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पूर्व सैनिकों के लिए बने कृषि आधारित पुनर्वास नीति

संस्कृत में कहा गया है— ‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’ अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं। हमारे सैनिक इसी भावना के साथ सीमा पर खड़े रहते हैं। वे बर्फीली चोटियों पर भी डटे रहते हैं और समुद्र की अनंत लहरों के बीच भी राष्ट्रध्वज को झुकने नहीं देते। लेकिन विडंबना देखिए, जब वही सैनिक वर्दी उतारकर नागरिक जीवन में लौटता है, तब उसके सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न होता है-‘अब आगे क्या?’

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भारत

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Rakhi Hajela

May 27, 2026

purv sainik

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डॉ. राजाराम त्रिपाठी, कृषि विशेषज्ञ

इस सप्ताह ‘मां दंतेश्वरी हर्बल फार्म’ में हुई एक मुलाकात लंबे समय तक मेरे भीतर गूंजती रहेगी। दिल्ली से स्वयं कार चलाकर एक नौसेना अधिकारी अपने परिवार सहित बस्तर पहुंचे थे। लगभग दो वर्षों बाद वे सेवानिवृत्त होने वाले हैं। चेहरे पर राष्ट्रसेवा का गौरव था, पर आंखों में भविष्य की चिंता भी साफ दिखाई दे रही थी। साथ में उनकी उच्च शिक्षित पत्नी थीं, जो उतनी ही गंभीरता से जैविक खेती, भूमि चयन और भविष्य की योजनाओं पर चर्चा कर रही थीं। एक ढाई वर्ष का नन्हा बच्चा भी था, जिसकी मासूम मुस्कान पूरे वातावरण को जीवंत बना रही थी।
उनसे बातचीत करने के बाद उस दिन से लेकर आज यह लेख लिखने तक मेरे भीतर बार-बार एक ही प्रश्न उठ रहा है- क्या यह देश अपने उन सैनिकों और अधिकारियों की दूसरी पारी के लिए पर्याप्त व्यवस्था कर पा रहा है, जिन्होंने अपनी पूरी जवानी भारत माता की रक्षा में समर्पित कर दी?

संस्कृत में कहा गया है—
‘जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी।’
अर्थात माता और मातृभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।

हमारे सैनिक इसी भावना के साथ सीमा पर खड़े रहते हैं। वे बर्फीली चोटियों पर भी डटे रहते हैं और समुद्र की अनंत लहरों के बीच भी राष्ट्रध्वज को झुकने नहीं देते। लेकिन विडंबना देखिए, जब वही सैनिक वर्दी उतारकर नागरिक जीवन में लौटता है, तब उसके सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न होता है-‘अब आगे क्या?’

55 से 60 हजार सैनिक और रक्षा कर्मी सेवा से सेवानिवृत्त होते हैं हर वर्ष

भारत में प्रतिवर्ष लगभग 55 से 60 हजार सैनिक और रक्षा कर्मी सेवा से सेवानिवृत्त होते हैं। बड़ी संख्या ऐसे जवानों की होती है, जो 35 से 45 वर्ष की आयु के बीच ही सक्रिय सेवा से बाहर आ जाते हैं। लगभग 1,500 अधिकारी वर्ग से होते हैं, जबकि शेष अधिकांश जवान और जूनियर रैंक के सैनिक होते हैं। देश में वर्तमान समय में लगभग 28 लाख से अधिक पूर्व सैनिक मौजूद हैं। यह संख्या कई छोटे देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। यानी जिस उम्र में सामान्य व्यक्ति अपने कॅरियर की स्थिरता खोज रहा होता है, उस उम्र में देश का सैनिक फिर से जीवन की नई शुरुआत करने को विवश होता है। यह आसान नहीं होता। 40-45 वर्ष की उम्र में उसकी प्रतिस्पर्धा 20-25 वर्ष के युवाओं से होती है। कॉर्पोरेट दुनिया अनुभव नहीं, ‘अपडेटेड स्किल’ देखती है। निजी क्षेत्र अनुशासन की नहीं, बाजार की भाषा समझता है।

