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Bulimia Nervosa : क्या होता है ईटिंग डिसऑर्डर? डाइटिशियन डॉ. सोनल ढेमला से जानें इसके लक्षण और उपाय

Bulimia Nervosa: क्या आप भी खाने के तुरंत बाद वॉशरूम भागते हैं? यह बुलीमिया नर्वोसा के लक्षणों में से एक हो सकता है। जानिए ईटिंग डिसऑर्डर के कारण और बचाव के उपाय।
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Jul 20, 2026
Bulimia Nervosa Behaviour Changes Symptoms Eating Disorder
क्या आपको भी है 'बुलीमिया'? (Photo : AI)

Bulimia Nervosa : अक्सर बदलते लाइफस्टाइल और मानसिक तनाव के कारण लोग कई तरह की बीमारियों का शिकार हो जाते हैं। इन्हीं में से एक गंभीर समस्या है 'बुलीमिया नर्वोसा'। यह एक ऐसा ईटिंग डिसऑर्डर (Eating Disorder) है, जिससे पीड़ित व्यक्ति पहले तो एक ही बार में बहुत सारा खाना खा लेता है (Binge Eating) और फिर वजन बढ़ने के डर से या ग्लानि (Guilt) के कारण उस खाने को शरीर से बाहर निकालने की कोशिश करने लगता है (Purging)। यह समस्या पुरुषों की तुलना में महिलाओं और किशोरों (Teenagers) में अधिक देखी जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर यह ईटिंग डिसऑर्डर क्यों होता है? इसके लक्षण क्या हैं और इसका इलाज कैसे संभव है?

Understanding Bulimia: क्या होता है बुलीमिया नर्वोसा?

बुलीमिया से पीड़ित व्यक्ति का भोजन और अपने शरीर के वजन पर नियंत्रण नहीं रहता। इस बीमारी में दो मुख्य चक्र (Cycles) होते हैं:

  • बिंज ईटिंग (Binge Eating): इसमें व्यक्ति बहुत कम समय में सामान्य से कहीं अधिक मात्रा में खाना खा लेता है। खाते समय उसे महसूस होता है कि वह खुद को रोक नहीं पा रहा है।
  • पर्जिंग (Purging): अत्यधिक खाने के बाद व्यक्ति को अपराधबोध, शर्म और वजन बढ़ने का डर सताने लगता है। इस डर से छुटकारा पाने के लिए वह उल्टी (Force Vomiting) करता है, जरूरत से ज्यादा एक्सरसाइज करता है, या पेट साफ करने वाली दवाइयों (Laxatives) का सहारा लेता है।

बुलीमिया नर्वोसा का कोई एक सटीक कारण नहीं है। यह शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सामाजिक कारकों का एक जटिल मिश्रण होता है:

  • मानसिक तनाव और कम आत्मविश्वास: जिन लोगों का आत्म-सम्मान (Self-esteem) कम होता है या जो डिप्रेशन, एंग्जायटी और अत्यधिक तनाव से जूझ रहे होते हैं, उनमें यह डिसऑर्डर होने की संभावना ज्यादा होती है।
  • सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव: आज के दौर में सोशल मीडिया और समाज में 'परफेक्ट बॉडी शेप' या पतले दिखने का एक अवास्तविक दबाव (Peer Pressure) बना दिया गया है। बॉडी शेमिंग का शिकार होने पर लोग इस बीमारी की चपेट में आ जाते हैं।
  • आनुवंशिक कारण (Genetics): यदि परिवार में पहले से ही किसी को ईटिंग डिसऑर्डर या मानसिक बीमारी रही हो, तो अगली पीढ़ी में इसका खतरा बढ़ जाता है।
  • डाइटिंग का चक्र: वजन घटाने के लिए बहुत ज्यादा सख्त डाइटिंग करने से शरीर में क्रेविंग बढ़ती है, जो बाद में बिंज ईटिंग में बदल जाती है।

Treatment Options: बुलीमिया नर्वोसा का इलाज कैसे होता है?

