
keoladeo national park : विश्व धरोहर केवलादेव घना राष्ट्रीय पक्षी विहार पर इस बार बड़ा संकट आया है। क्योंकि मानसून की बेरुखी व पांचना बांध से पानी नहीं मिलने के कारण यहां पानी की संकट बढ़ रहा है। अगर कुछ दिन ऐसा ही हाल रहा तो पक्षी यहां इस सीजन में मुंह मोड़ सकते हैं।
विश्व धरोहर केवलादेव घना राष्ट्रीय पक्षी विहार में पक्षियों की प्यास बुझाने के लिए 550 एमसीएफटी पानी चाहिए, लेकिन अभी तक करीब 350 एमसीएफटी पानी मिल सका है। जिस तरह से पिछले कुछ दिन से तेज धूप पड़ रही है, उससे यहां के तालाबों का पानी भी सूख रहा है। अगले कुछ दिन ऐसा ही रहा तो बड़ा संकट सामने आएगा। हालांकि फिलहाल कोई बड़ी चिंता नहीं है, लेकिन आगामी समय में संकट बरकरार है।
घना को चंबल प्रोजेक्ट से हर 10 दिन में एक बार तीन एमसीएफटी पानी दिया जाता है। अब तक छह बार में कुल 18 एमसीएफटी पानी दिया गया है। हालांकि यह उद्यान की आवश्यकता के अनुसार नाम मात्र के बराबर है। घना की आपूर्ति के लिए कुल 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता है। अपर्याप्त जल आपूर्ति के कारण पक्षियों को परेशानी हो रही है। पानी की अनुपलब्धता के चलते पक्षी उन स्थानों पर घोंसले बना रहे हैं, जहां पानी उपलब्ध है। मानसूनी पक्षियों ने भी अपना बसेरा दूसरी जगह बना लिया है। वर्तमान समय पक्षियों का प्रजनन काल होता है। पानी की कमी के कारण उनके जीवन चक्र पर प्रभाव पड़ रहा है। साथ ही जलीय जीवों पर भी बड़ा संकट आ गया है। मछलियां भी पानी की कमी के कारण कम नजर आ रही हैं। हकीकत यह है कि चंबल प्रोजेक्ट से घना को पानी की आपूर्ति पूरी नहीं हो पाती है।
पिछले कुछ वर्षों से अच्छी बारिश के कारण घना में देशी-विदेशी पर्यटकों की संख्या में रिकॉर्ड तोड़ इजाफा हुआ है, लेकिन अब इस बार का यह सीजन प्रभावित हो सकता है। ओपन बिल स्टॉर्क पक्षी केवलादेव घना में आने के बाद पानी नहीं होने के कारण अन्य जगह अपने घोंसले बना रहे हैं। इस अगस्त माह में पेंटेड स्टॉर्क की नेस्टिंग भी हुई है। लेकिन यदि यही स्थिति रही तो वे भी अन्य जगहों पर पलायन कर जाएंगे। इससे घना के लिए बड़ी समस्या खड़ी हो जाएगी। इसका असर यहां के पर्यटन, रिक्शा चालक और गाइडों पर भी पड़ेगा।
वरिष्ठ पक्षी विशेषज्ञ डीडी शर्मा ने बताया कि घना के लिए पानी की बहुत आवश्यकता है। पक्षियों की 11 प्रजातियां पहले ही प्रजनन के लिए घना से विदा हो चुकी हैं। अगस्त में छह प्रजातियों में से कम संख्या में प्रजनन किया है। अगस्त माह में ही फ्लेमिंगो का समूह देखा गया है। वह दुबारा लौटकर आए हैं। अगर पानी उचित मात्रा में नहीं रहा तो सर्दियों में आने वाले पक्षी भी नहीं आएंगे।
करौली का पांचना बांध पिछले करीब दो दशकों से जल बंटवारे को लेकर विवाद का केन्द्र बना हुआ है। वर्ष 2005 के बाद से बांध से गंभीर नदी में नियमित रूप से पानी नहीं छोड़ा गया, क्योंकि बांध के कमांड क्षेत्र के 35 गांवों और बांध से प्रभावित 39 गांवों के किसानों के बीच पानी के उपयोग को लेकर विवाद बना रहा। इस दौरान बांध की जल भंडारण क्षमता बढ़ने के बाद प्राथमिकताएं भी बदल गईं। पहले बांध भरने, फिर करौली क्षेत्र की सिंचाई और पेयजल जरूरतें पूरी करने तथा उसके बाद अतिरिक्त पानी गंभीर नदी में छोड़ने की व्यवस्था लागू हुई। इससे भरतपुर क्षेत्र में गंभीर नदी का प्राकृतिक प्रवाह प्रभावित हुआ, भूजल पुनर्भरण कम हुआ, खेती पर असर पड़ा और विश्व धरोहर केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान के लिए भी जल संकट गहराता गया।
इधर, केवलादेव बचाओ संघर्ष समिति और पर्यावरणविद लगातार पांचना बांध से गंभीर नदी और घना के लिए स्थायी जल आवंटन की मांग कर रहे हैं। हालांकि राज्य सरकार ने जुलाई के पहले सप्ताह में करीब 61 करोड़ रुपए की नई लिफ्ट परियोजनाओं और गुड़ला लिफ्ट परियोजना के रिमॉडलिंग कार्य का शिलान्यास करते हुए दावा किया कि इससे लंबे समय से चला आ रहा जल विवाद सुलझेगा। इसके बाद सरकार ने करीब 20 साल बाद पांचना बांध से गंभीर नदी में पानी छोड़ने की शुरुआत भी की, लेकिन अभी तक घना को पानी नहीं मिल सका है।
