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संपादकीय: शादियों में फिजूलखर्ची के आगे संवेदनाओं की रोशनी

राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई गांवों में विवाह के अवसर पर सामूहिक पौधरोपण की परंपरा शुरू हुई है। कहीं नवदंपती ने कन्या शिक्षा के लिए पुस्तकालय बनवाया, तो कहीं गरीब छात्राओं की पढ़ाई का खर्च उठाया गया।

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जयपुर

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ANUJ SHARMA

May 28, 2026

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wedding changes nowdays

हमारे समाज में शादी केवल दो लोगों का मिलन नहीं होती, वह सामाजिक स्तर पर हमारी सोच और संस्कारों का परिचय देने वाली भी होती है। आज जब विवाह समारोह दिखावे, महंगे डेस्टिनेशन, लाखों के भोजन और चमक-दमक की होड़ में बदलते जा रहे हैं, तब महाराष्ट्र के बहादुरपुरा गांव का उदाहरण उम्मीद की नई रोशनी दिखाता है। यहां के सिद्धेश्वर पेठकर के परिवार ने अपने बेटे की शादी को केवल निजी उत्सव नहीं रहने दिया, बल्कि उसे पूरे गांव की सुरक्षा और खुशहाली से जोड़ दिया। गांव के 3,465 लोगों का एक-एक लाख रुपए का दुर्घटना बीमा करवाकर उन्होंने यह संदेश दिया कि खुशियां तभी सार्थक हैं, जब उनमें अधिक से अधिक लोग और जरूरतमंद भी शामिल हों।

भारतीय समाज में शादियों पर बेहिसाब खर्च कोई नई बात नहीं है। कई परिवार वर्षों तक कर्ज में डूबे रहते हैं, केवल इसलिए कि समाज के सामने प्रतिष्ठा बनी रहे। लाखों रुपए आतिशबाजी, सजावट और ऐसे आयोजनों पर खर्च कर दिए जाते हैं, जिनकी चमक कुछ घंटों में खत्म हो जाती है। लेकिन बहादुरपुरा गांव की शादी ने यह साबित किया कि यदि सोच बदले तो वही पैसा हजारों लोगों के जीवन में सुरक्षा और विश्वास का कारण बन सकता है। देश में ऐसे प्रेरक उदाहरण धीरे-धीरे बढ़ रहे हैं। राजस्थान और मध्य प्रदेश के कई गांवों में विवाह के अवसर पर सामूहिक पौधरोपण की परंपरा शुरू हुई है। कहीं नवदंपती ने कन्या शिक्षा के लिए पुस्तकालय बनवाया, तो कहीं गरीब छात्राओं की पढ़ाई का खर्च उठाया गया। केरल में एक दंपती ने अपनी शादी में महंगे भोज की जगह अनाथालय को भोजन और जरूरी सामान दान किया। पंजाब में कई परिवार विवाह समारोह में भोजन की बर्बादी रोकने के लिए नो वेस्ट फूड अभियान चला रहे हैं। कोविड काल के बाद तो अनेक युवाओं ने सादगीपूर्ण विवाह कर समारोह में खर्च होने वाले पैसे बचा कर उन्हें अस्पतालों और जरूरतमंदों की मदद में लगाया। यह बदलाव केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना का संकेत है। नई पीढ़ी अब यह समझ रही है कि सामाजिक प्रतिष्ठा केवल दिखावे से नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और जिम्मेदारी से बनती है। सोशल मीडिया के दौर में भी कुछ युवा लाइक्स और वायरल वीडियो से आगे बढ़कर समाज में वास्तविक बदलाव लाने की कोशिश कर रहे हैं। वे जानते हैं कि किसी जरूरतमंद की मदद से मिलने वाली संतुष्टि, महंगे आयोजन की क्षणिक वाहवाही से कहीं अधिक बड़ी होती है।

हालांकि यह भी सच है कि हर परिवार लाखों-करोड़ों की मदद नहीं कर सकता। लेकिन समाज के लिए कुछ अच्छा करने के लिए बड़ी रकम नहीं, बड़ी सोच चाहिए। कोई विवाह में जरूरतमंदों को कंबल बांट सकता है, कोई गांव के स्कूल में पंखे लगवा सकता है, तो कोई अस्पताल में मरीजों के लिए भोजन की व्यवस्था कर सकता है। छोटे-छोटे प्रयास भी समाज में सकारात्मक बदलाव की मजबूत नींव बनते हैं।