बुलीमिया से पूरी तरह ठीक होना संभव है, लेकिन इसके लिए मेडिकल और मनोवैज्ञानिक मदद की जरूरत होती है। इसके इलाज में निम्नलिखित तरीके अपनाए जाते हैं:

  • थेरेपी (Psychotherapy) : कॉग्निटिव बिहेवियरल थेरेपी (CBT): यह बुलीमिया के लिए सबसे प्रभावी थेरेपी है। इसमें मरीज की खान-पान की आदतों को सुधारा जाता है और वजन व बॉडी शेप को लेकर उसके नकारात्मक विचारों को बदला जाता है।
  • फैमिली-बेस्ड थेरेपी (FBT): माता-पिता और परिवार के सदस्यों को यह सिखाया जाता है कि वे पीड़ित किशोर की खान-पान की आदतों को सुधारने में कैसे मदद करें।
  • पोषण संबंधी सलाह (Nutritional Counseling) : एक डाइटीशियन मरीज के लिए एक हेल्दी मील प्लान तैयार करता है। मरीज को यह सिखाया जाता है कि भूखा रहे बिना या अत्यधिक खाए बिना शरीर को सही पोषण कैसे दिया जाए।
  • दवाइयां (Medications) : यदि मरीज डिप्रेशन या एंग्जायटी से पीड़ित है, तो डॉक्टर की सलाह पर एंटीडिप्रेसेंट्स (Antidepressants) दवाइयां दी जाती हैं, जो बिंज ईटिंग के चक्र को तोड़ने में मदद करती हैं।

डाइटिशियन डॉ. सोनल ढेमला से पत्रिका के सवाल-जवाब

एक डाइटीशियन के तौर पर आप उन शुरुआती संकेतों (Early Warning Signs) को कैसे पहचानते हैं जो बताते हैं कि कोई व्यक्ति सामान्य डाइटिंग से आगे बढ़कर बुलीमिया की तरफ बढ़ रहा है?

बुलीमिया नर्वोसा एक गंभीर ईटिंग डिसऑर्डर है, जो सीधे तौर पर हमारे मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ा हुआ है। इस बीमारी में व्यक्ति कुछ समय के लिए अपने खाने पर से नियंत्रण खो देता है और बहुत ज्यादा मात्रा में खाना शुरू कर देता है। अक्सर लोग सामान्य वजन घटाने की कोशिश और बुलीमिया के बीच का अंतर नहीं समझ पाते। अपने शरीर के वजन को लेकर सचेत होना एक अच्छी बात है। खुद को फिट रखने के लिए एक हेल्दी और संतुलित डाइट (Balanced Diet) लेना भी बेहद तारीफ के काबिल है। लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब यह कोशिश एक 'जुनून' का रूप ले लेती है।

इस बीमारी की शुरुआत कुछ इस तरह होती है:

  • वजन का डर: व्यक्ति दिनभर में हर मील (भोजन) के बाद बार-बार अपना वजन नापने लगता है।
  • खाना छोड़ना (Meal Skipping): वजन बढ़ने के डर से वह खाना छोड़ना शुरू कर देता है या भोजन की मात्रा को बहुत ज्यादा कम कर देता है।
  • क्रेविंग और बिंज ईटिंग: दिनभर खुद को भूखा रखने के कारण शाम होते-होते व्यक्ति के लिए भूख को नियंत्रित करना नामुमकिन हो जाता है। उसे तीव्र इच्छा (Cravings) होने लगती है और अकेले में वह खुद पर से काबू खोकर जरूरत से ज्यादा जंक और फास्ट फूड खा लेता है।
  • अपराधबोध (Guilt) और पर्जिंग का चक्र: इस तरह जरूरत से ज्यादा खाने के तुरंत बाद व्यक्ति को गहरे अपराधबोध और ग्लानि का अहसास होने लगता है। उसे डर सताने लगता है कि उसका वजन बढ़ जाएगा (और जाहिर है कि इतना भारी भोजन करने के बाद वेइंग स्केल पर वजन बढ़ा हुआ दिखेगा भी)।
  • इस बढ़े हुए वजन और ग्लानि से छुटकारा पाने के लिए व्यक्ति अनहेल्दी तरीके अपनाता है।
  • वह जबरन उल्टी (Forceful Vomiting) करने की कोशिश करता है।
  • पेट साफ करने वाली दवाइयों (Laxatives) का सहारा लेता है ताकि डायरिया जैसी स्थिति पैदा करके खाने को बाहर निकाला जा सके या फिर, ली गई अतिरिक्त कैलोरी को बर्न करने के लिए वह घंटों तक थका देने वाली हैवी एक्सरसाइज करने लगता है।

