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शरीर ही ब्रह्माण्ड: गर्भकाल के दो हृदय

वैदिक दृष्टि में गर्भाधान एक पवित्र यज्ञ है। इस यज्ञ में पुरुष की क्रिया अर्पण है तो स्त्री की क्रिया ग्रहण और रूपान्तरण है। सृजन की पूर्णता ही पूर्ण पुरुष को जन्म देती है। स्त्री और पुरुष मिलकर ही इस यज्ञ को पूर्ण बनाते हैं।
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जयपुर

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Gulab Kothari

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गुलाब कोठारी

Aug 29, 2026

sharir hi bramhand

फोटो: पत्रिका

वैदिक दृष्टि में गर्भाधान एक पवित्र यज्ञ है। इस यज्ञ में पुरुष की क्रिया अर्पण है तो स्त्री की क्रिया ग्रहण और रूपान्तरण है। सृजन की पूर्णता ही पूर्ण पुरुष को जन्म देती है। स्त्री और पुरुष मिलकर ही इस यज्ञ को पूर्ण बनाते हैं। प्रजनन क्रिया में पुरुष का कार्य बीज को आहुत करने के पश्चात् समाप्त हो जाता है। जीव की अग्रिम दस माह की यात्रा का दायित्व स्त्री पर होता है। जीवन का आरंभ माया के प्रभाव में होता है।

जीवन की तो शुरुआत ही माया भाव से होती है। मां के पेट से ही सबका जन्म होता है। अत: सृजन की पहली कड़ी भी मां होती है। नींव तय होने के बाद उसे पता रहता है कि भवन कैसा बनेगा। क्या संभव है और क्या संभव नहीं है। आगे इस पर भवन निर्माण की प्रक्रिया भी स्त्री के ही हाथों में रहती है।

मां ही जीव को मानव में रूपान्तरित करती है। जीवन की कला सिखाती है। स्वयं जीव के आत्मा का अंश बनकर अपने जैसा बनाती है। वही जीव है, वही आत्मा है। जीव के गर्भाशय में प्रवेश के साथ माता के स्वभाव, व्यवहार और स्वप्न-सुषुप्ति में बड़ा परिवर्तन आता है। इसी के आधार पर माता भीतर की गतिविधियों, परिवर्तनों को समझ पाती है। यदि मां बाहरी विषयों में व्यस्त रहती है तो जीव के साथ कोई संवाद संभव नहीं है। अर्थात् मां ने मन में किसी इच्छा विशेष का बीजारोपण ही नहीं किया। मां माली है। कामनाओं का पोषण करती है। यही तो संस्कार निर्माण का मार्ग है। यही सिंचाई का काम है।

जीव की सारी इच्छाएं कारण शरीर में होती हैं। मां की इच्छाएं कारण तथा स्थूल दोनों शरीरों में रहती हैं। स्थूल शरीर की इच्छाएं जीव तक नहीं पहुंचती। अवचेतन मन ही सम्बन्ध बनाता है।

गर्भधारण के पश्चात् चार माह तक शिशु के निर्माण प्रक्रिया में समस्त अंग-प्रत्यंगों- हाथ, पैर, सिर, ग्रीवा, आदि के विभाग स्पष्ट हो जाते हैं। इस क्रम में चेतना जाग्रत होने से इन्द्रियार्थों- शब्द-स्पर्श-रूप-रस-गंध-स्पर्श आदि की अभिलाषा भी होने लगती है। यही चेतना शिशु हृदय से मातृ-हृदय तक गति करती है। इसी कारण गर्भकाल में जब शिशु की इन्द्रियां विकसित हो जाती हैं, तो वह मन से सुख-दु:ख का अनुभव करने लगता है। अपनी इच्छाओं को माता के माध्यम से प्रकट करने लगता है। गर्भकाल का यह इच्छा भाव ‘दौहृद’ कहा जाता है। दौहृद का अर्थ है- दो हृदयों वाली।

द्विहृदयां च नारीं दौर्हृदिनीमाचक्षते अर्थात् दो हृदय होने से गर्भिणी को दौर्हृदिनी कहते हैं। चौथे-पांचवें माह में शिशु की इन्द्रियां और मस्तिष्क तीव्र गति से विकसित होते हैं जिससे वह बाहरी ध्वनि, स्वाद, भावना आदि को ग्रहण करने लगता है। गर्भ में ही शिशु अपने पूर्वजन्म एवं वर्तमान आत्मा से परिचित होता है, और वह माता के माध्यम से अपनी इच्छाएं व्यक्त करता है। माता की कोई भी इच्छा अब केवल उसकी अपनी नहीं बल्कि गर्भस्थ शिशु की अभिव्यक्ति मानी जाती है।

गर्भ के चौथे या आठवें माह में किया जाने वाला सीमन्तोन्नयन संस्कार दौहृद का ही वैदिक स्वरूप है। मानसिक व भावनात्मक दृष्टि से मां को शांत व आनंदित रखना ही इस दृष्टि का उद्देश्य है। इसके पीछे दृष्टि यही रहती है कि शिशु को सकारात्मक वातावरण मिल सके। माता का तनाव शिशु के विकास एवं मानसिक स्वास्थ्य को नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। यही कारण है कि भारतीय परम्परा में दौहृद की पूर्ति अति आवश्यक मानी गई है। दौहृद की पूर्ति से शिशु में भग (धर्म, ज्ञान, वैराग्य, ऐश्वर्य, यश और श्री) के गुणों का विकास संभव होता है। अत: दौहृद एक भावना या इच्छा नहीं बल्कि एक वैज्ञानिक सत्य है।

