
-जी.एन. बाजपेयी, सेबी एवं एलआइसी के पूर्व अध्यक्ष (द बिलियन प्रेस)
हमने नए वर्ष में ऐसे समय प्रवेश किया है, जब तमाम वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बना हुआ है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) के नवीनतम वल्र्ड इकोनॉमिक आउटलुक में वैश्विक आर्थिक वृद्धि में जारी सुस्ती और नकारात्मक जोखिमों की ओर संकेत किया गया है। यह आकलन ऐसे समय आया है, जब अमरीका की ओर से लगाए गए शुल्कों से वैश्विक व्यापार व्यवस्था प्रभावित हुई है। इसके तहत भारतीय वस्तुओं पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क लगने से अमरीका को होने वाले निर्यात पर कुल शुल्क 50 प्रतिशत तक पहुंच गया।
28 नवंबर 2025 को राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय ने वित्त वर्ष 2025-26 की दूसरी तिमाही के लिए 8.2 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि की घोषणा की। वैश्विक मंदी, कठोर ट्रंप शुल्क और वित्त वर्ष 2026 की पहली तिमाही में दर्ज 7.8 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि के संदर्भ में यह उपलब्धि उल्लेेखनीय है। जीडीपी वृद्धि में अर्थव्यवस्था के तीनों क्षेत्रों-कृषि 3.5 प्रतिशत, उद्योग एवं विनिर्माण 7.7 से 9.1 प्रतिशत तथा सेवाओं का 9.2 प्रतिशत योगदान रहा है, जो अर्थव्यवस्था की सुदृढ़ बुनियाद को दर्शाता है। इन आंकड़ों और जीडीपी वृद्धि दर में सुधार को लेकर संदेह जताने वालों की भी कमी नहीं है। हाल में आइएमएफ ने भारत के जीडीपी आंकड़ों की गुणवत्ता को 'सी' ग्रेड दिया, जिसे कम अंक माना गया। महामारी के बाद अर्थव्यवस्था के पुनरुत्थान के साथ भारत की जीडीपी वृद्धि दर लगातार अपेक्षाओं से अधिक रही है। वित्त वर्ष 2024 में दर्ज 9.2 प्रतिशत वृद्धि को कम डिफ्लेटर से उपजी सांख्यिकीय मृगतृष्णा कहा गया था, किंतु वित्त वर्ष 2025 में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि ने दोनों वर्षों की औसत दर 7.85 प्रतिशत तक पहुंचा दी, जो डिफ्लेटर-वॉशआउट परिकल्पना से कहीं अधिक है। वर्ष 2000 के बाद से भारत की दीर्घकालिक औसत जीडीपी वृद्धि दर 6.5 प्रतिशत रही है, लेकिन अब संकेत हैं कि संभावित वृद्धि सात प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है।
पिछले एक दशक में केंद्र सरकार द्वारा किए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का एकीकरण और युक्तिकरण, दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता, रियल एस्टेट विनियामक प्राधिकरण जैसे सुधारों और मौद्रिक नीति समिति जैसी संस्थागत व्यवस्थाओं ने इस आकलन को मजबूती दी है। इसके परिणामस्वरूप भारत 2013 के 'फ्रेजाइल फाइव' से निकलकर एक अपेक्षाकृत स्थिर सूक्ष्म-आर्थिक भूगोल में पहुंच चुका है, जहां मुद्रास्फीति नियंत्रित है, राजकोषीय घाटा सीमित है, ऋण-जीडीपी अनुपात लगभग 80 प्रतिशत है और विदेशी मुद्रा भंडार 600 अरब डॉलर से अधिक है। दिसंबर में प्रकाशित भारतीय रिजर्व बैंक के स्टेट