
शी जिनपिंग वे सारी शक्तियां प्राप्त कर चुके हैं जो उन्हें चीन की सत्ता में आजीवन रखने के लिए पर्याप्त हैं। वे तो राजनीतिक विचारधारा में 'शी जिनपिंग थॉट' को भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में जुड़वा चुके हैं जिसे 'नए युग के लिए चीनी विशेषताओं वाले समाजवाद पर शी जिनपिंग के विचार' नाम दिया गया है। इससे पहले केवल माओ त्से तुंग और डेंग श्याओपिंग की विचारधारा ही कम्युनिस्ट पार्टी के संविधान में शामिल थी। लेकिन फिर भी ऐसा लगता है कि या तो जिनपिंग की महत्वाकांक्षाएं बहुत अधूरी सी हैं अथवा वे चीन के अंदर कुछ दरकने की आहटें सुनकर परेशान हैं। यदि ऐसा न होता तो शायद 1934 के 'लॉन्ग मार्च' को अब ग्लोरीफाई करने की जरूरत न आ पड़ती।
शी जिनपिंग इस समय माओ त्से तुंग और कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा 1934 में शुरू किए गए लॉन्ग मार्च को पुन: जन-जन तक पहुंचाने के लिए जिहादी रुख अपनाए हुए हैं। इसकी वजह क्या है? एक तो यह कि चीन जिस तरह से कई प्रकार की आंतरिक चुनौतियों का सामना कर रहा है उसे सरकारी तंत्र सतह से ऊपर नहीं आने देता। चीन में जिस तरह से घरेलू मांग घट रही है, वह अर्थव्यवस्था में बड़े बुलबुले के बनने का संकेत देती है।
देर सबेर यह फूटेगा जरूर। इसलिए जिनपिंग लोगों का ध्यान घरेलू कलह से माओ के संघर्ष (विशेषकर लॉन्ग मार्च) की ओर ले जाना चाहते हैं जिसमें चीनी स्वर्ण युग की छद्म व्यंजना को दिखा सकें। दूसरी यह कि चीन का जेन-जी न ही माओ के संघर्ष को जानता है और न उनके विचारों के विषय में। उसकी दुनिया अलग है। लेकिन माओ उनके दिमागों में ठूंसना जरूरी है। यह उन्हें माओ के 'लॉन्ग मार्च' में दिखा, अत: हथियार बना लिया। यदि लोग इससे बंधे रहे तो चीन दुनिया की उथल-पुथल से बेअसर रहेगा अन्यथा बहुत कुछ डरावना तो है ही। दरअसल चीन के सरकारी मीडिया ने 'लॉन्ग मार्च' की 90वीं वर्षगांठ के अवसर पर अंग्रेजी भाषा में एक डॉक्यूमेंट्री जारी की है जिसमें दावा किया गया है कि 'लॉन्ग मार्च दृढ़ता, एकजुटता और आशा' की एक कहानी है। यह चीन के गृहयुद्ध के दौरान संघर्षरत कम्युनिस्टों की उस प्रसिद्ध, बेहद कठिन सैन्य वापसी का नाम है, जिसने चीनी इतिहास में एक विशेष स्थान हासिल किया। खास बात यह है कि इस डॉक्यूमेंट्री शृंखला के प्रस्तोता लॉन्ग मार्च के हजारों मील लंबे रास्ते के कुछ हिस्सों पर पुन: चलते दिखाई देते हैं और जगह-जगह पर आदर्शवादी और भावुक बातें करते हैं।
एक प्रस्तोता उन दुर्गम क्षेत्रों में उभर चुकी गगनचुंबी इमारतों और डेटा सेंटरों को देखकर आश्चर्यचकित होते हुए कहता है, 'हमने न केवल इतिहास को देखा, बल्कि भविष्य को भी देखा।' अंतिम कड़ी में दूसरा प्रस्तोता भावुक स्वर में कहता है, 'आशा की राह पर चलने वाले लोग हमेशा रहेंगे।' इस भावुकता के जरिये शी जिनपिंग कम्युनिस्ट पार्टी के प्रति युवाओं में एक ठोस मनोविज्ञान विकसित करना चाहते हैं।
'लॉन्ग मार्च' को लेकर एक और डॉक्यूमेंट्री जिसकी सह-निर्माता पीपल्स लिबरेशन आर्मी है और उसे नाम दिया गया है- 'द ग्रेट एक्सपेडिशन'(महान अभियान)। यह डॉक्यूमेंट्री भी 1930 के दशक के अंधकारमय दौर के बाद चीन के आधुनिकीकरण का उत्सव मनाती है और धीरे से राष्ट्रपति शी जिनपिंग को इस विकास के केंद्र में ले आती है।
