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शहादत को सलाम! 26 साल में 1425 जवानों का सर्वोच्च बलिदान, लाल आतंक के खात्मे की पूरी कहानी…

Anti-Naxal Operations India: देशभर के 26 राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल तक के जवानों ने इस संघर्ष में हिस्सा लिया और अपने अदम्य साहस, रणनीति और बलिदान के दम पर लाल आतंक की जड़ों को कमजोर करते हुए अंततः उसे समाप्ति की कगार तक पहुंचा दिया।

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Apr 10, 2026
शहादत को सलाम! 26 साल में 1425 जवानों का सर्वोच्च बलिदान, लाल आतंक के खात्मे की पूरी कहानी...(photo-patrika)

Anti-Naxal Operations India: छत्तीसगढ़ की धरती पर दशकों तक कहर बरपाने वाले नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई अब निर्णायक मोड़ पर पहुंच चुकी है। देशभर के 26 राज्यों और पड़ोसी देश नेपाल तक के जवानों ने इस संघर्ष में हिस्सा लिया और अपने अदम्य साहस, रणनीति और बलिदान के दम पर लाल आतंक की जड़ों को कमजोर करते हुए अंततः उसे समाप्ति की कगार तक पहुंचा दिया। इस लंबी लड़ाई में 1425 जवानों ने अपने प्राणों की आहुति दी- एक ऐसी शहादत, जिसने इतिहास में अमिट छाप छोड़ी है।

Anti-Naxal Operations India: देशव्यापी मोर्चा: एकजुट होकर लड़ा गया युद्ध

नक्सलवाद के खिलाफ यह सिर्फ एक राज्य की नहीं, बल्कि पूरे देश की लड़ाई थी। छत्तीसगढ़ पुलिस के साथ-साथ CRPF, BSF, ITBP, SSB, CISF, ग्रेहाउंड्स, महाराष्ट्र STF, मिजो और नागा बटालियन जैसे विशेष बलों ने मोर्चा संभाला। सीमावर्ती इलाकों और घने जंगलों में फैले इस नेटवर्क को खत्म करने के लिए संयुक्त ऑपरेशन चलाए गए, जिनमें नेपाल के सुरक्षाबलों का भी सहयोग रहा।

1425 शहीद: सबसे ज्यादा बलिदान छत्तीसगढ़ के नाम

नक्सलवाद के खिलाफ लंबे और कठिन संघर्ष में सबसे बड़ी कीमत देश के सुरक्षाबलों ने चुकाई है। बीते 26 वर्षों में कुल 1425 जवानों ने अपनी शहादत देकर इस लड़ाई को निर्णायक मोड़ तक पहुंचाया। इनमें सबसे अधिक 861 जवान छत्तीसगढ़ पुलिस के रहे, जो इस बात का प्रमाण है कि इस जंग का सबसे बड़ा मोर्चा इसी राज्य में रहा।

बस्तर, दंतेवाड़ा, सुकमा और नारायणपुर जैसे घने जंगलों वाले इलाके नक्सलियों के मजबूत गढ़ माने जाते थे, जहां सुरक्षाबलों को हर कदम पर जानलेवा चुनौतियों का सामना करना पड़ा। इसके अलावा उत्तरप्रदेश के 129, बिहार के 57, मध्यप्रदेश के 47 और राजस्थान के 34 जवानों ने भी इस अभियान में अपने प्राण न्यौछावर किए।

ये आंकड़े केवल संख्या नहीं हैं, बल्कि उस त्याग, साहस और कर्तव्यनिष्ठा की गवाही देते हैं, जिसके दम पर देश ने लाल आतंक के खिलाफ यह निर्णायक लड़ाई लड़ी। छत्तीसगढ़ में हुए सर्वाधिक बलिदान यह भी दर्शाते हैं कि यहां की जमीन ने सबसे ज्यादा संघर्ष और वीरता की कहानियों को जन्म दिया, जहां जवानों ने हर परिस्थिति में डटे रहकर राष्ट्र की सुरक्षा को सर्वोपरि रखा।

1730 नक्सली ढेर: ऑपरेशन का निर्णायक असर

सुरक्षाबलों ने लगातार रणनीतिक ऑपरेशन चलाते हुए 1730 नक्सलियों को मार गिराया। इनमें कई बड़े और कुख्यात चेहरे शामिल थे, जो वर्षों से सुरक्षा एजेंसियों के लिए चुनौती बने हुए थे। खास बात यह रही कि नक्सलियों की तथाकथित “मिलिट्री बटालियन”-जो सबसे खतरनाक मानी जाती थी- उसे भी पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया।

बस्तर में बड़ी कामयाबी: टॉप कमांडरों का खात्मा

2025-26 के दौरान चलाए गए विशेष अभियानों में सुरक्षाबलों को निर्णायक और रणनीतिक सफलता हासिल हुई, जिसने नक्सल संगठन की कमर तोड़ दी। इन ऑपरेशनों में लंबे समय से वांछित और संगठन के शीर्ष स्तर पर सक्रिय कई बड़े नक्सली नेता मारे गए। इनमें सेंट्रल कमेटी के महासचिव बसवराजू (नंबाला केशव राव) जैसे शीर्ष रणनीतिकार, कुख्यात और प्रभावशाली कमांडर माडवी हिड़मा, मनोज उर्फ बालकृष्ण तथा केंद्रीय कमेटी सदस्य सुधाकर शामिल हैं। ये सभी नक्सली नेटवर्क के संचालन, भर्ती, फंडिंग और बड़े हमलों की साजिश रचने में अहम भूमिका निभाते थे।

इन शीर्ष नेताओं के मारे जाने से न केवल संगठन की निर्णय लेने की क्षमता कमजोर हुई, बल्कि जमीनी स्तर पर उसका मनोबल भी बुरी तरह गिरा। लगातार हो रहे इन सटीक और खुफिया आधारित अभियानों के चलते नक्सलियों की रणनीतिक पकड़ ढीली पड़ी और उनका पूरा ढांचा बिखरने लगा, जिससे अंततः नक्सलवाद के खात्मे की दिशा में यह एक बड़ा और निर्णायक मोड़ साबित हुआ।

रणनीति और समर्पण: जीत की असली वजह

नक्सलवाद के खिलाफ मिली इस बड़ी सफलता के पीछे केवल हथियारों की ताकत नहीं, बल्कि बहुस्तरीय रणनीति, आधुनिक तकनीक का प्रभावी उपयोग और जवानों का अटूट जज्बा निर्णायक साबित हुआ। सुरक्षाबलों ने अपने इंटेलिजेंस नेटवर्क को मजबूत करते हुए जमीनी स्तर पर सटीक और समय पर जानकारी जुटाई, जिससे ऑपरेशनों की सफलता दर में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। इसके साथ ही ड्रोन और अत्याधुनिक सर्विलांस तकनीकों का उपयोग बढ़ाकर नक्सल प्रभावित क्षेत्रों की निगरानी को अधिक प्रभावी बनाया गया।

स्थानीय स्तर पर पुलिस और आम नागरिकों के बीच विश्वास कायम करने के प्रयासों ने भी अहम भूमिका निभाई, जिससे सूचनाओं का प्रवाह बेहतर हुआ और नक्सलियों की गतिविधियों पर लगाम लगी। वहीं, लगातार सर्च ऑपरेशन और एरिया डोमिनेशन के जरिए सुरक्षाबलों ने नक्सलियों के सुरक्षित ठिकानों को खत्म करते हुए उनके नेटवर्क को पूरी तरह कमजोर कर दिया, जो अंततः इस निर्णायक जीत का आधार बना।

अब नक्सलमुक्त छत्तीसगढ़ की ओर

लगातार चलाए गए सघन ऑपरेशनों, प्रभावी सरेंडर नीति और पड़ोसी राज्यों- महाराष्ट्र, तेलंगाना और आंध्रप्रदेश- के समन्वित सहयोग के चलते नक्सलवाद अब समाप्ति के कगार पर पहुंच चुका है। सुरक्षाबलों की संयुक्त रणनीति ने नक्सलियों के नेटवर्क, सप्लाई लाइन और सुरक्षित ठिकानों को पूरी तरह कमजोर कर दिया।

सरकार की पुनर्वास और सरेंडर नीति के कारण कई बड़े और सक्रिय नक्सलियों ने हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का रास्ता चुना, जबकि जो संगठन में सक्रिय रहे, वे लगातार मुठभेड़ों में ढेर होते गए। इस व्यापक और बहुआयामी अभियान ने नक्सलवाद की जड़ों को इस कदर हिला दिया है कि अब यह समस्या अपने अंतिम चरण में दिखाई दे रही है।

शहादत की विरासत: देश हमेशा रहेगा ऋणी

इन 1425 जवानों की शहादत सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि देश की सुरक्षा और शांति की नींव है। उनके साहस और बलिदान ने यह साबित किया कि आतंक कितना भी गहरा क्यों न हो, देश की एकजुट ताकत के आगे टिक नहीं सकता। छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद के खात्मे की यह कहानी केवल सैन्य सफलता नहीं, बल्कि साहस, रणनीति और बलिदान का संगम है। यह उन वीर जवानों को समर्पित है, जिन्होंने अपनी जान देकर आने वाली पीढ़ियों को सुरक्षित भविष्य दिया।

Updated on:
10 Apr 2026 10:50 am
Published on:
10 Apr 2026 10:49 am
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