ओपिनियन

आंख मूंदकर भरोसा न करें रेटिंग पर

भारत की आर्थिक उपलब्धियों को नजरअंदाज करने और इसको भारत की रेटिंग से जोड़ कर नहीं देखना ऐसा मुद्दा है जो भारतीय अर्थशास्त्रियों के मन में खटकता है।

3 min read
Mar 07, 2018
standard and poor rating agency

- वरुण गांधी, सांसद

किसी व्यक्ति, संस्था और यहां तक कि देशों की रेटिंग भी प्राचीन काल से होती आई है। इतिहासकार हेरोडोट्स ने साइरेन के विद्वान कल्लीमकस के साथ मिलकर सात अजूबों की असल सूची बनाई थी जिसमें अलंकृत भाषा में इनकी खूबियों के बारे में बताया गया था। आधुनिक समय की क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की उत्पत्ति तो खैर, बहुत बाद की घटना है। 1837 के वित्तीय संकट के बाद इनकी शुरुआत हुई। ऐसी एजेंसियों की जरूरत उस समय किसी व्यापारी के अपने कर्जे चुका पाने की क्षमता के आकलन और आंकड़ों के संकलन के लिए महसूस की गई थी। जल्द ही मार्केट के बारे में स्वतंत्र जानकारी की मांग भी उठने लगी जिसमें कर्ज चुकाने की क्षमता की भरोसेमंद जानकारी हो।

ये भी पढ़ें

चोटों की तीमारदारी करता मन

1924 तक रेटिंग संसार के तीन बड़े नाम फिच, स्टैंडर्ड एंड पुअर समेत कंपनी के तौर पर निगमित हो चुके थे जिनका आज प्रतिस्पर्धाविहीन क्रेडिट रेटिंग मार्केट के 95 फीसदी हिस्से पर कब्जा है। 1933 का ग्लास-स्टीगल एक्ट पारित होने से अमरीकी बैंकों को सिर्फ रेटिंग वाले ग्रेडेड बॉन्ड में निवेश करने की इजाजत दी गई। ग्लोबल बॉन्ड मार्केट (सरकारी बॉन्ड समेत) को भी रेटिंग के दायरे में लाए जाने के बाद जल्द ही 1960 तक ऐसी रेटिंग का विस्तार कॉमर्शियल पेपर और बैंक जमा पर भी कर दिया गया।

इस दौरान बिजनेस मॉडल में मामूली बदलाव करते हुए रेटिंग एजेंसियों ने निवेशक और रेटिंग की जाने वाली इकाई दोनों से शुल्क लेना शुरू कर दिया। विश्व वित्तीय मार्केट में महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद रेटिंग एजेंसियां अब भी अकसर अनुचित और अशुद्ध रेटिंग के आरोपों के कारण भरोसा कायम कर पाने में नाकाम हैं। अमरीकी न्याय विभाग ने 1996 में रेटिंग एजेंसी मूडीज द्वारा इशुअर संस्थान पर अनुचित दबाव डाले जाने के आरोप की जांच की। ऐसी एजेंसियों को अनगिनत मुकदमों का सामना करना पड़ा, खासकर एनरॉन के दिवालिया हो जाने और अमरीका में हाल के सबप्राइम मॉर्गेज संकट के बाद। मूडीज पर दुनिया भर के कई देशों में रेटिंग प्रोटोकॉल का पालन नहीं करने के कारण जुर्माना लगाया गया।

