जंगलों में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण अधिक शोरगुल, तेज रोशनी और भीड़भाड़ से जंगली जानवर प्रभावित हो रहे हैं। एक ओर जंगल कम होते जा रहे हैं, दूसरी ओर इंसानी दखल बढ़ता जा रहा है और तीसरी ओर जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अस्थिरता बढ़ रही है। इसके अलावा जानवरों के सामने भोजन और पानी के स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।
डॉ. राजेंद्र प्रसाद शर्मा, स्वतंत्र लेखक
पर्यावरण प्रदूषण के दुष्परिणामों का असर अब पशु-पक्षियों में भी दिखाई देने लगा है। पिछले दिनों कुत्तों के काटने की घटनाओं की भरमार के बाद सर्वोच्च न्यायालय तक को हस्तक्षेप करना पड़ा है। सवाल केवल कुत्तों के हिंसक होने का ही नहीं है, अपितु अन्य पशु-पक्षियों के आक्रामक होने की घटनाएं भी तेजी से बढऩे लगी हैं। जंगली जानवर आए दिन शहरों में घूमते दिखाई देने लगे हैं, तो आवारा पशुओं द्वारा राह चलते लोगों पर अचानक हमला कर घायल करने और कभी-कभी जान तक ले लेने के समाचार भी लगातार सामने आ रहे हैं। ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसायटी के हालिया अध्ययन में पाया गया है कि जानवरों के प्राकृतिक स्वभाव में तेजी से बदलाव आ रहा है। एक ओर कई प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर पहुंच रही हैं, तो दूसरी ओर बहुत से पक्षी अपने रास्ते बदल रहे हैं। एक समय था, जब बरसात के दिनों में ही कुत्तों के काटने की घटनाएं अधिक मात्रा में देखी जाती थीं। माना जाता था कि बरसात में कोई जहरीली चीज खाने या जहरीले जानवर के संपर्क में आने से कुत्ता पागल हो जाता है और फिर काटने लगता है, पर आजकल आए दिन कुत्तों के हिंसक आक्रमण की घटनाएं आम होती जा रही हैं। इसी तरह अन्य जानवरों के स्वभाव में भी आक्रामकता बढऩे लगी है। पालतू पशु-पक्षियों के स्वभाव में भी परिवर्तन देखा जा रहा है।
अधिक गुस्सैल हो रहे पशु-पक्षी
ब्रिटिश इकोलॉजिकल सोसायटी की टीम ने 28 देशों के 133 अलग-अलग जीवों के अध्ययन के बाद यह निष्कर्ष निकाला है कि दुनियाभर में जानवर और पक्षी अधिक गुस्सैल होते जा रहे हैं। उनके सामान्य व्यवहार में तेजी से बदलाव आ रहा है। दरअसल, जानवरों और पक्षियों में जिस तरह का बदलाव आ रहा है, उसमें वे मनुष्य की निकटता से भयभीत होने के बजाय अधिक निडर होते जा रहे हैं। इसके अलावा जंगलों और खुले क्षेत्रों में लगातार कमी आती जा रही है और आबादी का दबाव बढ़ता जा रहा है। इसका असर साफ दिखाई दे रहा है। वातावरण में जिस तेजी से बदलाव आ रहा है, उससे पशु-पक्षियों का स्वभाव भी प्रभावित हो रहा है।
मौसम की पहचान में हो रहा भ्रम
यदि इसी साल की बात करें, तो मौसम में इतना बदलाव देखा गया कि सही मायने में इस बार बसंत की प्रतीक्षा ही करते रह गए। जनवरी-फरवरी में तेज सर्दी देखने को मिली, तो मार्च-अप्रेल में तापमान इस कदर बढ़ गया कि लोगों को भीषण गर्मी से जूझना पड़ा। हालात यह हैं कि दो दिन तेज गर्मी पड़ती है और फिर अचानक आंधी-ओलों का दौर शुरू हो जाता है। परिणाम यह हो रहा है कि मौसम की पहचान में ही भ्रम होने लगा है। हिमालय के ग्लेशियर प्रभावित हो रहे हैं। बर्फ गिरने के समय बर्फबारी नहीं हो रही और मार्च-अप्रेल में बर्फबारी के समाचार मिलने लगे हैं। खैर, यह विषयांतर होगा, पर इतना साफ है कि जिस तरह से वातावरण और पर्यावरण प्रभावित हो रहा है, उसकी प्रतिक्रिया केवल मनुष्य ही नहीं, बल्कि जानवरों और पक्षियों में भी दिखाई देने लगी है।
