार्य है। जीवन परा भाव से अपरा भाव में प्रवेश करता है। अभिव्यक्ति के अभाव में गर्भस्थ जीव की समस्त कामनाओं की पूर्ति मां के माध्यम से होती है। गर्भकाल में जीव को अपनी पूर्वजन्मों की स्मृति रहती है। भूमिष्ठ होते ही उस पर पंचमहाभूतों के साथ मन, बुद्धि व अहंकार के कारण आवरण चढ़ने लगते हैं। कृष्ण कहते हैं कि दोनों प्रकृतियां मेरे अधीन है-
भूमिरापोऽनलो वायु: खं मनो बुद्धिरेव च।
अहङ्कार इतीयं मे भिन्ना प्रकृतिरष्टधा ॥ (7.4)
अपरेयमितस्त्वन्यां प्रकृतिं विद्धि मे पराम् ।
जीवभूतां महाबाहो ययेदं धार्यते जगत् ॥ (7.5)

प्रसव-क्रिया मात्र एक शारीरिक घटना नहीं है, बल्कि पीड़ा और प्रसन्नता, वियोग और मिलन तथा भय और विस्मय का महासंग्राम है। इस तपस्या में मां कर्ता नहीं मात्र माध्यम बनती है जीव के जन्म की। गर्भ से बाहर आते समय मां जीवनरक्षणीय सामग्रियां देती है, जो उसके जीवन पथ के आधार स्तंभ बनते हैं। जीवन का प्रथम स्वतंत्र श्वास देती है। पृथ्वी का स्पर्श और गुरुत्व देती है जो शिशु शरीर को स्थिरता, ठोसपन और धैर्य देता है। सुश्रुत संहिता के अनुसार स्तन्य (मातृ-दुग्ध) रस धातु का सार है। माता का अन्न ही अमृत बनकर शिशु को मिलता है। प्रथम स्तन्य, जिसको विज्ञान भाषा में कोलोस्ट्रम कहा जाता है, शिशु की प्रथम औषधि है। यह रोग-निरोधक क्षमता, ओज, बल, बुद्धि और आयु का आधार है। स्नेह, सुरक्षा और आश्रय का प्रथम पाठ मां अपने शिशु को स्पर्श के माध्यम से देती है। मां की धड़कन से परिचित शिशु उस स्पर्श से विश्वास, प्रेम और निर्भयता पाता है—यह मां का सूक्ष्म संस्कार है। नाम, वंश, कुल, गोत्र के रूप में मां उसे स्वधर्म और पितृऋण से जोड़ती है, जो शिशु के स्वतंत्र व्यक्ति होने के परिचायक बनते हैं। जन्मघुट्टी के रूप में स्वर्ण, शहद व घी का मिश्रण शिशु की बुद्धि, स्मरणशक्ति और शारीरिक विकास हेतु स्वर्णप्राशन संस्कार के रूप में चटाया जाता है। कूष्मांड अवलेह प्रतिरक्षा प्रणाली हेतु किया जाता है। आमलकी रसायन से कोशिकीय स्वास्थ्य और दीर्घायु प्राप्त होता है। ये रसायन मां के उस आशीर्वाद का ही आयुर्वैज्ञानिक और व्यावहारिक रूप है; जिससे वह शिशु के रोग-मुक्ति, बलशाली होना और दीर्घायु की कामना करती है।

ये सभी स्थूल भाव के कर्म हैं, जो भूमिष्ठ होने के बाद शिशु के साथ जुड़ते हैं। इनके अतिरिक्त सूक्ष्म स्तर पर भी गर्भकालिक संस्कार, ओज और प्रारब्ध देती है। वह जन्म के समय शिशु को कहती है कि तुम ब्रह्मांश हो, यही तुम्हारी आत्मिक पहचान है। दिव्य वंश से तुम्हारा शाश्वत संबंध है क्योंकि तुम विष्णु की संतान हो। अपने धर्म की रक्षा हेतु साधुओं की रक्षा करना और दुष्टों का नाश अधर्म निग्रह के लिए करना- परित्राणाय साधूनां विनाशय च दुष्कृताम्। अपने कुल की गरिमा का ध्यान रखना, मेरे अधूरे सपनों को पूर्ण करना और यथासंभव विनम्रता का भाव बनाए रखना।

