
विदेशी धरती से मध्य प्रदेश के जंगलों में लाए गए चीतों का भारतीय जलवायु में ढलना और उनकी संख्या बढऩा वन्यजीव संरक्षण के लिहाज से उत्साहजनक है। लेकिन श्योपुर के जंगल में चीता निर्वा के घायल मिले 19 माह के शावक केएनजी-22 की मौत ने इस सफलता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। शिकार के इरादे से उस पर गोली चलाई गई या ग्रामीणों ने उसे भगाने के लिए एयरगन का इस्तेमाल किया, यह जांच के बाद ही सामने आएगा, लेकिन दोनों ही परिस्थितियां वन्यजीवों की सुरक्षा से जुड़ी चुनौतियों की ओर इशारा करती हैं। यह घटना चेतावनी है कि चीतों को अनुकूल वातावरण, पर्याप्त भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियां उपलब्ध कराना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें मानवीय गतिविधियों से सुरक्षित रखना भी उतना ही जरूरी है। वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी, जब वे जंगलों में सुरक्षित जीवन जी सकें।
देश में बाघ संरक्षण का अनुभव इस दिशा में उपयोगी हो सकता है। बाघों के संरक्षण के लिए विशेष प्रयास किए गए। संरक्षित क्षेत्र, निगरानी, शिकार निरोधक दल और वन विभाग की सक्रियता जैसे उपायों ने इसमें अहम भूमिका निभाई। चीतों के मामले में भी स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप ऐसी व्यवस्था मजबूत करनी होगी। उनके विचरण वाले इलाकों में नियमित गश्त, कैमरा ट्रैप, जीपीएस आधारित निगरानी और संवेदनशील स्थानों पर वनकर्मियों की तैनाती बढ़ानी होगी। स्थानीय ग्रामीणों को भी संरक्षण अभियान का भागीदार बनाना अनिवार्य है। जंगल के आसपास रहने वाले लोगों को समझाना होगा कि चीता दिखने पर घबराकर उस पर हमला करना या उसे भगाने के लिए एयरगन अथवा दूसरे हथियारों का इस्तेमाल करना खतरनाक है। वन विभाग को चाहिए कि वह गांवों में नियमित जागरूकता शिविर आयोजित करे। स्थानीय भाषा में पोस्टर, पर्चों और छोटे वीडियो के माध्यम से बताया जाए कि चीता दिखाई देने पर सुरक्षित दूरी बनाए रखें, उसके पास जाने या उसे घेरने की कोशिश न करें और तुरंत वन विभाग को सूचना दें। गांवों में संपर्क अधिकारी नियुक्त करना और चौबीसों घंटे सक्रिय हेल्पलाइन उपलब्ध कराना उपयोगी हो सकता है। ग्रामीणों को भरोसा भी दिलाना होगा कि उनकी सुरक्षा और आजीविका सरकार की प्राथमिकता है। इससे ग्रामीणों में वन्यजीव संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी की भावना बढ़ेगी। दूसरी ओर, यदि जांच में शिकार की मंशा सामने आती है, तो इसे सामान्य घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। दोषियों की पहचान कर कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए।चीतों को भारत वापस लाना जितना कठिन था, उन्हें सुरक्षित रखना भी उतनी ही बड़ी चुनौती है। केवल वन विभाग ही नहीं, बल्कि सरकार, स्थानीय समुदायों और समाज की इसमें साझा जवाबदेही है। किसी शावक की मौत महज एक वन्यजीव की क्षति नहीं, बल्कि संरक्षण व्यवस्था की परीक्षा भी है।