आजकल युवाओं में 'क्रैश डाइट' या बहुत सख्त डाइटिंग का चलन है। क्या बहुत ज्यादा भूखा रहना या कैलोरी काउंटिंग करना बुलीमिया नर्वोसा के ट्रिगर पॉइंट बन सकते हैं?

जो लोग वजन घटाने के लिए बहुत ज्यादा सख्त या रिस्ट्रिक्टेड डाइट लेते हैं, क्रैश डाइट्स का सहारा लेते हैं, या हर समय कैलोरी काउंट करके ही खाना खाते हैं, उनमें बुलीमिया नर्वोसा ट्रिगर होने की संभावना काफी बढ़ जाती है। हालांकि, यह कहना बिल्कुल सही नहीं होगा कि हर वो व्यक्ति जो कैलोरी काउंट करता है, वह बुलीमिया का शिकार हो ही जाएगा। लेकिन, यह आदत इस गंभीर बीमारी का रास्ता जरूर खोल सकती है।

स्टार्वेशन मोड (Starvation Mode) और ग्रेलिन का विज्ञान : जब कोई व्यक्ति लंबे समय तक बहुत कम कैलोरी वाली डाइट लेता है, मील्स स्किप (भोजन छोड़ना) करता है, या खुद को कई घंटों तक भूखा रखता है, तो हमारा शरीर इसे 'स्टार्वेशन' यानी भुखमरी की स्थिति समझने लगता है।

इस स्थिति में शरीर अपनी रक्षा के लिए एक खास वैज्ञानिक प्रक्रिया शुरू करता है:

  • ग्रेलिन हार्मोन का बढ़ना: भुखमरी की स्थिति में शरीर से 'ग्रेलिन' (Ghrelin) नाम का हंगर-हार्मोन तेजी से रिलीज होने लगता है, जो दिमाग को तीव्र भूख का संकेत देता है।
  • अचानक तेज क्रेविंग होना: शरीर को तुरंत ऊर्जा (Instant Energy) की जरूरत होती है, इसलिए यह हार्मोन हमें हाई-कैलोरी, जंक फूड या मीठा खाने के लिए उकसाता है। यही कारण है कि सख्त डाइटिंग करने वालों को सामान्य से कहीं ज्यादा तीव्र क्रेविंग (Urges) होने लगती है।

कैसे शुरू होता है बुलीमिया का यह चक्र?

इसे एक व्यावहारिक उदाहरण से समझें। मान लीजिए आपने वजन घटाने के लिए सुबह से सिर्फ सलाद और ग्रीन टी ली और पूरे दिन खुद को भूखा रखा। शाम होते-होते आपके शरीर और दिमाग की एनर्जी का स्तर बिल्कुल नीचे (Low Energy) चला जाएगा।

ऐसे में जब आपको तीव्र क्रेविंग होगी, तो आप सोचेंगे कि "चलो, सिर्फ एक बिस्किट खा लेता हूं, इससे क्या ही फर्क पड़ेगा? लेकिन जैसे ही आप वह एक बिस्किट खाएंगे, लंबे समय की भूख के कारण आप खुद पर से पूरी तरह नियंत्रण खो देंगे। देखते ही देखते पूरा पैकेट कब खत्म हो जाएगा, आपको पता भी नहीं चलेगा। इसे ही 'बिंज ईटिंग' (Binge Eating) कहते हैं।

इस अनियंत्रित खान-पान के तुरंत बाद मानसिक रूप से भारी अपराधबोध (Guilt) और डर पैदा होता है कि पूरे दिन की मेहनत बर्बाद हो गई और वजन बढ़ जाएगा। इस डर से बाहर निकलने के लिए जब व्यक्ति 'पर्जिंग' (उल्टी करना या दवाइयां लेना) शुरू कर देता है और यही चक्र बार-बार दोहराया जाने लगता है, तो यह बुलीमिया नर्वोसा का रूप ले लेता है।

बुलीमिया के मरीज का जब इलाज शुरू होता है, तो न्यूट्रिशन रिहैबिलिटेशन (शरीर में पोषण की कमी दूर करना) कितना चुनौतीपूर्ण होता है?

