India Nuclear Power 2047: भारत अब परमाणु ऊर्जा के मामले में दुनिया की बड़ी ताकत बनने की राह पर है। देश 100 गीगावॉट परमाणु बिजली का लक्ष्य कैसे हासिल करेगा, इस बारे में पढ़िए विस्तृत रिपोर्ट।
India Nuclear Power 2047: भारत का परमाणु सफर एक छोटे से कदम से शुरू हुआ था, जो आज एक बहुत बड़े सपने में बदल चुका है। 1960 के दशक में जब हमने तारापुर से शुरुआत की थी, तब हम विदेशी तकनीक पर निर्भर थे, लेकिन धीरे-धीरे देश ने रिएक्टर बनाना सीख लिया। इसमें 'भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र' का सबसे बड़ा हाथ रहा। आज भारत न सिर्फ अपनी तकनीक से रिएक्टर बना रहा है, बल्कि 2047 तक 100 गीगावॉट बिजली पैदा करने का बड़ा लक्ष्य भी रखा है। टाटा-अदानी जैसी प्राइवेट कंपनियों की एंट्री से इस काम को और भी रफ्तार मिल रही है। चलिए जानते हैं ,भारत परमाणु ऊर्जा की कहानी
1960 के दशक में जब भारत ने तारापुर में अपने पहले दो परमाणु रिएक्टर लगाए थे, तब शायद किसी ने नहीं सोचा था कि यह देश एक दिन खुद अपने रिएक्टर बनाएगा। अमेरिका से तकनीक, कनाडा से डिजाइन और रूस से ईंधन शुरुआत में भारत दूसरों पर निर्भर था। भारत ने ' भाभा परमाणु अनुसंधान' केंद्र (BARC) ने अपनी तकनीक विकसित की। 1980 के दशक तक भारत ने खुद के प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर बनाने शुरू कर दिए। आज देश में दर्जनों परमाणु रिएक्टर चल रहे हैं और कई निर्माणाधीन हैं।
फरवरी 2025 में जब वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट पेश किया, तो उन्होंने एक बड़ा ऐलान किया। उन्होंने कहा कि भारत को 2047 तक कम से कम 100 गीगावॉट परमाणु बिजली तैयार करनी होगी। साथ ही उन्होंने यह भी बताया कि 2033 तक कम से कम पांच स्वदेशी छोटे रिएक्टर तैयार किए जाएंगे। आज देश की कुल परमाणु क्षमता करीब 7-8 गीगावॉट है , 2047 तक इसे करीब 12 से 15 गुना बढ़ाना है। यह काम उतना ही बड़ा है जितना एक छोटे शहर को पूरे देश में फैलाना।
भारत में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में अब एक ऐतिहासिक बदलाव आया है। दशकों से 1962 के पुराने कानून की वजह से यह काम सिर्फ सरकारी कंपनियों तक ही सीमित था और निजी कंपनियों के लिए यहां कोई जगह नहीं थी। लेकिन दिसंबर 2025 में संसद ने सस्टेनेबल हारनेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI - शांति) बिल पास किया, जिसे राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद अब कानून बना दिया गया है।
अब प्राइवेट कंपनियां और सरकारी-निजी पार्टनरशिप (PPP) मिलकर परमाणु ऊर्जा पर काम कर सकेंगी। परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में वैसा ही बड़ा बदलाव मान रहे हैं, जैसा 1991 में भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे खुलने के समय देखा गया था। उम्मीद है कि इस नए कानून से देश की तरक्की को एक नई रफ्तार मिलेगी।
परमाणु ऊर्जा को लेकर जुलाई 2024 के बजट में एक क्रांतिकारी घोषणा हुई 'भारत स्मॉल रिएक्टर'। इसकी शुरुआत अगस्त 2023 में हुई थी और इसका मकसद छोटे, सस्ते और जल्दी तैयार होने वाले रिएक्टर बनाना है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) फिलहाल तीन तरह के डिजाइन पर काम कर रहा है: 200 मेगावाट का मुख्य मॉडल, छोटे शहरों के लिए 50 मेगावाट का मॉडल और हाइड्रोजन बनाने जैसे कामों के लिए 5 मेगावाट का खास रिएक्टर।
इन छोटे रिएक्टरों की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन्हें कारखाने में तैयार कर कहीं भी ले जाया जा सकता है, जिससे लागत और समय दोनों की बचत होती है। दिसंबर 2024 में जब सरकार (NPCIL) ने निजी कंपनियों से इसके लिए प्रस्ताव मांगे, तो देश बड़ी कंपनियां टाटा पावर, रिलायंस, अदानी पावर, जिंदल, JSW और हिंडाल्को सामने आईं। इन कंपनियों ने मिलकर देश के 6 अलग-अलग राज्यों में 16 ऐसी जगहें भी चुन ली हैं। यहां नए जमाने के रिएक्टर लगाए जा सकते हैं।