हालांकि कुछ समीक्षक यह मानते हैं कि इस डॉक्यूमेंट्री का प्रमुख संदेश है कि, 'जब आप यह तय न कर पा रहे हों कि क्या करना है, तो माओ की ओर देखिए….।' लेकिन यह इसके पीछे जिनपिंग को खड़ा करके यह बताना चाहती है कि दरअसल माओ की ओर नहीं, जिनपिंग की ओर देखना है। यही वजह है कि इस डॉक्यूमेंट्री में जिनपिंग के भी कुछ दृश्य दिखाई देते हैं जबकि जिनपिंग का 'लॉन्ग मार्च' से दूर-दूर तक लेना-देना नहीं है।सैनिकों को इस डॉक्यूमेंट्री को गौर से देखना होगा क्योंकि हाल के वर्षों में निष्ठा की कमी के आरोपों के चलते दर्जनों जनरलों को पद से हटाया जा चुका है। जैसा कि जिनपिंग कह चुके हैं, 'हर पीढ़ी का अपना लॉन्ग मार्च होता है।' यह जिनपिंग का वही डर है जिसे वे डॉक्यूमेंट्री के जरिये दूर करने का आश्वासन चाहते हैं। यानि 'लॉन्ग मार्च' शी की ताकत नहीं डर से उपजी सुरक्षा की कुंजी है। फिर भी यदि अपेक्षित परिणाम नहीं मिले तो? तो वे भारत की पूर्वोत्तर सीमा की तरफ जरूर देखेंगे। भारत हिमालयी राज्य अरुणाचल प्रदेश के जेमिथांग और अन्य इलाकों में अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए कंक्रीट और धन, दोनों झोंक रहा है। यही राज्य दोनों देशों के बीच हुए एकमात्र युद्ध का प्रमुख रणक्षेत्र भी रहा है। हालांकि कुछ झड़पों को छोड़ दें, तो 1975 के बाद से अरुणाचल प्रदेश में कोई सैन्य टकराव नहीं हुआ है। यहां तक कि 2020 में, जब पश्चिम में 1,500 किलोमीटर दूर गलवान में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हाथापाई हुई थी, तब भी अरुणाचल प्रदेश की सीमा शांत रही थी। लेकिन ऐसी स्थिरता को भी बहुत सुखद नहीं माना जा सकता क्योंकि भारतीय सीमा की ओर जाने वाली सड़कें सैन्य शिविरों से घिरी हुई हैं। अनुमान है कि इस क्षेत्र में 90,000 से 1,20,000 तक चीनी सैनिक तैनात हैं।
चीन ने अपनी ओर सड़कों का एक व्यापक नेटवर्क ही तैयार नहीं किया है बल्कि उसने सैकड़ों ऐसे 'दोहरी उपयोगिता वाले' गांव भी बसा लिए हैं, जहां नागरिक बस्तियों के साथ सैन्य बुनियादी ढांचा भी मौजूद है। भारत अब इस कमी को तेजी से दूर करने में जुटा है। एक बात और, शी जिनपिंग 2027 तक पीएलए को एक विश्व स्तरीय सेना बनाने की मंशा रखते हैं। इसके साथ ही यूनीफिकेशन और रीजनल वॉर को वरीयता देते हैं। वैसे चीन भारत के साथ कोई बड़ा युद्ध करना कदापि नहीं चाहेगा, लेकिन वह भारत को दबाव मे रखने की कोशिश करता रहेगा। मुख्य रूप से तो शी जिनपिंग के निशाने पर ताइवान है लेकिन भारत उपमहाद्वीपीय शक्ति और ग्लोबल साउथ के लीडर के तौर पर स्वीकार्य हो रहा है इसलिए चीन यदि रियूनीफिकेशन के बहाने ताइवान और तिब्बत को निशाना बनाने की कोशिश कर सकता है तो वह अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम तक अपनी हरकतों के दायरे का विस्तार भी करने की कोशिश कर सकता है। जो भी हो आज का युग यथार्थवाद से कहीं अधिक प्रतीकवाद और संदेहवाद का है। चीन इनमें से दो यानि प्रतीकवाद और संदेहवाद का सहारा अधिक ले रहा है। ध्यान रहे कि चीन बहुआयामी से बहुरूपिए तक की भूमिका में है जिसमें व्यापार के 'वेपनाइजेशन' से लेकर डिप्लोमैटिक सिंबोलिज्म तक बहुत कुछ शामिल है। इसलिए भू-राजनीतिक खेल अब सिर्फ इन दो शब्दों तक ही सीमित नहीं रह गया है बल्कि बहुत कुछ है जो अदृश्य है।
डॉ. रहीस सिंह,(अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार)