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कर्मचारी चयन आयोग की एक और परीक्षा संदेह के घेरे में आ गई है। सीजीएल टियर-दो परीक्षा में हुई गड़बडिय़ों की जांच आखिर अब सीबीआई के सुपुर्द होने जा रही है। दिल्ली में छह दिन चले आन्दोलन के बाद आखिर आयोग को सीबीआई जांच के लिए झुकना पड़ा। ये अकेली परीक्षा नहीं है जिसे लेकर गड़बड़ी के आरोप लगे हों। देश के हर राज्य में, परीक्षा कोई भी हो, बिना जांच, बिना अदालती कार्रवाई के सम्पन्न होती ही नहीं। कहीं परीक्षा में नकल के गम्भीर आरोप लगते हैं तो कहीं पेपर लीक की शिकायतें सामने आती हैं। जांच भी होती हैं और कार्रवाई भी। लेकिन ठोस नतीजा कभी सामने आता ही नहीं। न नकल करने वालों को सजा मिल पाती है और न नकल कराने वाले संगठित गिरोहों को।
पेपर लीक कराने वाले लोग संदेह के आरोपों में पकड़े तो बहुत जाते हैं लेकिन सींखचों के पीछे कभी नहीं पहुंच पाते। बड़ा सवाल यही कि परीक्षार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करने वाले लोग कानूनी शिकंजे में फंसते क्यों नहीं? बात क्लर्क परीक्षा तक ही सीमित नहीं रह गई है। डॉक्टर, इंजीनियर और अधिकारी वर्ग की परीक्षाएं भी गड़बड़झाले से बची नहीं हैं। राज्यों के लोक सेवा आयोग के अधिकारी-कर्मचारियों के पेपर लीक कराने के मामले में फंसने की खबरें चिंताजनक हैं। लेकिन अफसोस इस बात का है कि इसे गंभीरता से लेने वाला कोई नजर नहीं आ रहा। कर्मचारी चयन आयोग सीजीएल टियर-दो की परीक्षा सीबीआई से जांच के लिए मजबूरी में तैयार हुआ नजर आता है।
हजारों छात्रों के छह दिन चले आन्दोलन में जब अन्ना हजारे जा पहुंचे तो सरकार भी सक्रिय हुई और गृह मंत्रालय तथा भाजपा नेता भी। अन्ना अगर नहीं पहुंचते तो शायद छात्र अब भी धरने-प्रदर्शन कर रहे होते। पैसे के दम पर नौकरी पा जाना कोई छोटा अपराध नहीं है। ये अपराध जितना गंभीर है, उसके लिए सजा भी उतनी ही कठोर होनी चाहिए ताकि दूसरा कोई ऐसा अपराध करने की सोच भी नहीं सके। परीक्षा प्रणाली में भी बदलाव लाने के विचार पर मंथन होना चाहिए। ऐसा बदलाव जिससे गड़बड़ी की आशंका ही ना हो। ऐसे घोटाले की जांच भी त्वरित होनी चाहिए। तभी चयन आयोग और लोक सेवा आयोग की साख बच पाएगी। यहां सवाल योग्य अभ्यर्थियों के मुकाबले अयोग्य अभ्यर्थियों के चयन का है। इसके साथ समझौता किया जाना ही नहीं चाहिए।

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