अर्धसैनिक बलों के अधिकांश जवान गांवों और किसान परिवारों से
सबसे बड़ा सच यह है कि भारत की सेना तथा अर्धसैनिक बलों के अधिकांश जवान गांवों और किसान परिवारों से आते हैं। वे खेतों की मिट्टी से उठते हैं, गांव की पगडंडियों से सीमा तक पहुंचते हैं। पर जब वे लौटते हैं, तब तक गांव बदल चुका होता है। खेती अब पहले जैसी नहीं रही। भूमि छोटी होती गई है। मजदूरी, खाद, बीज और दवाइयों के बढ़ते दामों के साथ खेती की लागत लगातार बढ़ी है। जल संकट भयावह होता जा रहा है। नीति आयोग और विभिन्न जल अध्ययनों के अनुसार भारत का लगभग 52 प्रतिशत कृषि क्षेत्र अब भी वर्षा आधारित है। यानी आधे से अधिक किसान आज भी बादलों की कृपा पर निर्भर हैं। दूसरी ओर भारत दुनिया में सबसे अधिक भूजल दोहन करने वाले देशों में शामिल हो चुका है। उपलब्ध मीठे पानी का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा केवल कृषि में उपयोग होता है, फिर भी खेतों तक पर्याप्त सिंचाई नहीं पहुंच पाती। कई राज्यों में भूजल स्तर तेजी से नीचे जा रहा है।

खेती अब केवल मिट्टी का नहीं, पानी का भी संघर्ष
संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्टों के अनुसार यदि जल प्रबंधन की वर्तमान स्थिति बनी रही, तो आने वाले वर्षों में भारत के अनेक हिस्सों में खेती गंभीर संकट में पहुंच सकती है। यानी खेती अब केवल मिट्टी का नहीं, पानी का भी संघर्ष बन चुकी है। रासायनिक खाद के निरंतर अंधाधुंध प्रयोग के कारण खेतों की उत्पादक क्षमता में 35 प्रतिशत तक ह्रास आ गया है। उस नौसेना अधिकारी ने बताया कि कभी उनके परिवार के पास 100 बीघा से अधिक जमीन थी। धीरे-धीरे शहरीकरण हुआ, औद्योगीकरण हुआ, बच्चों की उच्च शिक्षा का भारी खर्च आया, बेटियों के विवाह हुए और ‘अच्छे दाम’ के लालच तथा मजबूरियों में पूरी जमीन बिकती चली गई। आज वही परिवार फिर से जमीन खरीदकर खेती की ओर लौटना चाहता है।

देश में हर घंटे कम से कम एक किसान करता है आत्महत्या
सोचिए- जो परिवार कभी जमीनदार किसान था, वही आज सेवानिवृत्ति के बाद दोबारा खेती सीखने की स्थिति में है। दरअसल, यह केवल एक परिवार की कहानी नहीं है। यह आधुनिक भारत की सामाजिक और आर्थिक विसंगति की कहानी है। आज गांव का किसान अपने बेटे को खेती में नहीं देखना चाहता। वह उसे नौकरी में देखना चाहता है और नौकरी वाला बेटा पूरी जिंदगी नौकरी करने के बाद फिर से खेती में लौटना चाहता है। कितनी विचित्र, परंतु मार्मिक परिक्रमा है यह!
संस्कृत में कहा गया है—
‘कृषिर्धन्या कृषिर्मेधा कृषिर्जीवनमुत्तमम्।’
अर्थात कृषि ही धन है, कृषि ही बुद्धि है और कृषि ही श्रेष्ठ जीवन का आधार है।
लेकिन दुर्भाग्य यह है कि आज किसान का बेटा खेती छोड़ रहा है और शहर का तनावग्रस्त जीवन जीने वाला व्यक्ति खेती की ओर आकर्षित हो रहा है। राष्ट्रीय अपराध रेकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़े बताते हैं कि देश में हर घंटे कम से कम एक किसान आत्महत्या करता है। खेती में बढ़ती लागत, बाजार की अनिश्चितता, न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीदी का अभाव, मौसम की मार, पानी की कमी और उचित मूल्य न मिलना इसके प्रमुख कारण हैं।
लेकिन मैंने उस अधिकारी से कहा- ‘धरती मां कभी अपने बेटे को निराश नहीं करती। एक दाना बोइए, वह कई गुना लौटाती है। समस्या खेती में नहीं, खेती की वर्तमान आर्थिक व्यवस्था में है।’
सच तो यह है कि किसान को धरती नहीं हराती। उसे बाजार हराता है। नीतियां हराती हैं। बिचौलिया हराता है। असंगठित विपणन हराता है। भारत में कृषि उपज का बड़ा हिस्सा किसान सीधे बाजार तक नहीं पहुंचा पाता। किसान उत्पादन करता है, पर मूल्य निर्धारण कोई और करता है। यही कारण है कि खेती लाभ का नहीं, संघर्ष का प्रतीक बनती जा रही है। और यही कारण है कि सेवानिवृत्त सैनिक खेती में लौटना चाहते हुए भी डरते हैं।