जीव सनातन अंश है, पिता बीजप्रदाता है, मां क्षेत्र है। जीवन का उद्देश्य स्वधर्म पालन है। गीता में कृष्ण स्वधर्मे निधनं श्रेय: रूप में स्वधर्म पालन की शिक्षा देते हैं। गर्भ से विदाई में शिशु को जीवन के प्रथम स्पन्दन मिलते हैं, उसके करणीय कर्मों का ज्ञान मिलता है। पुत्री की विदाई में भी स्नेह, आशीष, दु:ख, प्रसन्नता आदि सभी भावों का समावेश रहता है। शास्त्र कहते हैं कि जिस प्रकार जीव गर्भ के बंधनों से मुक्त होकर संसार में प्रवेश करता है और पितृऋण से उऋण होने में माता-पिता का सहायक बनता है, उसी प्रकार पुत्री भी मातृ-पितृ गृह से विलग होकर पतिकुल को आगे बढ़ाती है।

संस्कार संपन्न कन्या ही कुलवधू के रूप में चाही जाती है। पिता के घर में ग्रहण किए गए ज्ञान और संस्कार ही भावी संतान-परम्परा की समृद्धि में सहायक बनते हैं। मायके में वह शरीर, मन और बुद्धि से जीती है। कन्यादान में मंत्रों के माध्यम से पिता कन्या के प्राणों को वर के प्राणों से संयुक्त करता है। कन्या सूक्ष्म भाव में पति के साथ जुड़ती है और वंश परम्परा को आगे बढ़ाकर पति कुल के पितृऋण मोचन में सहायक बनती है। पति के साथ सृष्टि से मुक्ति की यात्रा में भी जुड़ती है। शतपथ ब्राह्मण में कहा है - अर्द्धो ह वा एष आत्मनो यत्पत्नी- पत्नी अर्द्धांग होती है, उसके आने से पति का अस्तित्व पूर्ण होता है। शरीर से गृहस्थ धर्म के करणीय कर्म करते हैं। मन से नवीन संबंधों से जुड़ते हैं। बुद्धि से संकल्पित भाव में पंचमहायज्ञों और पितृ ऋण से मुक्ति हेतु कर्म करते हैं। विवाह का बाह्य रूप अपरा है-समाज, परिवार, उत्सव, परम्पराएं आदि। दम्पती की धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की साधना से विवाह अपरा से परा की यात्रा बन जाता है। स्त्री इस यात्रा में सारथी बनती है।

गर्भ से शिशु की विदाई हो या मायके से बेटी की विदाई दोनों ही अवस्थाओं से मां शून्यता और पूर्णता भावों को एक साथ अनुभूत करती है। पुत्री की विदाई में भी मां स्नेह व आशीष के साथ सुख-समृद्धि, पोषण और वैवाहिक जीवन की स्थिरता की प्रतीकात्मक वस्तुओं को बेटी के आंचल में डालती है। मायके की थाती की सूचक इस पोटली में धान, चावल, जीरा, सिक्का, फूल, हल्दी, दूब, सिंदूर आदि मांगलिक वस्तुएं होती हैं। अशुभ वस्तुओं जैसे सुई, कैंची, अचार आदि का निषेध किया जाता है। विवाह से पूर्व हल्दी की रस्म, तेल की रस्म सभी का वैज्ञानिक भाव है। शरीर की शुद्धि व निरोगता के सूचक हैं। कन्या को परिष्कृत भाव में विदा किया जाता है।

पुत्री के पालन-पोषण में भी उसको गृहकार्यों में जोड़ा जाता है। परम्पराओं व रीति रिवाजों की शिक्षा दी जाती है। यही संस्कार उसके सुखद जीवन की नींव बनते हैं। उसको मौन का अभ्यास करवाया जाता है। परिवार में जन्म-मृत्यु अथवा विवाह सभी अवसरों पर पुत्री को प्रशिक्षित किया जाता है। माता द्वारा पुत्री के भावी जीवन को सुखमय बनाने का यह प्रयास होता है। यही विदाई के समय भी मां स्मरण कराती है।

क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com