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Skilled Girl : 450 बेटियां, एक अनूठी पहल; चंद्रगिरि तीर्थ क्षेत्र में पढ़ाई के साथ सीख रहीं कमाई का हुनर

डोंगरगढ़ की प्रतिभास्थली शिक्षा और आत्मनिर्भरता का अनूठा उदाहरण पेश कर रही है। यहां 450 बेटियों को पढ़ाई के साथ हथकरघा, हस्तशिल्प और पशुपालन का प्रशिक्षण देकर हुनरमंद बनाया जा रहा है। पढ़िए मोहन कुलदीप की खास रिपोर्ट।
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Oct 19, 2026
Skilled Girl
चंद्रगिरि तीर्थ की बेटियों को हुनरमंद बनाया जा रहा है। (Photo: Patrika)

Skilled Girl : पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी मिलेगी या नहीं, यह चिंता आज लाखों युवाओं के सामने है। लेकिन क्या शिक्षा के साथ ऐसा हुनर भी सीखा जा सकता है, जो भविष्य में कमाई का विकल्प बन सके? डोंगरगढ़ के चंद्रगिरि तीर्थ क्षेत्र में संचालित प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ इसी सवाल का अलग जवाब तलाश रहा है। यहां करीब 450 बालिकाएं कक्षा 12वीं तक पढ़ाई करने के साथ हथकरघा, हस्तशिल्प, पशुपालन और गौसेवा जैसे व्यावहारिक कौशल सीख रही हैं।

इस पहल की खास बात सिर्फ यह नहीं कि छात्राओं को अतिरिक्त गतिविधियों से जोड़ा गया है, बल्कि यह है कि पढ़ाई के साथ हाथ से काम करने, उपयोगी वस्तुएं बनाने और जिम्मेदारी निभाने का अनुभव भी दिया जा रहा है। यानी शिक्षा का दायरा किताबों और परीक्षा से आगे बढकऱ जीवन की तैयारी तक पहुंचाने की कोशिश है।

नौकरी नहीं मिली तो क्या? हुनर बन सकता है दूसरा रास्ता

हथकरघे पर कपड़ा तैयार करना हो या हस्तशिल्प की उपयोगी वस्तुएं बनाना, छात्राएं पारंपरिक कौशल से परिचित हो रही हैं। ऐसे हुनर आगे चलकर स्वरोजगार, छोटे उद्यम या स्थानीय बाजार से जुडऩे की संभावनाएं पैदा कर सकते हैं। हालांकि, इसके लिए उत्पादों की बिक्री, बाजार की मांग और उद्यम चलाने का प्रशिक्षण भी जरूरी होगा।

यही इस मॉडल का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है। शिक्षा के साथ कौशल जोडऩे से छात्राओं के सामने भविष्य में केवल नौकरी तलाशने का ही नहीं, बल्कि अपने हुनर को आजीविका में बदलने का विकल्प भी खुल सकता है।

हथकरघे से गौसेवा तक, सीखने का अलग तरीका

विद्यापीठ में छात्राओं को हथकरघा और हस्तशिल्प के अलावा पशुपालन व गौसेवा से भी जोड़ा जाता है। इन गतिविधियों के माध्यम से वे श्रम, अनुशासन, रचनात्मकता और जिम्मेदारी का महत्व सीखती हैं। आश्रम की ब्रह्मचारिणी दीदियां उन्हें इन कार्यों का प्रशिक्षण देती हैं।

यहां शिक्षा और जीवन-कौशल को अलग-अलग नहीं देखा जाता। छात्राओं को रोजमर्रा के उपयोगी कामों से जोडकऱ व्यावहारिक अनुभव देने पर जोर है। खासकर ग्रामीण पृष्ठभूमि से आने वाली बालिकाओं के लिए यह अनुभव आगे की जिंदगी में उपयोगी साबित हो सकता है।

जबलपुर से डोंगरगढ़ तक पहुंची पहल

दिवंगत आचार्य विद्यासागर महाराज के निर्देशन में प्रतिभास्थली ज्ञानोदय विद्यापीठ की शुरुआत जबलपुर से हुई थी। वर्ष 2014 में डोंगरगढ़ के चंद्रगिरि तीर्थ परिसर में इसकी शुरुआत की गई। प्रारंभ में यहां जैन समाज की बालिकाओं को प्रवेश दिया जाता था, लेकिन बाद में सभी समाज की बालिकाओं के लिए प्रवेश का दायरा बढ़ाया गया।

करीब दो वर्ष पहले केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने भी चंद्रगिरि तीर्थ का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने विद्यापीठ की गतिविधियों और शिक्षा पद्धति की जानकारी ली तथा इसकी सराहना की थी।

असली कसौटी: हुनर से कितनी आत्मनिर्भर होंगी बेटियां?

प्रतिभास्थली का प्रयोग शिक्षा को व्यावहारिक कौशल से जोडऩे की दिशा में एक अलग पहल है। लेकिन इसकी सबसे बड़ी सफलता तब सामने आएगी, जब छात्राएं प्रशिक्षण के बाद अपने हुनर से आय अर्जित कर सकेंगी, छोटे उद्यम शुरू कर सकेंगी या अपने कौशल को रोजगार में बदल पाएंगी। इसके लिए बाजार से जुड़ाव, उत्पादों की बिक्री और व्यवसाय संबंधी मार्गदर्शन अहम होंगे।

किताबें ज्ञान देती हैं, लेकिन हुनर उस ज्ञान को काम में बदलने का रास्ता खोल सकता है। डोंगरगढ़ की इस पहल का सबसे बड़ा सवाल और सबसे बड़ी संभावना यही है।

Updated on:
19 Oct 2026 03:46 pm
Published on:
19 Oct 2026 03:46 pm