घना को साइबेरियन क्रेन पूरी तरह अलविदा कह ही चुके हैं। इसके अलावा खास परिंदों में शुमार रिंगटेल फिशिंग ईगल भी करीब 10-12 साल से यहां नजर नहीं आए हैं। यह पक्षी यहां मानसरोवर से पहुंचता था, जो आकर्षण का केन्द्र रहता था। यह ब्रीडिंग करने यहां पहुंचते थे, लेकिन अब लंबे समय से नजर नहीं आए हैं। इसके अलावा कॉमन क्रेन भी यहां लंबे समय से नजर नहीं आ रही है। इसे भी देखे हुए करीब एक दशक का समय हो गया है। यह साइबेरिया से यहां पहुंचते थे। पक्षी विशेषज्ञ अबरार खान भोलू बताते हैं कि पहले स्थानीय कोहनी बंद में मसूड़ और चना होते थे, जिन्हें यह चाव से खाते थे, लेकिन अब यह फसल यहां नहीं हो रहीं। ऐसे में इन्होंने ठिकाना बदल लिया है। कामां के नौनेरा में यह थोड़ा-बहुत नजर आ रहे हैं।
केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान देश और प्रदेश का विख्यात पक्षियों की शरण स्थली है। इसको घना पक्षी विहार के नाम से भी जानते हैं। 29 वर्ग किलोमीटर में फैला यह स्थान बेहद खूबसूरत हैं। हरियाली से घिरा होने की वजह से पर्यटकों खासा पसंद आता है। घना में सर्दी शुरू होते ही यहां पर प्रवासी पक्षियों का आना शुरू हो जाता है। यहां पर करीब 350 से अधिक प्रजातियों के पक्षी देखने को मिलते हैं। छोटी बतख, जंगली बतख, इण्डियन सारस, कूट, वेगंस, शोवेलेर्स, पिनटेल बतख, सामान्य बतख, लाल कलगी वाली बत्तख यहां के खास आकर्षण हैं। केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान को 10 मार्च 1982 में राष्ट्रीय उद्यान दर्जा मिला। इसके बाद पक्षी विहार का नाम केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान हो गया। साल 1985 में आयोजित वर्ल्ड हेरिटेज कन्वेशन में इस राष्ट्रीय उद्यान को यूनेस्को की ओर से वल्र्ड हेरिटेज साइट में शामिल किया गया था।
भरतपुर के महाराजा सूरजमल ने शासन काल शहर के पास अजान बांध का निर्माण करवाया था। इसको दो नदी गंभीरी और बाणगंगा के संगम पर बनवाया गया था। संरक्षित वन क्षेत्र घोषित किए जाने से पहले सन् 1850 में केवलादेव का इलाका भरतपुर राजाओं की निजी शिकारगाह हुआ करता था। जहां वे और उनके शाही मेहमान मुर्गाबियों का शिकार किया करते थे। यहां पर ब्रिटिश वायसराय के सम्मान में पक्षियों के सालाना शिकार का आयोजन भी होता था। स्वतंत्रता के बाद भी 1972 तक भरतपुर के पूर्व राजा को उनके क्षेत्र में शिकार करने की अनुमति थी लेकिन 1982 से उद्यान में चारा लेने पर भी प्रतिबन्ध लगा दिया गया। पार्क में काफी विविधता है। उद्यान में करीब 350 प्रजातियों के पक्षी, 379 फूलों की प्रजातियां, मछलियों की 57 प्रजातियां, सांपों की एक दर्जन प्रजातियां, छिपकलियों की 5 प्रजाति, 7 उभयचर प्रजाति और करीब 7 कछुआ की प्रजाति यहां पर मिलती हैं।
घना मुख्य रूप से साइबेरियन क्रेन के लिए प्रसिद्ध था। यहां शीत ऋण में साइबेरिया से करीब 5 हजार मील की यात्रा तय कर साइबेरियन क्रेन यहां उद्यान में प्रवास करने पहुंचती थी। उनका जमघट देखते ही बनता था। लेकिन बाद में अफगानिस्तान में छिड़े गृह युद्ध की वजह से उनका फ्लाई मार्ग गड़बड़ा गया। अंतिम समय उद्यान में साल 2002-03 में साइबेरियन के्रन का जोड़ा देखा गया था उसके बाद यह पक्षी नजर नहीं आया।
जिला वन अधिकारी चेतन बीबी ने पत्रिका को बताया कि केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में 550 एमसीएफटी पानी की आवश्यकता है। इस समय 350 एमसीएफटी पानी घना के बी, डी, ई, के, एल एवं एम ब्लॉक में भरा हुआ है। इस बार पांचना से कुछ भी पानी नहीं मिला है। अंजान बांध से 130-140, गोवर्धन ड्रेन से 50, चम्बल से 18 एमसीएफटी पानी मिला है। वहीं आखिर में बारिश से राहत मिली है। धूप तेज नहीं रही तो यह सीजन निकल सकता है। वरना परेशानी आएगी। पांचना बांध से पानी लेने के लिए भी बार-बार पत्र लिखे जा चुके हैं।