इंसान और वन्यजीवों में टकराव आम
देखा जाए तो प्रकृति के अत्यधिक दोहन और विकृति की राह अपनाने का ही परिणाम है कि तेजी से बदलाव दिखाई देने लगे हैं। इंसान और वन्य जीवों में टकराव आम होता जा रहा है। जयपुर में ही आए दिन कभी किसी कॉलोनी में तो कभी कहीं और जंगली जानवरों के आने के समाचार मिल जाते हैं। दो-तीन महीने पहले जयपुर के सिविल लाइंस जैसे पॉश और घनी आबादी वाले इलाके में तेंदुए का आना गंभीर चिंता का विषय है। सवाई माधोपुर में मंदिरों के रास्तों पर आए दिन बाघ की टहल-कदमी देखी जा रही है। यह तो केवल उदाहरण मात्र हैं। जंगली जानवरों द्वारा खेतों में काम कर रहे लोगों पर हमला करना या पालतू पशुओं पर आक्रमण करना अब आम होता जा रहा है।
मानवीय हस्तक्षेप से वन्यजीव हो रहे प्रभावित
एक मोटे अनुमान के अनुसार दुनिया में लगभग 87 लाख जीव प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें से 10 हजार से ज्यादा प्रजातियां पक्षियों की हैं। जहां तक हमारे देश का प्रश्न है, तो भारत सर्वाधिक जैव विविधता वाले देशों में शामिल है। भारतीय वन्यजीव संस्थान के अनुसार लगभग सात से आठ प्रतिशत प्रजातियां भारत में पाई जाती हैं। मोटे अनुमान के अनुसार देश में 92 हजार से ज्यादा जानवरों की प्रजातियां और लगभग 1300 पक्षियों की प्रजातियां हैं। दरअसल, मानवीय दखल के चलते पशु-पक्षियों के स्वभाव में परिवर्तन आया है और वे असुरक्षा की भावना के कारण अधिक आक्रामक होते जा रहे हैं। जंगलों में भी मानवीय हस्तक्षेप के कारण अधिक शोरगुल, तेज रोशनी और भीड़भाड़ से जंगली जानवर प्रभावित हो रहे हैं। एक ओर जंगल कम होते जा रहे हैं, दूसरी ओर इंसानी दखल बढ़ता जा रहा है और तीसरी ओर जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम में अस्थिरता बढ़ रही है। इसके अलावा जानवरों के सामने भोजन और पानी के स्रोत भी प्रभावित हो रहे हैं।
समय रहते जिम्मेदारी समझने की जरूरत
एक अन्य कारण हार्मोनल बदलाव भी है, जिसके कारण स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, हालांकि यह स्थिति सीमित समय तक ही रहती है। जानवरों में खाने के लिए संघर्ष बढऩे लगा है, इसलिए वे भोजन और पानी की तलाश में आबादी वाले क्षेत्रों की ओर रुख कर रहे हैं। जहां तक पक्षियों का प्रश्न है, खेती में जहरीले तत्वों के अत्यधिक प्रयोग से उनके स्वभाव में भी बदलाव आ रहा है। भूमि, जल और वायु प्रदूषित हो रहे हैं और उसका असर स्वाभाविक रूप से जीवों के व्यवहार में देखा जा सकता है। एक बात साफ हो जानी चाहिए कि जिस तरह इंसान का धरती पर रहना आवश्यक है, ठीक उसी तरह जैव विविधता को बनाए रखना भी हमारी अहम जिम्मेदारी है। हमें संसार का संतुलन बनाए रखना होगा। पशुओं और पक्षियों को भी बेहतर वातावरण देना होगा, क्योंकि इंसान और पशु-पक्षी सभी इस धरती की अनमोल आवश्यकता हैं। यह प्रकृति की देन हैं और इन्हें भी निर्बाध जीवन जीने का अधिकार है। इसके अलावा जैव विविधता के संरक्षण का दायित्व भी हमारा ही है। इसलिए समय रहते हमें अपनी जिम्मेदारी को समझना होगा।