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Mental Exhaustion: क्या आपकी बैटरी भी हमेशा लो रहती है? कहीं यह ‘मानसिक थकान’ तो नहीं!

Mental Tiredness: क्या आप रात भर सोने के बाद भी थकान महसूस करते हैं? क्या आपका दिमाग नई जानकारी प्रोसेस करने में असमर्थ है? 'डिजिटल मेंटल एग्जॉशन' के बारे में विशेषज्ञ डॉ. सुनील शर्मा से विस्तार से जानते हैं। यह भी जानें कि कैसे खुद को रीबूट कर सकते हैं।

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Apr 24, 2026

Mental Exhaustion : हम डिजिटल डिवाइसेस से 24 घंटों घिरे रहते हैं। इन परिस्थितियों में सिर्फ शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना काफी नहीं होता। हमारे लिए अपने दिमागी स्वास्थ्य का भी ध्यान रखना जरूरी होता है। क्या आपके साथ ऐसा हो रहा कि आप रात को 7—8 की अच्छी नींद लेते हैं और जब सुबह जगते हैं तो आप तरोताजा महसूस नहीं करते? ऑफिस में कंप्यूटर के सामने बैठते ही सिर भारी होने लगता है? अगर हां, तो आप 'मानसिक थकान' (Mental Exhaustion) का शिकार हो सकते हैं। आइए, इस बारे में विस्तार से एक्स्पर्ट डॉ. सुनील शर्मा से जानते हैं।

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What is Mental Exhaustion: क्या है मानसिक थकान ?

मानसिक थकान तब होती है जब आपका मस्तिष्क लंबे समय तक अत्यधिक तनाव, काम के बोझ या भावनाओं से घिरा रहता है। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे किसी बैटरी का पूरी तरह डिस्चार्ज हो जाना। जब दिमाग को आराम करने का मौका नहीं मिलता, तो वह सही तरीके से सिग्नल भेजना बंद कर देता है।

कैसे पहचानें मुख्य लक्षण ?

मानसिक थकान केवल 'थक जाने' का नाम नहीं है। इसके लक्षण काफी गहरे होते हैं।

  • चिड़चिड़ापन: छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना या रोने का मन करना।
  • फोकस की कमी: किसी एक काम पर 5 मिनट भी ध्यान न लगा पाना।
  • नींद की समस्या: बहुत थकने के बावजूद रात को नींद न आना (Insomnia)।
  • निर्णय लेने में कठिनाई: छोटे-छोटे फैसले लेने में भी घबराहट महसूस होना।
  • शारीरिक संकेत: लगातार सिरदर्द, पाचन में गड़बड़ी या कंधों में खिंचाव।

मानसिक थकान के कई कारण हो सकते हैं

  • सूचनाओं का ओवरलोड: दिन भर सोशल मीडिया और न्यूज़ का उपभोग करना।
  • मल्टीटास्किंग: एक साथ कई काम करने की कोशिश में दिमाग का थक जाना।
  • परफेक्शन का दबाव: हर काम को एकदम परफेक्ट करने की चाहत।
  • बर्नआउट: ऑफिस या घर की जिम्मेदारियों का अत्यधिक बोझ।

इससे बचने के 5 प्रभावी तरीके

  • डिजिटल डिटॉक्स (Digital Detox) : सोने से कम से कम 1 घंटा पहले अपने फोन और लैपटॉप को खुद से दूर कर दें। स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आपके दिमाग को 'ऑन' रखती है, जिससे वह रिलैक्स नहीं हो पाता।
  • 'ना' कहना सीखें : हम अक्सर दूसरों को खुश करने के चक्कर में अपनी क्षमता से ज़्यादा काम ले लेते हैं। आप अपनी सीमाएं तय करें। अगर आप मानसिक रूप से थके हैं, तो नए काम या मीटिंग्स के लिए 'ना' कहने में संकोच न करें।
  • 20-20-20 का नियम अपनाएं : यदि आपका काम स्क्रीन पर है, तो हर 20 मिनट में 20 फीट दूर किसी चीज़ को 20 सेकंड के लिए देखें। यह न केवल आँखों को बल्कि दिमाग को भी छोटा ब्रेक देता है।
  • माइंडफुलनेस और ब्रीदिंग : दिन में सिर्फ 10 मिनट के लिए गहरी सांस लेने का अभ्यास (Deep Breathing) करें। यह आपके शरीर में कोर्टिसोल (तनाव हार्मोन) के स्तर को कम करता है।
  • पर्याप्त पानी और सही डाइट : डिहाइड्रेशन यानी पानी की कमी दिमाग की कार्यक्षमता को घटा देती है। दिन भर पानी पीते रहें और ओमेगा-3 से भरपूर चीज़ें (मछली, अखरोट) खाएं।

भारत में मानसिक स्वास्थ्य के प्रमुख सांख्यिकीय आंकड़े

भारत में मानसिक स्वास्थ्य की स्थिति को समझने के लिए 'National Mental Health Survey' (NMHS) और अन्य वैश्विक संगठनों की रिपोर्ट्स महत्वपूर्ण आधार हैं।

मानसिक रोगों का प्रसार (Prevalence)

  • 15% भारतीय वयस्क: 'National Mental Health Survey' के अनुसार, लगभग 15% भारतीय वयस्कों को किसी न किसी प्रकार की मानसिक स्वास्थ्य सहायता की आवश्यकता है।
  • हर 20 में से 1 व्यक्ति: भारत में लगभग हर 20 में से 1 व्यक्ति डिप्रेशन (Depression) से पीड़ित है।
  • युवा आबादी: भारत की लगभग 9.3 मिलियन किशोर और युवा आबादी मानसिक विकारों का सामना कर रही है।

डिजिटल थकान और स्क्रीन टाइम (Digital Fatigue Data)

भारत दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां इंटरनेट का उपयोग सबसे तेज़ी से बढ़ा है, जिसके कारण डिजिटल थकान के मामले भी बढ़े हैं।

  • औसत स्क्रीन टाइम: एक रिपोर्ट के अनुसार, एक औसत भारतीय स्मार्टफोन उपयोगकर्ता दिन में लगभग 4 से 7.4 घंटे  मोबाइल स्क्रीन पर बिताता है। पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे भी 2.2 घंटे औसतन हर रोज मोबाइल की स्क्रीन देखने में गुजार देते हैं।
  • वर्क-लाइफ बैलेंस: भारत में लगभग 60% से 70% आईटी (IT) और डिजिटल क्षेत्र के कर्मचारी 'डिजिटल बर्नआउट' (Digital Burnout) के कारण थकान और तनाव की शिकायत करते हैं।
  • नींद की कमी: डिजिटल उपकरणों के अत्यधिक उपयोग के कारण 50% से अधिक शहरी भारतीयों की नींद की गुणवत्ता प्रभावित हुई है।

आर्थिक प्रभाव (Economic Impact)

मानसिक थकान और बीमारी का असर देश की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, 2012 से 2030 के बीच मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण भारत को लगभग 1.03 ट्रिलियन डॉलर (लगभग 85 लाख करोड़ रुपये) का आर्थिक नुकसान होने का अनुमान है। यह नुकसान मुख्य रूप से काम की उत्पादकता (Productivity) घटने और इलाज के खर्च के कारण होगा।

उपचार का अंतर (Treatment Gap)

भारत में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि समस्या होने के बावजूद लोग इलाज नहीं करवाते

  • 80% उपचार अंतर: भारत में लगभग 80% लोग जिन्हें मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की ज़रूरत है, वे सामाजिक शर्म (Stigma) या संसाधनों की कमी के कारण इलाज नहीं करा पाते।
  • डॉक्टरों की कमी: भारत में प्रति 1 लाख आबादी पर 1 से भी कम (लगभग 0.75) मनोचिकित्सक (Psychiatrist) उपलब्ध है, जबकि मानक के अनुसार यह संख्या कम से कम 3 होनी चाहिए।

