
Government Hospital : दिल्ली में हुई हालिया बैठक में स्वास्थ्य क्षेत्र में पब्लिक-प्राइवेट-पार्टनरशिप यानी पीपीपी मॉडल के विस्तार की संभावनाओं पर मंथन हुआ। दूसरी ओर, जयपुर के मेट्रो मास अस्पताल को अनुबंध की शर्तों की पालना नहीं करने पर नोटिस जारी होना इस मॉडल की निगरानी और जवाबदेही पर बड़ा सवाल खड़ा करता है। यानी एक तरफ सरकार अस्पताल बनाएगी, जमीन देगी, उपकरण और आधारभूत ढांचा खड़ा करेगी। दूसरी तरफ संचालन में निजी भागीदारी बढ़ाने की तैयारी होगी। ऐसे में मूल सवाल यही है जब सरकारी स्वास्थ्य तंत्र में लगातार निवेश हो रहा है, तो किन सेवाओं को पीपीपी में देना जरूरी है और उसके लिए सरकार की लागत, निजी सेवा प्रदाता की कमाई और मरीज को मिलने वाली सुविधा का संतुलन कैसे तय होगा?
राजस्थान सरकार ने हाल ही में आठ क्रमोन्नत उप जिला चिकित्सालयों के भवन निर्माण के लिए 280 करोड़ रुपए की प्रशासनिक एवं वित्तीय स्वीकृति जारी की है। सूरतगढ़, बिलाड़ा, देचू, खाजूवाला, प्रतापपुर, रायपुर, खंडार और छबड़ा में प्रत्येक अस्पताल के लिए 35 करोड़ रुपए स्वीकृत हुए हैं। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार छोटे शहरों और कस्बों में स्वास्थ्य सुविधाओं का आधारभूत ढांचा खुद खड़ा कर रही है। वहीं दूसरी तरफ दिल्ली में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्तर पर राजस्थान सहित राज्यों में पीपीपी के जरिए मल्टी-स्पेशियलिटी अस्पताल, मेडिकल कॉलेज, रेडियोलॉजी-पैथोलॉजी, डायलिसिस, कार्डियक केयर, टेलीमेडिसिन, मेडिकल ट्रांसपोर्टेशन और मातृ-शिशु सेवाओं के विस्तार पर चर्चा हुई। इस बैठक में हुई चर्चा के आधार पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या सरकार पहले जनता के टैक्स के पैसों से अस्पताल तैयार करेगी और बाद में वहां पहुंचने वाले रोगियों की जांच या इलाज की सेवाएं निजी ऑपरेटर को सौंपेगी?
जयपुर के मानसरोवर स्थित मेट्रो मास अस्पताल का मामला इस बहस को और गंभीर बनाता है। राज्य सरकार के अनुसार अस्पताल को अनुबंध की विभिन्न शर्तों की पालना के संबंध में इस अस्पताल को पहले नोटिस दिया जा चुका है, जिसमें बीपीएल मरीजों को निर्धारित उपचार, वित्तीय पारदर्शिता के लिए एस्क्रो खाते और अनिवार्य ऑडिट जैसे प्रावधानों से जुड़े बिंदुओं का उल्लेख है। अस्पताल संचालकों पर नियुक्त ऑडिटर को अनिवार्य ऑडिट के लिए प्रवेश नहीं देने का भी आरोप नोटिस में है। यह पहला अवसर नहीं है जब इस पीपीपी परियोजना की उपयोगिता और अनुबंध की शर्तों पर सवाल सामने आए हों।
मेट्रो मास के शुरुआती संचालन पर कैग की रिपोर्ट ने गंभीर तस्वीर सामने रखी थी। रिपोर्ट के अनुसार सितंबर 2012 से सितंबर 2013 के पहले 13 महीनों में अस्पताल में औसतन केवल 75 ओपीडी और 7 आईपीडी मरीज प्रतिदिन आए। उस समय एसएमएस अस्पताल का रोजाना ओपीडी भार करीब 5,000 मरीज बताया गया था और उद्देश्य एसएमएस पर दबाव कम करना भी था। कैग ने यह भी दर्ज किया कि उस अवधि में मेट्रो मास में इलाज कराने वाले ओपीडी मरीजों में बीपीएल मरीजों की हिस्सेदारी सिर्फ 1.95 प्रतिशत और आईपीडी में 2.32 प्रतिशत थी, जबकि अनुबंध के तहत कम से कम 20 प्रतिशत बीपीएल मरीजों का प्रावधान था। इस पुराने रिकॉर्ड को ताजा तैयारी के साथ देखने पर सवाल उठता है कि क्या नए पीपीपी प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पुराने प्रोजेक्ट की कमियों का स्वतंत्र मूल्यांकन किया गया है?
