चुनाव आयोग ने विपक्षी सांसदों के साथ बैठक भी बुलाई है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब बिहार में SIR प्रक्रिया को लेकर संसद के मानसून सत्र में लगातार बहस हो रही है।
बिहार में चल रही स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) प्रक्रिया को लेकर सियासी घमासान तेज हो गया है। 11 अगस्त को 300 से अधिक सांसद चुनाव आयोग (ECI) के दफ्तर तक मार्च करेंगे। विपक्षी सांसदों का आरोप है कि आयोग के मतदाता सूची संशोधन कार्य में गंभीर अनियमितताएं हुई हैं। इस बीच, चुनाव आयोग ने विपक्षी सांसदों के साथ बैठक बुलाई है। यह कदम उस समय उठाया गया है जब बिहार में SIR प्रक्रिया को लेकर संसद के मानसून सत्र में लगातार बहस हो रही है। विपक्ष का दावा है कि इस प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर बिना वजह मतदाताओं के नाम सूची से हटा दिए गए हैं।
चुनाव आयोग की ओर से कहा गया है कि दावा और आपत्ति अवधि शुरू होने के बाद से अब तक किसी भी राजनीतिक दल ने औपचारिक रूप से एक भी दावा या आपत्ति दर्ज नहीं कराई है। आंकड़ों के अनुसार, राजनीतिक दलों ने बड़ी संख्या में बूथ लेवल एजेंट (BLA) नियुक्त किए जैसे राष्ट्रीय जनता दल (RJD) ने 47,506 और भारतीय जनता पार्टी (BJP) ने 53,338 लेकिन इन एजेंटों ने कोई आपत्ति दर्ज नहीं की।
वहीं, 8,341 दावे और आपत्तियां सीधे मतदाताओं ने दी हैं, लेकिन इन पर अभी निर्णय नहीं हुआ है। नियम के मुताबिक, इन दावों का निपटारा 7 दिन बाद ही किया जा सकता है, जब तक कि पात्रता दस्तावेजों की जांच पूरी न हो जाए।
बिहार SIR राज्य विधानसभा चुनाव से पहले व्यापक मतदाता सत्यापन अभियान है। इसका उद्देश्य पात्र मतदाताओं का नाम जोड़ना और अपात्र के नाम हटाना बताया गया है। लेकिन खबरें आई हैं कि अल्पसंख्यक समुदायों और प्रवासी मजदूरों के नाम बड़े पैमाने पर हटाए गए हैं। SIR के आदेश के अनुसार, 1 अगस्त 2025 को प्रकाशित ड्राफ्ट लिस्ट से कोई भी नाम बिना ERO/AERO द्वारा जांच, सुनवाई और स्पीकिंग ऑर्डर जारी किए नहीं हटाया जा सकता।
विवाद तब और बढ़ गया जब चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि वह फिलहाल बिहार की ड्राफ्ट मतदाता सूची से हटाए गए 65 लाख नामों की पहचान या उनके नाम हटाने के कारण साझा नहीं कर सकता। आयोग ने यह भी दोहराया कि वह मतदाता सूची का डिजिटल, मशीन-रीडेबल संस्करण जारी नहीं करेगा।