कार्यस्थल और बर्नआउट (Workplace Burnout)

  • सबसे तनावग्रस्त कार्यबल: कुछ वैश्विक सर्वे बताते हैं कि भारतीय कार्यबल (Workforce) दुनिया के सबसे तनावग्रस्त देशों की सूची में ऊपर है।
  • सर्वे रिपोर्ट: लगभग 42% कर्मचारी मानते हैं कि उनका काम उनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित कर रहा है।

मनोचिकित्सक डॉ. सुनील शर्मा के साथ पत्रिका की खास बातचीत

आज लोगों में देखा गया है कि भरपूर नींद लेने के बाद भी सुबह उठकर थका हुआ महसूस करते हैं?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने पत्रिका से बात करते हुए बताया यह स्पष्ट रूप से देखा जा रहा है कि जो लोग कॉर्पोरेट लाइफ (Corporate Life) में काम का बोझ (Workload) अत्यधिक बढ़ गया है। लगातार डेडलाइंस का दबाव और भविष्य की चिंता उन्हें ओवरथिंकिंग (Overthinking) यानी 'अत्यधिक सोचने' की ओर धकेल देती है। यह मानसिक थकान का सबसे बड़ा कारण है। इसके साथ ही, एक बहुत ही सामान्य लेकिन हानिकारक आदत जो लोगों में घर कर गई है, वह है देर रात तक फोन का इस्तेमाल करना। रात को सोने से पहले घंटों तक सोशल मीडिया स्क्रॉल करना या चैटिंग (Chitchat) करना न केवल आपकी आंखों को थकाता है, बल्कि आपकी क्वालिटी स्लीप (Quality Sleep) यानी 'गहरी नींद' के चक्र को भी पूरी तरह डिस्टर्ब कर देता है।

क्या आपके दिमाग का "RAM" फुल हो गई है और अब नई जानकारी प्रोसेस नहीं हो रही?

उन्होंने कहा, हम इसे 'Information Overload' कहते हैं। इसे तकनीकी भाषा में 'Cognitive Overload' कहा जाता है। जब हम एक ही समय पर मल्टीटास्किंग करते हैं, लगातार नोटिफिकेशन्स का जवाब देते हैं और घंटों स्क्रीन के सामने बिताते हैं, तो हमारे मस्तिष्क की कार्यक्षमता जिसे आपने बहुत सही शब्द दिया 'RAM' वाकई में भर जाती है। इसका संकेत तब मिलता है जब हम छोटी-छोटी बातें भूलने लगते हैं, एक ही ईमेल को तीन बार पढ़ते हैं पर समझ नहीं आता, या फिर हम 'डिसीजन फटीग' (Decision Fatigue) का शिकार हो जाते हैं।
लेकिन, एक प्रोफेशनल के तौर पर मैं इसे 'हैंडल' करने के लिए तीन स्तरों पर काम करता हूं।

  • कैशे क्लियर करना (Mind Dump): जैसे कंप्यूटर की स्पीड बढ़ाने के लिए हम कैशे क्लियर करते हैं, वैसे ही मैं अपने दिमाग के सारे तनाव और 'टू-डू लिस्ट' को एक डायरी पर लिख लेता हूं। इससे दिमाग को यह सिग्नल मिलता है कि अब उसे यह जानकारी 'स्टोर' करके रखने की ज़रूरत नहीं है।
  • टैब्स बंद करना (Monotasking): कंप्यूटर की तरह अगर दिमाग में भी बहुत सारे टैब्स (काम) खुले रहेंगे, तो सिस्टम क्रैश होगा ही। मैं एक समय में केवल एक काम (Deep Work) पर फोकस करता हूं ताकि प्रोसेस स्मूथ रहे।
  • सिस्टम रीबूट (Digital Detox): जैसे किसी भी मशीन को ठंडा होने और रीस्टार्ट होने की ज़रूरत होती है, वैसे ही मैं 'डिजिटल कर्फ्यू' का पालन करता हूँ। रात को फोन बंद करना और सुबह उठकर प्रकृति के साथ समय बिताना मेरे दिमाग को 'रीबूट' करता है, जिससे नई जानकारी प्रोसेस करने के लिए फिर से जगह (Space) बन जाती है।

हर 5 मिनट में फोन चेक करना मानसिक थकान का कारण है या लक्षण?

