
डॉ. राजाराम त्रिपाठी, (कृषि एवं ग्रामीण अर्थशास्त्र विशेषज्ञ)
जून के अंतिम सप्ताह में जब मैं फ्रांस की राजधानी पेरिस में था, उसी समय पूरा यूरोप भीषण हीट वेव की गिरफ्त में था। पेरिस, जिसे दुनिया अपने सौंदर्य, अनुशासित नगरीय नियोजन और हरियाली के लिए जानती है, वहां की तपती सड़कों पर चलते हुए लगा जैसे प्रकृति मनुष्य के अहंकार का सार्वजनिक परीक्षण कर रही हो। विशाल वृक्षों से आच्छादित बुलेवार्ड, शहर के चारों ओर फैले हरित क्षेत्र, हरियाली से सजे राजमार्ग, आधुनिक शीतलन व्यवस्था और अरबों यूरो की पर्यावरणीय परियोजनाओं के बावजूद फ्रांस इस बार प्रकृति के प्रकोप के सामने असहाय दिखाई दिया। फ्रांस की सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंसी के अनुसार हाल की हीट वेव के दौरान देश में एक हजार से अधिक अतिरिक्त मौतें दर्ज की गईं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार पूरे यूरोप में 1300 से अधिक अतिरिक्त मौतें हुईं और लगभग 19 करोड़ लोग 35 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान झेलने को विवश हुए। जर्मनी, पोलैंड, चेक गणराज्य और हंगरी जैसे देशों में तापमान के पुराने सारे रेकॉर्ड टूट गए। ये आंकड़े केवल संख्या नहीं, बल्कि स्पष्ट चेतावनी हैं। प्रकृति समय-समय पर मनुष्य को उसकी सीमाएं याद दिलाती है। किंतु मनुष्य, विशेषकर तथाकथित विकसित समाज, स्वयं को प्रकृति का स्वामी मान बैठा है। हमने नदियों को नालों में बदला, जंगलों को उद्योगों के हवाले किया, पर्वतों को विस्फोटकों से छलनी किया और अब जब प्रकृति प्रतिकार कर रही है, तब हम सम्मेलनों, घोषणाओं और कार्बन क्रेडिट के व्यापार में समाधान खोज रहे हैं। अंग्रेज दार्शनिक और कवि टी. एस. इलियट ने लिखा था, 'ह्यूमनकाइंड कैननॉट बीयर वेरी मच रियलिटी'। आज जलवायु परिवर्तन वही कठोर यथार्थ बनकर हमारे सामने खड़ा है, जिससे आंखें चुराना अब संभव नहीं।
भारत में भी स्थिति कम चिंताजनक नहीं है। इस वर्ष मानसून लगभग एक माह तक विलंबित रहा। देश के अनेक हिस्सों में बुवाई प्रभावित हुई है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि वर्षा का वितरण असंतुलित रहा, तो खरीफ उत्पादन पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है। विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश भारत के लिए यह केवल कृषि संकट नहीं, बल्कि संभावित खाद्य सुरक्षा संकट भी है। विश्व की सर्वाधिक जनसंख्या वाले देश भारत के लिए यह संभावित खाद्य सुरक्षा संकट भी है। विडंबना देखिए। जिस बस्तर को कभी मोटे अनाजों की जीवित प्रयोगशाला कहा जा सकता था, वहां आज पारंपरिक फसलें तेजी से स्मृतियों में बदल रही हैं। मेरे बचपन में आंखों देखी है कि कुछेक दशकों पूर्व बस्तर के अंदरूनी गांवों में धान के साथ-साथ मंडया अर्थात रागी, कोदो, कुटकी, कोसरा, सांवां,कुल्थी, झुनगा, भदई, जोंधरी अर्थात ज्वार तथा देशी मक्का की भरपूर खेती होती थी। ये फसलें केवल अन्न नहीं थीं, बल्कि बस्तर की जैव विविधता, पोषण सुरक्षा और सांस्कृतिक अस्मिता की जीवित अभिव्यक्ति थीं।
आज पूरी दुनिया इन्हीं मोटे अनाजों को 'सुपर फूड' कहकर सिर आंखों पर बिठा रही है। अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इनकी मांग बढ़ रही है। किंतु विडंबना यह है कि जिन समुदायों ने हजारों वर्षों तक इन्हें बचाकर रखा, उन्हीं को तथाकथित विकास ने इनसे दूर कर दिया। हमने बस्तर के किसान को धान का किसान बनाया, फिर हाइब्रिड मक्का का किसान बनाया और अब उसे रासायनिक कृषि उद्योग का स्थायी ग्राहक बना दिया है। बस्तर के राष्ट्रीय राजमार्गों के किनारे स्थित अनेक तथाकथित प्रगतिशील सब्जी व फल उत्पादक क्षेत्रों में यदि आप दस मिनट भी खड़े हो जाएं, तो रासायनिक कीटनाशकों की तीखी गंध से चक्कर आने लगेंगे। जब बस्तर जैसे वनाच्छादित, आदिवासी और अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्र भी बहुराष्ट्रीय कृषि कंपनियों के बाजारवादी मकडज़ाल में इस सीमा तक उलझ चुके हों, तब शेष देश की स्थिति की कल्पना सहज ही की जा सकती है। हमने पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पंचमहाभूतों में विष घोल दिया है। फिर यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि प्रकृति हमें बिना दंड दिए छोड़ देगी?
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम पुन: प्रकृति की पाठशाला में लौटें। हमें अपने जनजातीय पूर्वजों से सीखना होगा, जिन्होंने हजारों वर्षों तक प्रकृति के साथ संघर्ष नहीं, सहजीवन का मार्ग अपनाया। उन्होंने जंगल को संसाधन नहीं, रिश्तेदार माना, नदी को परियोजना नहीं, जीवन माना और धरती को बाजार नहीं, माता माना। यह समय चेतावनी को समझने का है, न कि उसे अनदेखा करने का। यदि हमने अभी भी प्रकृति के साथ अपने संबंधों को नहीं सुधारा, तो आने वाली पीढिय़ों के हिस्से में केवल संकट ही बचेगा।