ऑफ द इकोनॉमी पत्र में कहा गया है कि व्यापक आर्थिक बुनियादों और सुधारों पर निरंतर ध्यान, बदलते वैश्विक परिवेश में अर्थव्यवस्था को उच्च-वृद्धि पथ पर बनाए रखने में सहायक होगा। इन सुधारों के साथ बैंकों और कॉर्पोरेट क्षेत्र की बैलेंस शीट की सफाई, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना का विस्तार, सार्वजनिक व्यय का पूंजी निर्माण की ओर झुकाव और पांच वर्षों में 500 आधार अंकों की राजकोषीय घाटा कटौती जैसी पहलें भी की गई हैं।
इसके अतिरिक्त, पिछले दशक में शुरू की गई लखपति दीदी, मुद्रा ऋण और किसान उत्पादक संगठनों को समर्थन जैसी योजनाएं अब ठोस परिणाम दे रही हैं। 2025 के अंत तक लखपति दीदियों की संख्या एक करोड़ तक पहुंच चुकी है, जबकि 52 करोड़ मुद्रा ऋणों के माध्यम से 33 लाख करोड़ रुपए वितरित किए गए हैं। राष्ट्रीय कृषि बाजार 'ई-नाम' के सुदृढ़ ढांचे ने वित्तीय सहायता, रोजगार सृजन, कौशल उन्नयन और बाजार से जुड़ाव को गति दी है, विशेषकर ग्रामीण और कृषि आधारित समाज में। स्थिर सार्वजनिक नीतियों में विश्वास का संकेत भारत में स्थापित हो रहे वैश्विक क्षमता केंद्रों से भी मिलता है। वर्तमान में लगभग 1,800 ऐसे केंद्र 19 लाख से अधिक लोगों को रोजगार दे रहे हैं और 2024 तक 64.6 अरब डॉलर का राजस्व अर्जित कर चुके हैं, जो 2030 तक 100 अरब डॉलर तक पहुंचने की संभावना है। 'जन विश्वास' जैसे कदम और श्रम सुधार, एमएसएमई केंद्रित गौबा समिति की सिफारिशें, प्रतिभूति बाजार संहिता तथा शक्ति कानून जैसी पहलें भी विकास को गति देंगी। इन कदमों से आर्थिक सहभागिता बढ़ी है। अवसंरचना में सुधार हुआ है। लॉजिस्टिक्स लागत घटी है और वित्तीय दमन कम हुआ है।
भले ही ये सुधार 1991 के 'बिग बैंग' सुधारों जैसे न हों, किंतु टुकड़ों-टुकड़ों में उठाए गए ये क्रमिक कदम भारत की संभावित जीडीपी वृद्धि को अनुकूल दिशा में प्रभावित कर रहे हैं। फिर भी, 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था का दर्जा प्राप्त करने के लिए आवश्यक आठ प्रतिशत से अधिक की संभावित जीडीपी वृद्धि हासिल करने के लिए कारक और संस्थागत सुधार अनिवार्य हैं। इनमें न्यायपालिका, सार्वजनिक प्रशासन, पुलिस व्यवस्था के साथ-साथ भूमि और बिजली सुधार शामिल हैं। अनुबंध प्रवर्तन, भूमि अधिग्रहण और सार्वजनिक सेवाओं की आपूर्ति में समय व लागत घटाने तथा कुल कारक उत्पादकता बढ़ाने के लिए ये सुधार आवश्यक होंगे। यह भी उल्लेखनीय है कि वर्तमान में निवेश का केवल एक इंजन-सार्वजनिक क्षेत्र- पूरी क्षमता से चल रहा है। सार्वजनिक निवेश की बजटीय सीमाएं हैं, जबकि निजी क्षेत्र का निवेश अब भी सुस्त है। सरकार को उद्योग और व्यापार संगठनों से संवाद कर कारणों की पहचान करनी होगी और निजी निवेश को गति देने के उपाय करने होंगे। जनसांख्यिकीय लाभांश का उपयोग कर समृद्ध राष्ट्र निर्माण का यह भारत के पास स्वर्णिम अवसर है।
Published on:
13 Jan 2026 12:49 pm
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