परमाणु ऊर्जा के विस्तार में देश की बड़ी कंपनियों ने रिएक्टर लगाने के लिए जमीन की तलाश शुरू की, तो गुजरात सबसे आगे रहा जहां 5 जगहें चुनी गई हैं। इसके बाद मध्य प्रदेश में 4, ओडिशा में 3, आंध्र प्रदेश में 2 और झारखंड व छत्तीसगढ़ में 1-1 जगह तय की गई है। राजस्थान में देखें तो ही परमाणु ऊर्जा का बड़ा केंद्र रहा है। यहां मार्च 2025 में 'राजस्थान-7' यूनिट को ग्रिड से जोड़कर बिजली उत्पादन शुरू कर दिया गया और 'राजस्थान-8' पर अभी काम चल रहा है। इसके अलावा बांसवाड़ा में भी नए रिएक्टर लगाने की तैयारी है। देश के अन्य हिस्सों जैसे काकरापार, कुडनकुलम और कैगा में भी नई इकाइयों का काम तेजी से आगे बढ़ रहा है।
अप्रैल 2026 में भारत ने परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में एक बहुत बड़ी सफलता हासिल की। कलपक्कम में बने 500 मेगावाट के खास रिएक्टर (PFBR) ने पहली बार काम करना शुरू कर दिया। इसने 'क्रिटिकैलिटी' हासिल कर ली। यह रिएक्टर अब बिजली बनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। यह भारत के परमाणु मिशन का दूसरा पड़ाव है। भारत का प्लान तीन चरणों का है। पहले चरण में यूरेनियम का इस्तेमाल होता है, दूसरे चरण में रिएक्टर बिजली के साथ-साथ ईंधन भी पैदा करेगा, और तीसरे चरण में थोरियम का इस्तेमाल होगा। भारत के पास यूरेनियम कम है पर थोरियम का दुनिया में सबसे बड़ा भंडार है। PFBR की सफलता उस दिन की राह खोलती है जब भारत अपने थोरियम से लंबे समय तक बिजली बना सके।
भारत ने परमाणु बिजली को लेकर कई बड़े लक्ष्य तय किए, लेकिन ज्यादातर पूरे नहीं हो पाए। 2009 में सरकार ने कहा कि 2032 तक 60 गीगावॉट परमाणु ऊर्जा बनाई जाएगी, फिर 2011 में लक्ष्य बढ़ाकर 63 गीगावॉट कर दिया गया। लेकिन बाद में 2018 में खुद सरकार ने माना कि हकीकत में 2031 तक सिर्फ करीब 22.5 गीगावॉट ही हासिल हो पाएगा। इससे साफ होता है कि योजनाएं बड़ी रहीं, लेकिन उन्हें जमीन पर उतारना उतना आसान नहीं रहा। लेकिन अब परिस्थितियां अलग हैं। तीन बड़े बदलाव किए गए -
भारत ने 2008 में परमाणु समझौते के बाद दुनिया के कई बड़े देशों जैसे अमेरिका, रूस, फ्रांस और ब्रिटेन के साथ हाथ मिलाया, जिससे हमारे लिए परमाणु रिएक्टर और ईंधन खरीदना आसान हो गया। इसी कड़ी में 2010 में कनाडा और 2014 में ऑस्ट्रेलिया के साथ यूरेनियम सप्लाई के समझौते हुए। ब्रिटेन के साथ 2015 में ऊर्जा क्षेत्र में करीब ₹32,000 करोड़ (3.2 बिलियन) के सहयोग का पैकेज तय हुआ, जबकि जापान के साथ लंबी बातचीत के बाद 2016 में समझौता हुआ जिससे जापानी तकनीक का रास्ता खुला।
सबसे ज्यादा सक्रियता रूस के साथ दिखी, जिसने कुडनकुलम में कई रिएक्टर बनाने का जिम्मा लिया। रूस के साथ 2014 में 20 और रिएक्टर बनाने का बड़ा समझौता हुआ। खर्च की बात करें तो 2015 तक कुडनकुलम की यूनिट 3 और 4 की लागत बढ़कर लगभग ₹39,747 करोड़ (5.96 अरब) पहुंच गई।
भारत की बड़ी तेल कंपनियों ने भी अब परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में नवंबर 2009 में देश की सबसे बड़ी तेल कंपनी इंडियन ऑयल (IOC) ने परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए NPCIL के साथ हाथ मिलाया। इसके बाद जनवरी 2011 में एक औपचारिक समझौता हुआ, जिसके तहत IOC ने राजस्थान 7 और 8 (700 मेगावाट की दो यूनिट) प्रोजेक्ट में 26% हिस्सेदारी ली। इस पूरे प्रोजेक्ट की अनुमानित लागत करीब ₹12,320 करोड़ (2.1 अरब) तय की गई थी।