पेंशन व्यवस्था पर चल रही राष्ट्रीय बहस को समझना आवश्यक
इसी संदर्भ में सैनिकों की पेंशन व्यवस्था पर चल रही राष्ट्रीय बहस को भी समझना आवश्यक है। लंबे समय से पूर्व सैनिक ‘वन रैंक वन पेंशन’ अर्थात समान रैंक और समान सेवा अवधि वाले सैनिकों को समान पेंशन की मांग करते रहे हैं। सरकार ने ओआरओपी लागू किया, जिससे लाखों पूर्व सैनिकों को लाभ भी मिला, परंतु अनेक संगठनों का मानना है कि इसकी पूर्ण और नियमित समीक्षा अभी भी अपेक्षित है। दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि रक्षा पेंशन पर होने वाला व्यय लगातार बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत का वार्षिक रक्षा पेंशन व्यय लगभग 1.4 लाख करोड़ रुपए के आसपास पहुंच चुका है, जो कई मंत्रालयों के कुल बजट से भी अधिक है। यह विषय केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राष्ट्रीय दायित्व और सैनिक सम्मान से जुड़ा विषय है। इसलिए इसमें संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण आवश्यक है।

दुनिया के अनेक देशों ने इस प्रश्न को बहुत पहले समझ लिया था। अमेरिका में पूर्व सैनिकों के लिए विशेष ‘वेटरन फार्मिंग प्रोग्राम’ चलाए जाते हैं, जहां उन्हें कृषि प्रशिक्षण, कम ब्याज ऋण, बीमा सहायता और बाजार से जोडऩे की सुविधाएं दी जाती हैं। अमरीका में पूर्व सैनिकों के लिए ‘जीआइ बिल’ जैसी व्यवस्थाओं के माध्यम से उच्च शिक्षा और पुन: कौशल प्रशिक्षण की मजबूत व्यवस्था है। वहां सैन्य सेवा के बाद नागरिक जीवन में संक्रमण को राष्ट्रीय जिम्मेदारी माना जाता है। इजराइल जैसे देश में सैनिकों को तकनीकी कृषि, जल प्रबंधन और सामूहिक खेती से जोड़ा जाता है। वहां सेना से निकला व्यक्ति राष्ट्रीय उत्पादन प्रक्रिया का सक्रिय हिस्सा बन जाता है। यूरोप के कई देशों में सैन्य सेवा के बाद रोजगार पुनर्वास, स्वास्थ्य सुरक्षा और पेंशन व्यवस्था को सामाजिक सुरक्षा प्रणाली से मजबूती से जोड़ा गया है। इसके विपरीत भारत में पूर्व सैनिकों के पुनर्वास की व्यवस्थाएं अब भी सीमित, बिखरी हुई और अत्यधिक नौकरशाही नियंत्रण में दिखाई देती हैं। सरकारी नौकरियों में आरक्षण होने के बावजूद बड़ी संख्या में पद खाली रह जाते हैं। पुन: कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों की पहुंच भी सीमित है। ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाले अनेक सैनिकों को सेवानिवृत्ति के बाद अपनी दूसरी पारी की स्पष्ट दिशा नहीं मिल पाती।