यहां तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। पीपीपी की जरूरत का आधार सरकारी अस्पतालों में मौजूद कमियों को दिखाकर तैयार किया जा रहा है। कैग की 2025 में प्रकाशित राजस्थान की स्वास्थ्य सेवाओं पर परफोरमेंंस ऑडिट में जांचे गए 34 जिला अस्पतालों में 12 में पर्याप्त रेडियोलॉजी सुविधा नहीं मिली। पैथोलॉजी सेवाएं सभी 34 में आंशिक रूप से उपलब्ध थीं। इसके अलावा डाइटरी, एंबुलेंस और मोर्चरी सेवाओं में भी कमियां दर्ज की गईं। रिपोर्ट में डॉक्टरों, विशेषज्ञों, नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ की कमी भी सामने आई। यानी सरकार के सामने वास्तविक समस्या है कि मशीन है तो टेक्नीशियन नहीं, भवन है तो विशेषज्ञ नहीं, सुविधा है तो उसका नियमित संचालन नहीं। ऐसे में पीपीपी को इन कमियों को तेजी से दूर करने के विकल्प के तौर पर देखा जा सकता है। लेकिन सवाल मॉडल के इस्तेमाल का नहीं, उसकी शर्तों और निगरानी का है।
पीपीपी मॉडल में सरकार की ओर से वीजीएफ यानी वायबिलिटी गैप फंडिंग और आईआईपीडीएफ जैसी योजनाओं के जरिए वित्तीय एवं तकनीकी सहायता उपलब्ध कराने की जानकारी भी बैठक में साझा की गई। लेकिन राजस्थान में नए पीपीपी मॉडल की सफलता का पैमाना केवल यह नहीं होना चाहिए कि कितनी मशीनें लग गईं या कितने अस्पताल पीपीपी में चले गए। पीपीपी का सबसे बड़ा फायदा यह हो सकता है कि सरकार को हर विशेषज्ञ सेवा के लिए अलग से विशेषज्ञ नियुक्त करने और हर महंगी मशीन के संचालन का पूरा तंत्र खड़ा करने की जरूरत न पड़े। निजी क्षेत्र तकनीक, विशेषज्ञता और प्रबंधन क्षमता ला सकता है।
दूसरा पक्ष भी अहम है। यदि भवन सरकार का, जमीन सरकार की, मशीन सरकार की, मरीज सरकार के अस्पताल का और भुगतान भी सरकार का, तो निजी ऑपरेटर की भूमिका, उसका वास्तविक निवेश और उसका मुनाफा पारदर्शी होना जरूरी है। यही वह बिंदु है जहां पुराने अनुभवों से सबक लेने की जरूरत है। मेट्रो मास के मामले में बीपीएल उपचार, ऑडिट और अनुबंध पालना से जुड़े सवाल सामने आ चुके हैं। अब उसी दौर में नए पीपीपी विस्तार की चर्चा हो रही है।
पहला : सरकारी अस्पतालों में ही विशेषज्ञ, टेक्नीशियन, मशीन और प्रबंधन उपलब्ध कराकर सेवाएं पूरी तरह सरकारी सिस्टम से संचालित की जाएं
दूसरा : जिन सेवाओं में तत्काल विशेषज्ञता या तकनीकी क्षमता जुटाना मुश्किल है, वहां पीपीपी अपनाया जाए, लेकिन प्रत्येक अनुबंध में कड़े सर्विस लैवल एग्रीमेंट, मरीज हित, पारदर्शी भुगतान, स्वतंत्र ऑडिट और स्पष्ट एग्जिट क्लॉज अनिवार्य हों। दूसरा मॉडल अपनाया जाता है तो पीपीपी को सरकारी व्यवस्था का विकल्प नहीं, सरकारी व्यवस्था को मजबूत करने का उपकरण बनाना होगा।
पीपीपी के संभावित क्षेत्र : रेडियोलॉजी, पैथोलॉजी, डायलिसिस, कार्डियक केयर, टेलीमेडिसिन, मेडिकल ट्रांसपोर्टेशन, मातृ-शिशु स्वास्थ्य सहित अन्य सेवाएं