देश की दिग्गज कंपनी ONGC ने भी अक्टूबर 2017 में परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में आने की योजना पेश की। यह कदम सरकार द्वारा 1962 के कानून में बदलाव के बाद उठाया गया, जिससे अब सरकारी कंपनियों को आपस में मिलकर काम करने (Joint Venture) की इजाजत मिल गई है। अब ONGC भी कई नए परमाणु प्रोजेक्ट्स में हिस्सेदार बनकर बिजली उत्पादन में मदद करेगी।
भारतीय रेलवे का बिजली का खर्च करीब ₹8000 करोड़ (1.34 बिलियन) सालाना आता है, अपनी लागत को ₹5.4 से घटाकर ₹4 प्रति यूनिट करना चाहता है। इसी मकसद से रेलवे ने 2017 में परमाणु संयंत्र लगाने के लिए NPCIL के साथ साझेदारी की योजना बनाई थी। रेलवे पहले से ही बिहार के औरंगाबाद में एक बड़ा बिजली प्लांट चला रहा है और पश्चिम बंगाल के आद्रा में भी नए प्लांट की तैयारी में है।
सिर्फ रेलवे ही नहीं, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL) भी गुजरात या पश्चिमी भारत में एक 700 मेगावाट का परमाणु प्लांट लगाने के लिए बातचीत कर रही है। इसके अलावा, भारत ने अपनी थोरियम तकनीक को दुनिया भर में ले जाने के लिए 2009 में एक खास 'एडवांस्ड हेवी वाटर रिएक्टर' (Advanced Heavy Water Reactor) के निर्यात मॉडल की घोषणा की थी। भारत का लक्ष्य थोरियम आधारित तकनीक में दुनिया का लीडर बनना है, ताकि अपनी प्रचुर संपदा का सही इस्तेमाल कर सके।
भारत के पास यूरेनियम के भंडार काफी सीमित हैं, जिसकी वजह से हमें अपनी जरूरत का एक बड़ा हिस्सा दूसरे देशों से मंगवाना पड़ता है। जनवरी 2021 की एक अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट (रेड बुक) के मुताबिक, भारत में लगभग 2.93 लाख टन यूरेनियम की पहचान की गई है। इससे पहले जुलाई 2017 में परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) ने यह आंकड़ा करीब 2.29 लाख टन बताया था। भारत में मिलने वाला यह यूरेनियम काफी महंगा पड़ता है। लगभग 260 प्रति किलो की लागत रहती है।
भारत अपनी ईंधन की जरूरतों का लगभग 40% हिस्सा आयात विदेश से खरीदकर पूरा करता है। जुलाई 2015 में देश ने रिकॉर्ड 1252 टन (U₃O₈) का उत्पादन किया था, हालांकि उसी साल का औसत शुद्ध यूरेनियम उत्पादन करीब 385 टन ही रहा। भविष्य में परमाणु ऊर्जा की बढ़ती मांग को पूरा करने के लिए भारत को विदेशी यूरेनियम पर निर्भरता बनाए रखनी होगी।
झारखंड में 2007 में देश की पहली खुली खदान 'बंधुरंग' शुरू हुई और उसके बाद बागजाता व मोहुलडीह जैसी भूमिगत खदानें आईं। आंध्र प्रदेश के तुम्मलापल्ले में तो 2007 में 270 मिलियन (करीब ₹1900 करोड़) की लागत से बहुत बड़ा प्रोजेक्ट शुरू हुआ, जहां 2012 से एक खास तकनीक के जरिए यूरेनियम निकाला जा रहा है। यहां 2014 तक करीब 71,690 टन यूरेनियम होने का अनुमान लगाया गया। वहीं तेलंगाना के नालगोंडा में ₹637 करोड़ का प्रोजेक्ट स्थानीय विरोध के कारण अटका हुआ है। कर्नाटक के गोगी में भी 135 मिलियन (करीब ₹1100 करोड़) की लागत से खदान बनाने की तैयारी है, यूरेनियम काफी अच्छी क्वालिटी का है। आसान शब्दों में कहें तो सरकार करोड़ों रुपये खर्च करके इन राज्यों में अपनी यूरेनियम की कमी को पूरा करने में जुटी है।
परमाणु बिजली महंगी नहीं होती। तारापुर 3 और 4 रिएक्टरों से बनने वाली बिजली कोयले से बनने वाली बिजली के मुकाबले सस्ती है। कुडनकुलम से बिजली 4 रुपए प्रति यूनिट से भी कम में मिली। 2047 तक 100 गीगावॉट परमाणु बिजली मिलने लगी तो इसका मतलब होगा साफ बिजली, सस्ती बिजली और बिना बिजली कटौती के बिजली। यह न सिर्फ घरों के लिए बल्कि कारखानों के लिए भी फायदेमंद होगा जिससे रोजगार बढ़ेगा और देश की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी।