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संवैधानिक विवेक और संघीय संतुलन से हो परिसीमन

संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा में राज्यों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था करता है और अनुच्छेद 82 प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का मार्ग प्रशस्त करता है।

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जयपुर

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Opinion Desk

May 27, 2026

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loksabha elections

(हरबंश दीक्षितडीन, विधि संकाय, तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद)

लोकसभा के चुनाव क्षेत्रों के परिसीमन की बहस फिर राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में है और कई बार यह उत्तर बनाम दक्षिण के विवाद की सीमा तक पहुंचती दिखती है। लोकसभा के आकार, राज्यों की हिस्सेदारी और महिला आरक्षण के क्रियान्वयन से जुड़े प्रश्न इसे और संवेदनशील बनाते हैं। यदि भविष्य में सीटें जनसंख्या के अनुपात में पुनर्वितरित की जाती हैं, तो तेजी से जनसंख्या वृद्धि वाले राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, जबकि धीमी वृद्धि वाले राज्यों का अनुपात घट सकता है। यह विशेष रूप से दक्षिण भारत और कुछ छोटे तथा पूर्वोत्तर राज्यों की चिंताओं से जुड़ता है। यह प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत केवल मतदाताओं की संख्या का जोड़ नहीं है, बल्कि अनेक भाषाओं, संस्कृतियों और राजनीतिक अनुभवों का संघ है।

क्या केवल जनसंख्या तय करेगी संसद में राज्यों की ताकत?
यहां लोकतंत्र का अर्थ केवल 'एक व्यक्ति, एक वोट' नहीं हो सकता, उसके साथ 'एक राज्य, एक सम्मानजनक आवाज' भी जुड़ी है। यदि जनसंख्या को ही प्रतिनिधित्व की अकेली कसौटी बना दिया जाए, तो बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्य स्वयं को दंडित महसूस कर सकते हैं, जबकि अधिक आबादी वाले राज्यों के नागरिक अपने मत के मूल्य पर सवाल उठा सकते हैं। यह अंतर्विरोध परिसीमन को आज के भारत का एक महत्त्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न बनाता है। यह बहस केवल उत्तर बनाम दक्षिण या बड़े बनाम छोटे राज्यों की राजनीति नहीं है, बल्कि आने वाले दशकों में संसद की संरचना, राज्यों की हिस्सेदारी और केंद्र-राज्य संबंधों की दिशा तय करने वाला मुद्दा है। इसलिए परिसीमन पर विचार करते समय संवैधानिक विवेक और संघीय संतुलन भी जरूरी है। संविधान का अनुच्छेद 81 लोकसभा में राज्यों को जनसंख्या के अनुपात में प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था करता है और अनुच्छेद 82 प्रत्येक जनगणना के बाद परिसीमन का मार्ग प्रशस्त करता है। सिद्धांतत: यह व्यवस्था न्यायपूर्ण प्रतीत होती है, क्योंकि लोकतंत्र में प्रतिनिधित्व का आधार जनसंख्या है। लेकिन भारत जैसे संघीय देश में यह प्रश्न इतना सरल नहीं है।

प्रतिनिधित्व का असंतुलन और बढ़ती मतदाता-सांसद दूरी
वर्ष 1970 के दशक में यह आशंका सामने आई कि यदि प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों का पुनर्वितरण केवल जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो वे राज्य जिन्होंने परिवार-नियोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या-नियंत्रण में बेहतर कार्य किया, राजनीतिक प्रतिनिधित्व में पीछे रह सकते हैं। इसी कारण लोकसभा और विधानसभाओं की सीटों के पुनर्वितरण पर रोक लगाई गई, जिसे बाद में 84वें संविधान संशोधन द्वारा 2026 के बाद की पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया। इस व्यवस्था के पीछे यह चिंता थी कि बेहतर सामाजिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों को उनके ही प्रदर्शन की सजा न मिले। दक्षिण भारत के अनेक राज्यों ने शिक्षा, स्वास्थ्य और जनसंख्या नियंत्रण में उल्लेखनीय प्रगति की है। यदि इस प्रगति का परिणाम राजनीतिक हिस्सेदारी में कमी के रूप में सामने आए, तो यह संघीय न्याय की दृष्टि से असंतोष पैदा कर सकता है। दूसरी ओर, अधिक जनसंख्या वाले राज्यों की चिंता भी महत्त्वपूर्ण है। उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान जैसे राज्यों में एक सांसद पर मतदाताओं का बोझ अत्यधिक बढ़ गया है। यदि एक सांसद लाखों मतदाताओं और बड़े क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है, तो जनसमस्याओं तक उसकी वास्तविक पहुंच कठिन हो जाती है।

समाधान का रास्ता संघीय संतुलन से
इस दृष्टि से लोकसभा के आकार पर पुनर्विचार भी आवश्यक माना जा सकता है। समस्या लोकसभा का आकार बढ़ाने में नहीं, बल्कि उसके सूत्र और समय में है। यदि सीटों की संख्या बढ़ाई जाती है, तो यह स्पष्ट होना चाहिए कि क्या किसी राज्य की वर्तमान हिस्सेदारी घटेगी या नहीं। क्या सभी राज्यों को न्यूनतम सुरक्षा दी जाएगी? क्या जनसंख्या-नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के साथ न्याय होगा? क्या छोटे राज्यों और पूर्वोत्तर की आवाज राष्ट्रीय संसद में और कमजोर नहीं होगी? इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर दिए बिना परिसीमन की प्रक्रिया राजनीतिक विवाद और क्षेत्रीय असंतोष को जन्म दे सकती है। लोकसभा और राज्यसभा के बीच संतुलन का प्रश्न भी इस बहस का महत्त्वपूर्ण पक्ष है। लोकसभा जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि राज्यसभा राज्यों का प्रतिनिधित्व करती है। किंतु भारतीय राज्यसभा अमरीकी सीनेट की तरह प्रत्येक राज्य को समान प्रतिनिधित्व नहीं देती। यहां भी राज्यों की जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व में अंतर है। इसलिए यदि लोकसभा में बड़े राज्यों का प्रभाव बहुत अधिक बढ़ता है और राज्यसभा भी उसे संतुलित करने में पर्याप्त सक्षम नहीं होती, तो संघीय ढांचे में असंतुलन की आशंका बढ़ सकती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में यह स्थिति अत्यंत सावधानी से विचार करने योग्य है। समाधान टकराव में नहीं, संतुलन में है।

पहला, किसी भी राज्य की वर्तमान लोकसभा हिस्सेदारी की न्यूनतम सुरक्षा हो ताकि सीटें घटें नहीं। दूसरा, नई सीटों का वितरण जनसंख्या के साथ भौगोलिक विस्तार, प्रशासनिक सुविधा और क्षेत्रीय संतुलन को ध्यान में रखकर हो। तीसरा, छोटे और पूर्वोत्तर राज्यों की आवाज को विशेष संवैधानिक संवेदनशीलता से सुरक्षित किया जाए। चौथा, राज्यसभा की भूमिका को संघीय संतुलन के उपकरण के रूप में अधिक गंभीरता से देखा जाए। सबसे आवश्यक है कि परिसीमन पर सर्वदलीय और अंतर-राज्यीय सहमति बने। यह प्रक्रिया केवल विधिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक विश्वास पर आधारित होनी चाहिए। परिसीमन का उद्देश्य केवल सीटों की रेखाएं खींचना नहीं, बल्कि प्रतिनिधित्व की न्यायपूर्ण व्यवस्था बनाना भी है।