
Cancer Research: त्वचा कैंसर की दवा को सीधे प्रभावित हिस्से तक पहुंचाने की दिशा में रूंगटा यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ फार्मेसी के शोधकर्ताओं ने चिटोसान से हाइड्रोजेल तैयार किया है। इसमें त्वचा कैंसर के उपचार में इस्तेमाल होने वाली 5-फ्लुओरोयूरेसिल (5-एफयू) दवा को शामिल किया गया। प्रयोगशाला में त्वचा कैंसर की कोशिकाओं पर हुए परीक्षण में हाइड्रोजेल ने सामान्य 5-एफयू की तुलना में बेहतर कैंसररोधी प्रभाव दिखाया।
शोध को अंतरराष्ट्रीय शोध जर्नल केमिस्ट्री सलेक्ट में प्रकाशित किया गया है। यह शोध स्कूल ऑफ फार्मेसी की डायरेक्टर डॉ. मधुलिका प्रधान और डॉ. कृष्णा यादव ने किया। शोध में प्राकृतिक पदार्थ चिटोसान को रासायनिक प्रक्रिया से बदलकर डायल्डिहाइड चिटोसान (डीसीएच) तैयार किया गया। इसे चिटोसान के साथ मिलाकर ऐसा हाइड्रोजेल बनाया गया, जिसमें दवा को शामिल किया जा सका।
कैंसररोधी परीक्षण मुंबई स्थित टाटा मेमोरियल सेंटर के एसीटीआरईसी में किया गया। हाइड्रोजेल की सूक्ष्म संरचना समेत अन्य परीक्षणों के लिए रायपुर की कलिंगा यूनिवर्सिटी की सुविधाओं का उपयोग किया गया। शोध अभी प्रयोगशाला स्तर पर है। मरीजों में इस्तेमाल से पहले इसकी सुरक्षा, लंबे समय के प्रभाव और सामान्य कोशिकाओं पर असर की जांच जरूरी होगी। अगले चरण में हाइड्रोजेल का पशुओं पर परीक्षण किया जाएगा।
हाइड्रोजेल का पीएच 5.5 पाया गया, जो त्वचा के पीएच के करीब है। इसे त्वचा पर आसानी से फैलने और ट्यूब से निकालकर लगाने योग्य भी पाया गया। बी16एफ10 त्वचा कैंसर कोशिकाओं पर परीक्षण में 5-एफयू की मात्रा बढऩे के साथ कोशिकाओं की जीवित रहने की क्षमता कम होती गई। शोधकर्ताओं के अनुसार हाइड्रोजेल में दी गई 5-एफयू ने केवल दवा के घोल की तुलना में अधिक कैंसररोधी प्रभाव दिखाया।
शोध के अनुसार चिटोसान जैव-अनुकूल और आसानी से विघटित होने वाला पदार्थ है। हाइड्रोजेल त्वचा पर लगाने के बाद दवा को एक साथ छोडऩे के बजाय धीरे-धीरे प्रभावित हिस्से तक पहुंचाने में सक्षम पाया गया। अलग-अलग पीएच स्तर पर किए गए 12 घंटे के परीक्षण में 94.5 से 98.34 प्रतिशत तक दवा रिलीज हुई। करीब 80 प्रतिशत दवा शुरुआती पांच घंटे में बाहर निकली।
5-फ्लुओरोयूरेसिल यानी 5-FU एक कैंसररोधी दवा है, जिसका इस्तेमाल कुछ त्वचा संबंधी कैंसर और अन्य कैंसर के उपचार में किया जाता है। त्वचा पर उपयोग के मामले में दवा को सीधे प्रभावित हिस्से पर लगाने का फायदा यह होता है कि उपचार को स्थानीय स्तर पर केंद्रित किया जा सकता है।लेकिन दवा को किस तरह और कितनी देर तक प्रभावित हिस्से तक पहुंचाया जाए, यह भी उपचार की प्रभावशीलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसी बिंदु पर चिटोसान आधारित हाइड्रोजेल का शोध महत्वपूर्ण हो जाता है।
शोध का अगला चरण पशु परीक्षण होगा। प्रयोगशाला में प्राप्त परिणामों के बाद यह जांचना जरूरी होगा कि जीवित शरीर में हाइड्रोजेल किस तरह व्यवहार करता है। इसके जरिए इसकी सुरक्षा, दवा के रिलीज पैटर्न और संभावित प्रभावों का अधिक विस्तृत अध्ययन किया जा सकेगा। यदि पशु परीक्षणों में परिणाम सुरक्षित और प्रभावी पाए जाते हैं, तभी आगे मनुष्यों में क्लिनिकल परीक्षण की दिशा में बढ़ा जा सकेगा।