सैनिक का जीवन वर्दी उतारने के बाद भी राष्ट्र की जिम्मेदारी
इसी बीच ‘अग्निवीर योजना’ ने इस बहस को और अधिक व्यापक बना दिया है। इस योजना के तहत युवाओं की चार वर्ष के लिए अल्पकालिक भर्ती की व्यवस्था की गई है, जिनमें से लगभग 25 प्रतिशत को आगे नियमित सेवा में रखा जाएगा। सरकार का तर्क है कि इससे सेना अधिक युवा, तकनीकी रूप से सक्षम और आर्थिक रूप से संतुलित बनेगी। इससे रक्षा पेंशन के दीर्घकालिक बोझ में भी कमी आएगी। लेकिन इस योजना को लेकर अनेक चिंताएं भी सामने आई हैं। विशेषज्ञों और पूर्व सैनिक संगठनों का एक वर्ग मानता है कि चार वर्ष बाद बड़ी संख्या में युवा फिर रोजगार बाजार में आएंगे, जिनके सामने पुन: रोजगार की चुनौती होगी। यह भी आशंका व्यक्त की जाती रही है कि यदि उनके लिए पर्याप्त पुनर्वास और रोजगार व्यवस्था नहीं बनी, तो सामाजिक और आर्थिक असंतुलन बढ़ सकता है। हालांकि कई राज्य सरकारों और निजी कंपनियों ने अग्निवीरों को रोजगार में प्राथमिकता देने की घोषणाएं की हैं, परंतु इन व्यवस्थाओं की वास्तविक प्रभावशीलता आने वाले वर्षों में ही स्पष्ट होगी। स्पष्ट है कि भारत को अब सैनिक कल्याण को केवल ‘सेवा अवधि’ तक सीमित नहीं रखना चाहिए। सैनिक का जीवन वर्दी उतारने के बाद भी राष्ट्र की जिम्मेदारी है।

कृषि आधारित पुनर्वास की एक सशक्त राष्ट्रीय नीति बनाने की आवश्यकता
आज आवश्यकता इस बात की है कि देश अपने पूर्व सैनिकों और भविष्य के अग्निवीरों के लिए कृषि आधारित पुनर्वास की एक सशक्त राष्ट्रीय नीति बनाए। क्यों न प्रत्येक जिले में ‘वीर सैनिक प्राकृतिक कृषि क्लस्टर’ स्थापित किए जाएं? क्यों न सेवानिवृत्त होने वाले जवानों को जैविक खेती, औषधीय पौधों, ड्रिप सिंचाई, फूड प्रोसेसिंग, कृषि विपणन और एग्री-स्टार्टअप का विशेष प्रशिक्षण दिया जाए? क्यों न पूर्व सैनिकों को किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ), भूमि बैंक और सहकारी विपणन व्यवस्थाओं से जोड़ा जाए? भारत के सैनिकों के पास अनुशासन है। नेतृत्व क्षमता है। संकट में काम करने की क्षमता है। टीम भावना है। यदि यही शक्ति खेती से जुड़ जाए, तो भारतीय कृषि का चेहरा बदल सकता है। हम अक्सर ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा लगाते हैं। पर शायद अब समय आ गया है कि इस नारे को नए अर्थ दिए जाएं। क्योंकि भारत की असली ताकत उसकी मिट्टी और उसकी वर्दी, दोनों में बसती है।
महाभारत में कहा गया है—
राष्ट्रस्य मूलं कृषि: अर्थात राष्ट्र की वास्तविक जड़ कृषि है। और यदि राष्ट्र की रक्षा सैनिक करता है तथा राष्ट्र की आत्मा किसान बचाता है, तो हमें यह समझना होगा कि जवान और किसान वास्तव में दो नहीं, एक ही शक्ति के दो स्वरूप हैं। शायद आने वाले समय में भारत को केवल सैनिक नहीं चाहिए होंगे, उसे ‘सैनिक किसान’ चाहिए होंगे- ऐसे किसान, जिनके हाथ हल भी चला सकें और आवश्यकता पडऩे पर राष्ट्रध्वज की रक्षा भी कर सकें। जय हिंद। जय जवान। जय किसान।