यह एक बहुत ही दिलचस्प सवाल है क्योंकि यह एक 'विशियस साइकिल' (दुष्चक्र) की तरह काम करता है। अगर मैं इसे गहराई से देखूं, तो हर 5 मिनट में फोन चेक करना कारण और लक्षण, दोनों ही है।

इसे मैं इस प्रकार समझाना चाहूंगा।

यह एक 'लक्षण' (Symptom) कैसे है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा जब हमारा दिमाग पहले से ही थका हुआ होता है या हम किसी कठिन काम से बचना चाहते हैं, तो दिमाग 'एस्केप रूट' (Escape Route) ढूंढता है। इसे हम 'Cognitive Avoidance' कहते हैं। उस समय फोन चेक करना एक लक्षण है कि हमारा दिमाग अब और काम प्रोसेस नहीं कर पा रहा है और वह 'डोपामाइन' की एक छोटी सी डोज़ ढूंढ रहा है ताकि उसे तुरंत खुशी मिल सके। यानी, थका हुआ दिमाग बार-बार फोन की तरफ भागता है।

यह एक 'कारण' (Cause) कैसे है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा जब हम बिना किसी काम के हर 5 मिनट में फोन उठाते हैं, तो हम अपने दिमाग को कभी भी 'Flow State' (गहरी एकाग्रता) में जाने ही नहीं देते। हर बार नोटिफिकेशन चेक करने पर हमारा ध्यान टूटता है और रिसर्च कहती है कि टूटे हुए ध्यान को वापस काम पर लगाने में दिमाग को लगभग 23 मिनट लगते हैं। यह बार-बार का 'टास्क स्विचिंग' दिमाग की ऊर्जा को बहुत तेज़ी से सोख लेता है, जो अंतत में मानसिक थकान का कारण बन जाता है।

रात को सोने से पहले फोन चलाने से हमारे दिमाग की 'रिकवरी क्षमता' पर क्या असर पड़ता है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, 'रात को सोने से पहले फोन चलाना हमारे दिमाग की 'रिकवरी क्षमता' के लिए सबसे बड़ा दुश्मन है। इसके पीछे मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक कारण हैं पहला, स्क्रीन से निकलने वाली 'ब्लू लाइट' (Blue Light)। यह रोशनी हमारे मस्तिष्क को धोखा देती है कि अभी दिन है, जिससे शरीर में मेलाटोनिन (नींद का हार्मोन) का उत्पादन रुक जाता है। जब तक यह हार्मोन रिलीज नहीं होता, दिमाग गहरे आराम (Deep Sleep) की स्थिति में नहीं जा पाता।'

दूसरा, सोने से पहले मिली जानकारी दिमाग को 'अलर्ट मोड' ( Alert mode ) में रखती है। चाहे वह सोशल मीडिया की कोई खबर हो या काम का मैसेज, दिमाग उसे प्रोसेस करने में व्यस्त हो जाता है।