जब बुलीमिया नर्वोसा से पीड़ित मरीजों को न्यूट्रिशनली ट्रीट करने यानी भोजन के जरिए उनके पुनर्वास (Nutrition Rehabilitation) की बारी आती है, तो शुरुआती चरण में मरीज को लगातार और सटीक काउंसलिंग की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। एक डाइटीशियन के तौर पर इलाज के दौरान इन स्टेप्स को अपनाया जाता है:

  • बीएमआई (BMI) और वैज्ञानिक काउंसलिंग : सबसे पहले मरीज को वैज्ञानिक आधार पर उनका बीएमआई (Body Mass Index) दिखाया जाता है। उन्हें यह तसल्ली दी जाती है कि उनका वजन सामान्य कैटेगरी में है और उन्हें घबराने की बिल्कुल जरूरत नहीं है। अगर मरीज का वजन सामान्य कैटेगरी में नहीं भी है, तो उन्हें समझाया जाता है कि वजन कम करने का सही तरीका साइंटिफिक होना चाहिए, न कि बहुत ज्यादा सख्त या क्रैश डाइट, जो शरीर को और ज्यादा नुकसान पहुंचाए।
  • नतीजों से बढ़ता है भरोसा : जब हफ्ते दर हफ्ते मरीज को अपनी डाइट से सकारात्मक रिजल्ट मिलते हैं और वे देखते हैं कि बिना शरीर को प्रताड़ित किए, पूरी शारीरिक क्षमता (Body Efficiency) के साथ उनका वजन धीरे-धीरे संतुलित हो रहा है, तब उनका इस थेरेपी और डाइट पर भरोसा (Convince) बढ़ना शुरू होता है।
  • कस्टमाइज्ड डाइट प्लान (Customized Diet Plan) : इस पूरी प्रक्रिया में मरीज की दैनिक कैलोरी की जरूरत (Calorie Need) को बारीकी से कैलकुलेट किया जाता है। उसके आधार पर एक ऐसा मील प्लान तैयार किया जाता है, जो वजन संतुलित करने के लिए 'स्लाइटली कैलोरी डेफिसिट' (कम कैलोरी वाला) तो होता है, लेकिन शरीर में किसी भी तरह की न्यूट्रिशनल डेफिशिएंसी (पोषक तत्वों की कमी) पैदा नहीं होने देता।
  • ईटिंग शेड्यूल और हेल्दी चॉइसेज : मरीज का एक खाने का समय तय किया जाता है, ताकि वे मील्स स्किप (भोजन छोड़ना) न कर सकें और उनके शरीर को हर समय प्रॉपर न्यूट्रिशन मिलता रहे।
  • स्मार्ट फूड सिलेक्शन: काउंसलिंग के दौरान मरीजों को 'हेल्दी चॉइसेज' के लिए गाइड किया जाता है। उन्हें सिखाया जाता है कि अगर उनके सामने दो या तीन खाने के विकल्प हों, तो उनमें से सबसे पौष्टिक भोजन (Healthiest One) कैसे चुनना है। इससे मरीज के मन में वजन बढ़ने का डर भी नहीं रहता और शरीर को भरपूर पोषण भी मिल जाता है।

बुलीमिया के मरीजों में अनियंत्रित खाने की इच्छा (Binge Urges) को शांत करने के लिए एक डाइटीशियन किस तरह की डाइट स्ट्रेटेजी या माइंडफुल ईटिंग (Mindful Eating) की सलाह देते हैं?

Updated on:
20 Jul 2026 02:36 pm
Published on:
20 Jul 2026 02:36 pm