चरक संहिता के अनुसार गर्भिणी की अभिलाषा को कदापि नहीं रोकना चाहिए-न चास्य अभिलाषा निरोद्धव्याम् (चरक संहिता शारीरिक स्थान ४/८)। जिस गर्भिणी की इच्छा पूर्ण नहीं होती है उसका गर्भ उसी पीड़ा के कारण विविध विकृतियों से युक्त पैदा होता है। याज्ञवल्क्य स्मृति में कहा गया है कि गर्भिणी स्त्री की प्रिय इच्छा का आचरण अवश्य करना चाहिए- गर्भिण्या: प्रियमाचरेत् (याज्ञवल्क्य स्मृति)।

तैत्तिरीय उपनिषद् एवं गर्भोपनिषद के अनुसार मनुष्य के तीन शरीर होते हैं- स्थूल, सूक्ष्म और कारण। गर्भावस्था में जब माता को कोई इच्छा होती है तो वह केवल उसके नहीं अपितु शिशु के भी तीनों शरीरों की सम्मिलित अभिव्यक्ति होती है। शिशु का भौतिक शरीर माता के रस पर पूर्णत: निर्भर रहता है। वह जैव रासायनिक संकेत भेजता है जो माता के मस्तिष्क को प्रभावित करता है। जब शरीर को आयरन, कैल्शियम या प्रोटीन की कमी होती है तो माता को अचार, मिट्टी (मेट आदि) या मीठे की तीव्र इच्छा होती है। यह शिशु की हड्डी, रक्त एवं मांसपेशियों के निर्माण हेतु शरीर का संकेत है।

सुश्रुत संहिता के अनुसार चौथे मास में जब शिशु का हृदय व चेतना जाग्रत हो जाते हैं तब शिशु का सूक्ष्म शरीर माता के सूक्ष्म शरीर से जुड़ता है माता जो अनुभव करती है, वही शिशु का मानसिक आहार बनता है। माता अपने मानसिक तनाव को कम करने के लिए कोई विशेष भोजन करती है तो शिशु उसी स्नेह और प्राणिक ऊर्जा रूप ओज को प्राप्त करना चाहता है। गर्भोपनिषद् के अनुसार गर्भ में शिशु को अपने पूर्व जन्मों को बोध होता है। दौहृद का सबसे अधिक जुड़ाव कारण शरीर से होता है। शिशु अपने पूर्व जन्म के संस्कारों को माता के माध्यम से अभिव्यक्त करता है। यदि शिशु के आत्मा को पूर्व जन्म में कोई विशेष व्यंजन प्रिय था या किसी विशेष वातावरण में उसका जीवन बीता था तो उसकी वही इच्छाएं माता के दौहृद के रूप में फूटती है। इसी कारण माता को ऐसे आहार की भी इच्छा हो जाती है, जिसका उसके वर्तमान आहार से कोई संबंध नहीं होता। तीन शरीरों की कामना में स्थूल कामना जीवन रक्षा की पुकार है। सूक्ष्म कामना मानसिक शांति की तथा कारण शरीर की कामना शिशु की आत्मतृप्ति की आकांक्षा है।

दौहृद से भावी संतान के गुणों की पहचान भी हो जाती है कि वह पूर्वजन्म में किस योनि में था अथवा उसका प्रारब्ध कैसा था। सुश्रुत संहिता में विस्तार से इस विषय में विवेचन किया गया है कि जिस स्त्री को राजा के दर्शन की अभिलाषा होती है वह भाग्यवान पुत्र को उत्पन्न करती है। हिंसक जाति के जीवों के दर्शन में इच्छा होने से हिंसाशील पुत्र उत्पन्न करती है। जिन वस्तुओं की इच्छा उठती है तद्नुरूप ही आचार और विचार वाली संतान पैदा होती है। दौहृद होने में गर्भिणी के नित्य आचार-विचार भी कारण बनते हैं। जीव के पूर्व जन्म के कर्मों के अनुसार जैसा उसका भविष्य होता है, दैव योग से मन में उसी प्रकार के दौहृद की आकांक्षा उत्पन्न होती है-
कर्मणा चोदितं जन्तोर्भवितव्यं पुनर्भवेत्।
यथा तथा दैवयोगाद्दौर्हृदं जनयेद् हृदि।।

मां अपने संकल्प के बल पर और परिवार के अनुरूप तामसिक अथवा राजसिक दौहृद को भी सात्विक भाव में परिवर्तित कर सकती है क्योंकि मां ही गर्भ में शिशु का सम्पूर्ण विकास करती है। प्रत्येक कामना का मूल संकल्प ही होता है। मां अपने सात्विक संकल्प आहार-विहार एवं मानसिकता के द्वारा शिशु के संस्कारों को दिशा दे सकती है। तामसिक या राजसिक इच्छा को मां संकल्प के माध्यम से सात्विक भाव में परिणत कर सकती है। इस भाव के साथ कि ‘‘मैं अपने शिशु के लिए केवल वही ग्रहण करूंगी जो उसके शरीर, मन एवं आत्मा का पोषण करें।’’ माता का मन ही शिशु का प्रथम आहार है, अत: मां का मन शांत, प्रसन्न और ईश्वरमय होना आवश्यक है। इसी उद्देश्य के लिए गर्भकाल में विशिष्ट ग्रंथों का पाठ भी करती है और सात्विक संगीत सुनती है। दौहृद का गहनतम स्तर पूर्व जन्म के संस्कार है। अत: गर्भ संस्कार के अन्तर्गत हवन, यज्ञ एवं दान-पुण्य किए जाते हैं जो कारण शरीर को शुद्ध करते है।

क्रमश:
gulabkothari@epatrika.com