
कुड़की गांव के रहने वाले नाथुराम जाट पिछले छह साल से पॉलीहाउस बनाकर खीरे की खेती कर रहे है। वे बताते है कि पॉलीहाउस बनाने के लिए सरकार की ओर से सब्सिडी मिलती है। इस तरह से खेती करने पर पैदावार में दो से तीन गुना तक बढ़ोतरी हो गई। पानी की जरूरत कम पड़ती है। उन्होंने यह खेती करने के लिए खेत के एक हिस्से में फार्म पौंड भी बना रखा है। इसमें बरसात का पानी एकत्रित कर सिंचाई करते हैं। उनका कहना है कि फसल तो अच्छी होती है, लेकिन स्थानीय स्तर पर बाजार नहीं है। इस कारण फसल बेचने के लिए ब्यावर, पुष्कर व जयपुर जाना पड़ता है। इससे फसल की लागत बढ़ जाती है।
20 साल से सिर्फ ऑर्गेनिक खेती
बलाड़ा के रहने वाले किसान चैनसिंह की उम्र 70 वर्ष हो चुकी है। वे ऑर्गेनिक खेती ही करते हैं। फसलों से कीट नष्ट करने के लिए भी छाछ व हिंग मिलाकर छिड़काव करते हैं। इसके अलावा अन्य देसी नुस्खे ही उपयाेग में लेते हैं। वे कहते हैं कि जैविक खेती से उत्पादन अधिक होता है। यह अनाज सेहत के लिए बेहतर है। इसके साथ ही भूमि भी अधिक समय तक उपजाऊ रहती है। इसकी लागत के बारे में उनका कहना था कि यह भ्रम है कि ऑर्गेनिक खेती की लागत अधिक आती है। जबकि वास्तव में लागत कम आती है। वे धनिया, मैथी, जीरा व गेेहूं का उत्पादन लेते है। इसके अलावा तिल, मूंग व बाजरा भी उगाते हैं।