क्या 'वर्क फ्रॉम होम' ने हमारी मानसिक थकान को बढ़ा दिया है?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा इसके पीछे सबसे बड़ा कारण 'कार्य और व्यक्तिगत जीवन के बीच की धुंधली होती लकीर' है। ऑफिस में एक शारीरिक सीमा होती थी, लेकिन घर पर काम करने से दिमाग कभी भी पूरी तरह 'ऑफ मोड' में नहीं जा पाता।
दूसरा प्रमुख कारण 'ज़ूम फटीग' (Zoom Fatigue) है। वीडियो कॉल्स पर लगातार अपनी और दूसरों की बॉडी लैंग्वेज को मॉनिटर करना दिमाग के लिए सामान्य बातचीत से कहीं ज्यादा थकाऊ होता है। इसके अलावा, ऑफिस के सहकर्मियों के साथ होने वाली अनौपचारिक बातचीत (Coffee breaks) जो तनाव कम करने का काम करती थी, अब खत्म हो गई है।
परिणामस्वरूप, घर पर रहते हुए भी लोग 'हमेशा ऑन' रहने के दबाव में रहते हैं, जिससे 'डिजिटल बर्नआउट' ( Digital burnout ) बढ़ रहा है। सुविधा के साथ मिली इस निरंतर उपलब्धता ने हमारे मस्तिष्क को आराम करने का समय नहीं दिया है।

भारत में 'मानसिक स्वास्थ्य' को लेकर सामाजिक हिचक (Stigma) को कैसे दूर किया जाए?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा भारत में मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी हिचक (Stigma) को दूर करने के लिए हमें इसे 'चरित्र की कमजोरी' के बजाय एक 'चिकित्सीय स्थिति' के रूप में देखने की ज़रूरत है। एक मनोचिकित्सक के तौर पर, मैं इसके लिए तीन स्तरों पर काम करने का सुझाव देता हूं।

सबसे पहले, हमें सामान्य बातचीत (Normalizing Conversation) शुरू करनी होगी। जैसे हम चोट लगने या बुखार होने पर खुलकर बात करते हैं, वैसे ही मानसिक तनाव पर बात करना सामान्य होना चाहिए। दूसरा, शिक्षा और जागरूकता हमें स्कूलों और कार्यस्थलों पर यह सिखाना होगा कि थेरेपी लेना या मनोचिकित्सक के पास जाना 'पागलपन' नहीं, बल्कि 'सेल्फ-केयर' है।
तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण है - रोल मॉडल्स की भागीदारी। जब प्रभावशाली व्यक्तित्व और लीडर्स अपने संघर्षों को साझा करते हैं, तो आम लोगों का डर कम होता है। अंतत में जब हम 'मानसिक स्वास्थ्य' को 'शारीरिक स्वास्थ्य' के समान महत्व देंगे, तभी समाज की सोच में बदलाव आएगा।

कंपनियों को अपने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य के लिए कौन सी नीतियां अपनानी चाहिए?

इस सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, कंपनियों को अपने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य को 'बुनियादी संस्कृति' का हिस्सा बनाना चाहिए। इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण नीति 'राइट टू डिस्कनेक्ट' (Right to Disconnect) है, जहां कार्य समय के बाद ईमेल या मैसेज का जवाब देना अनिवार्य न हो। इससे 'डिजिटल बर्नआउट' को रोकने में मदद मिलती है।

दूसरी बड़ी नीति 'मेंटल हेल्थ लीव' का प्रावधान है, ताकि कर्मचारी बिना किसी हिचक या सामाजिक डर के मानसिक विश्राम के लिए छुट्टी ले सकें। इसके अलावा, कंपनियों को 'एम्प्लॉई असिस्टेंस प्रोग्राम' (EAP) के तहत प्रोफेशनल काउंसिलिंग और थेरेपी की सुविधा मुफ्त और गोपनीय तरीके से देनी चाहिए।

तीसरा कार्यस्थल पर लचीलापन (Flexibility) और सहानुभूतिपूर्ण नेतृत्व होना अनिवार्य है। प्रबंधकों को प्रशिक्षित किया जाना चाहिए कि वे काम के बोझ के बजाय इंसानी जुड़ाव पर ध्यान दें। जब कंपनी अपने कर्मचारियों के मानसिक स्वास्थ्य में निवेश करती है, तो न केवल उत्पादकता बढ़ती है, बल्कि एक वफादार और स्वस्थ कार्यबल भी तैयार होता है।

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