भारत में भी रेटिंग एजेंसियों का रिकॉर्ड मिला-जुला है। एमटेक ऑटो और रिको इंडिया का मामला याद कीजिए जिसमें सेबी ने रेटिंग एजेंसियों की जांच कर नियम व डिस्क्लोजर मानक कड़े किए गए थे। 2011 से 2015 के दौरान रिको इंडिया की देनदारियां बिना अचल परिसंपत्तियों में बढ़ोतरी के बढ़ गईं थीं। कंपनी ने सितंबर 2015 तिमाही के नतीजे की घोषणा में भी देरी की थी। रेटिंग एजेंसियों ने एमटेक ऑटो को, एक ऐसी फर्म जो 800 करोड़ के बॉन्ड के पुनर्भुगतान में डिफाल्टर होने के कगार पर थी, के बावजूद एए की रेटिंग दे दी। इसके फौरन बाद ही इसकी रेटिंग में कई गुना की गिरावट आना तय था। यहां तक कि भूषण स्टील और जयप्रकाश इंडस्ट्रीज को भी दिवालिया होने से पहले सभी एजेंसियों द्वारा इनवेस्टमेंट ग्रेड की रेटिंग दी गई थी।

इन रेटिंग एजेंसियों का वैश्विक असर होने के कारण एक से दूसरे देश में पूंजी के प्रवाह से कई राष्ट्रों का वित्तीय भाग्य प्रभावित होता है। हाल में ग्रीस, पुर्तगाल और आयरलैंड को ‘जंक’ स्टेटस में डाल देने के साथ ही अमरीका और यूरोपियन यूनियन की सरकारी कर्ज की डाउनग्रेडिंग किए जाने की आलोचना हुई। इससे सरकारी कर्ज का संकट पैदा होने के साथ ही बेरोजगारी बढ़ी और यूरो जोन को अस्थिरता का सामना करना पड़ा। 1997 के एशियाई वित्तीय संकट का आकलन नहीं कर पाने और संकट के दौरान इन देशों की एकदम से कई स्तर की ग्रेडिंग घटाने के लिए इन क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की आलोचना हुई थी।

भारत की आर्थिक उपलब्धियों को नजरअंदाज करने और इसको भारत की रेटिंग से जोड़ कर नहीं देखना ऐसा मुद्दा है जो भारतीय अर्थशास्त्रियों के मन में खटकता है। इनके ऐसे ही मनमाने बर्ताव के कारण रूस और चीन को अपनी खुद की रेटिंग एजेंसी बनाने का फैसला करना पड़ा था। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स ने क्रीमिया के विलय के बाद रूसी सरकार को 2014 में जंक स्टेटस से बस एक पायदान ऊपर रखा तो इसे राजनीति से प्रेरित बताते हुए रूस ने खारिज कर दिया था। कई देश बुनियादी खामियों के बाद भी ऐसी रेटिंग की उपलब्धि को बहुत ज्यादा महत्व देते हैं। कई अध्ययनों में यह पाया गया कि रेटिंग एजेंसी संबंधित को चाहे वह संस्था हो या राष्ट्र, गैर-रेटिंग सेवाओं के साथ अच्छी रेटिंग दिलाने का लालच देती हैं।

हमारी विकास यात्रा में हमें हर हाल में ऐसी रेटिंग एजेंसियों खासकर स्वदेशी एजेंसियों का इस्तेमाल कॉरपोरेट सेक्टर में साफ-सफाई के लिए करना चाहिए। निवेशकों के हित की सुरक्षा के लिए सेबी के्रडिट रेटिंग एजेंसियों को अपने क्लाइंट को कम मुनाफे पर भी गैर-रेटिंग सेवाएं देने से रोकने के लिए आदेश देने की संभावनाएं तलाश सकता है। आउटस्टैंडिंग (शानदार) रेटिंग देने और फिर अचानक रेटिंग गिरा देने के मामलों की गहराई से निगरानी किए जाने की जरूरत है। वित्तीय फैसले सभी को रोजगार उपलब्ध कराने और नए प्रयोगों के साथ अर्थव्यवस्था का विकास करने की भावना से प्रेरित होने चाहिए, ना कि दरवाजे-दरवाजे भटकते हुए रेटिंग पाने की आशा से।

ये भी पढ़ें

बेदाग हो सिस्टम!
Published on:
07 Mar 2018 09:57 am
Also Read
View All