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वीर सावरकर: क्रांति, राष्ट्रवाद और सामाजिक चेतना के प्रतीक

1910 में उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था, तब उन्होंने फ्रांस के मार्सिले बंदरगाह पर जहाज से समुद्र में कूदकर अदम्य साहस का परिचय दिया।

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जयपुर

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Opinion Desk

May 28, 2026

vir savarkar

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वासुदेव देवनानी, (अध्यक्ष, राजस्थान विधानसभा)

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास अनेक वीरों के त्याग, तपस्या और संघर्ष से भरा हुआ है। इन महान सेनानियों में विनायक दामोदर सावरकर का नाम अत्यंत सम्मान और गर्व के साथ लिया जाता है। वीर सावरकर केवल एक क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि प्रखर राष्ट्रवादी चिंतक, साहित्यकार, समाज सुधारक और दूरदर्शी नेता भी थे। उन्होंने अपना जीवन राष्ट्र की स्वतंत्रता और भारतीय समाज के जागरण के लिए समर्पित कर दिया। वीर सावरकर उन गिने-चुने स्वतंत्रता सेनानियों में थे, जिन्हें अंग्रेजों द्वारा काला पानी की सजा दी गई।

वे संभवत: विश्व के एकमात्र ऐसे स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें ब्रिटिश शासन ने दो-दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई थी। उनका जन्म 28 मई 1883 को महाराष्ट्र के नासिक जिले के भगूर गांव में हुआ। बचपन से ही उनमें राष्ट्रभक्ति की भावना प्रबल थी। युवावस्था में उन्होंने 'मित्र मेला' नामक संगठन बनाया, जो बाद में 'अभिनव भारत' क्रांतिकारी संगठन के रूप में विकसित हुआ। 1905 में उन्होंने पुणे में विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर अंग्रेजी शासन को खुली चुनौती दी।

लंदन से अंडमान तक संघर्ष की गाथा
इस आंदोलन ने युवाओं में स्वतंत्रता की नई चेतना पैदा की। 1906 में वे कानून की पढ़ाई के लिए लंदन गए। वहां उन्होंने 'इंडिया हाउस' को अपनी गतिविधियों का केंद्र बनाया और 'फ्री इंडिया सोसाइटी' से जुड़कर भारतीय विद्यार्थियों को संगठित किया। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक '1857 का स्वातंत्र्य समर' ने अंग्रेजों की नींद उड़ा दी। इस पुस्तक में उन्होंने 1857 की क्रांति को भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम बताया। अंग्रेज सरकार ने इस पर प्रतिबंध लगा दिया, लेकिन यह पुस्तक गुप्त रूप से युवाओं में क्रांति की भावना जगाती रही। 1910 में उन्हें गिरफ्तार कर भारत लाया जा रहा था, तब उन्होंने फ्रांस के मार्सिले बंदरगाह पर जहाज से समुद्र में कूदकर अदम्य साहस का परिचय दिया। हालांकि बाद में उन्हें पुन: अंग्रेजों के हवाले कर दिया गया। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें 50 वर्ष की दोहरी आजीवन कारावास की सजा सुनाकर अंडमान-निकोबार की कुख्यात सेल्यूलर जेल भेज दिया। वहां 1911 से 1921 तक उन्होंने अमानवीय यातनाएं झेलीं।

कालापानी से निकली विचारों की मशाल
उन्होंने जेल की दीवारों पर कीलों और पत्थरों से कविताएं लिखीं तथा हजारों पंक्तियां कंठस्थ कर लीं। यह उनकी असाधारण स्मरण शक्तिऔर साहित्यिक प्रतिभा का परिचायक था। उनके विचारों में राष्ट्रप्रेम, आत्मसम्मान और स्वाधीनता की ज्वाला निरंतर प्रज्वलित होती रही। वीर सावरकर केवल क्रांतिकारी ही नहीं, बल्कि समाज सुधारक भी थे। उन्होंने जातिवाद और छुआछूत का विरोध किया तथा सामाजिक समरसता पर बल दिया। उनका मानना था कि जब तक समाज भेदभाव में बंटा रहेगा, तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं बन सकता। वे विज्ञान, आधुनिकता और आत्मनिर्भर भारत के समर्थक थे। सावरकर एक प्रखर लेखक और ओजस्वी वक्ता भी थे। उन्होंने युवाओं को संगठन, आत्मबल और राष्ट्रहित के लिए कार्य करने का संदेश दिया। उनका मानना था कि राष्ट्र की स्वतंत्रता याचना से नहीं, बल्कि संघर्ष और आत्मसम्मान से प्राप्त होती है। 26 फरवरी 1966 को उन्होंने देह त्याग दी, लेकिन उनके विचार और संघर्ष आज भी प्रेरणा देते हैं। संसद भवन में उनका चित्र स्थापित है और अंडमान की सेल्यूलर जेल राष्ट्रीय स्मारक के रूप में संरक्षित है। उनका जीवन त्याग, साहस, आत्मसम्मान और राष्ट्रभक्ति की ऐसी प्रेरक गाथा है,जो आने वाली पीढिय़ों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करती रहेगी।

केंद्र सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनके जीवन को देश के लिए समर्पित और उनकी राष्ट्रभक्ति को आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणादायक बताया है। वह भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे महान सेनानी थे, जिन्होंने अपने विचारों, लेखनी और संघर्ष से देशभक्ति की नई चेतना जगाई।वे ऐसे राष्ट्रनायक थे, जिन्होंने अपने जीवन का हर क्षण भारत माता की सेवा में समर्पित कर दिया। उनका जीवन हमें साहस, आत्मसम्मान, संगठन और राष्ट्रभक्ति का संदेश देता है। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में उनका उल्लेखनीय योगदान भारतीय इतिहास में सदैव अमर रहेगा।