
कुरुक्षेत्र जाने की चाह थी, भगवान श्रीकृष्ण के उस स्वरूप के दर्शन करने की लालसा थी, जिसमें वे रणभूमि में अर्जुन को जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान यानी श्रीमद्भागवत गीता सुना रहे थे। लेकिन ट्रेन का टिकट नहीं मिला तो एक भक्त ने हार नहीं मानी। उसने कुरुक्षेत्र जाने के बजाय रतलाम में ही ऐसा मंदिर बनवा दिया, जहां आज भी भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को गीता का ज्ञान देते हुए नजर आते हैं। करीब 75 वर्ष पुराना यह मंदिर शहर ही नहीं, प्रदेश की अनूठी धार्मिक धरोहर बन चुका है।
आमतौर पर श्रीकृष्ण के मंदिरों में कान्हा राधा के साथ बांसुरी बजाते, माखन चुराते या बाल स्वरूप में दिखाई देते हैं। इसके विपरीत रतलाम का यह मंदिर श्रीकृष्ण के उस विराट स्वरूप को समर्पित है, जिसमें वे कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में मोहग्रस्त अर्जुन को कर्म, धर्म और जीवन का सार समझाते हैं। देश में इस स्वरूप के मंदिर गिने-चुने ही हैं।
मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करते ही श्रद्धालुओं को कुरुक्षेत्र के युद्धभूमि जैसा अहसास होता है। यहां रथ पर सवार भगवान श्रीकृष्ण और उनके सम्मुख हाथ जोड़े मोहग्रस्त अर्जुन की मनमोहक मूर्ति स्थापित हैं। मंदिर का मुख्य उद्देश्य मानव जीवन को कर्म, धर्म और कर्तव्यनिष्ठा का पाठ पढ़ाना है। जिस तरह महाभारत युद्ध के दौरान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को निराशा से निकालकर कर्तव्यपथ पर अग्रसर किया था, वही ऊर्जा यहां आने वाले भक्तों को महसूस होती है। भारत भर में इस विशिष्ट मुद्रा और स्वरूप के मंदिर अत्यंत दुर्लभ और गिने-चुने हैं, जिससे रतलाम का यह मंदिर धार्मिक पर्यटन व शोध की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण स्थान रखता है।
वर्तमान में यह मंदिर अपनी स्थापना के 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुका है। मंदिर के पुजारी चेतन जोशी एवं मंदिर समिति से जुड़े भक्त महेंद्र कटारिया बताते हैं कि यहां विशेष धार्मिक आयोजनों की श्रृंखला लगातार चलती है दिन भर प्रसादी वितरण, गीता पाठ, और अखंड कीर्तन का आयोजन किया जाता है। संध्या आरती के समय मंदिर परिसर श्रद्धालुओं की अपार भीड़ से सरोबार हो जाता है। रतलाम शहर ही नहीं, बल्कि आसपास के जिलों से भी हजारों श्रद्धालु भगवान के इस अनूठे दर्शन के लिए पहुंचते हैं।
मंदिर से जुड़े भक्त महेंद्र कटारिया बताते हैं कि शहर के कोयला ठेकेदार धुलजी प्रजापत ने इसका निर्माण करवाया था। मंदिर के पुजारी गोपाल जोशी के अनुसार धुलजी भगवान श्रीकृष्ण के परम भक्त थे और हर जन्माष्टमी पर कुरुक्षेत्र स्थित गीता मंदिर के दर्शन के लिए जाते थे। करीब 77 वर्ष पहले कुरुक्षेत्र जाने के लिए रतलाम से दिल्ली की ट्रेन का टिकट नहीं मिल सका। भक्ति ऐसी थी कि यात्रा रुकने के बजाय संकल्प ने जन्म लिया और धुलजी ने रतलाम में ही गीता मंदिर बनवा दिया। आज मंदिर अपने 75वें वर्ष में है। जन्माष्टमी पर यहां सुबह से रात तक विभिन्न धार्मिक आयोजन होंगे और श्रद्धालु श्रीकृष्ण-अर्जुन के इस अद्भुत स्वरूप के दर्शन करेंगे।
यदि आप भी कुरुक्षेत्र के इस दिव्य स्वरूप का दर्शन रतलाम में करना चाहते हैं, तो यहां पहुंचने की व्यवस्थाएं बेहद सुगम और व्यवस्थित हैं। रतलाम जंक्शन दिल्ली-मुंबई मुख्य रेल मार्ग (पश्चिम रेलवे) का एक प्रमुख और व्यस्त केंद्र है। यहां उत्तर भारत, दक्षिण भारत, कोंकण रेलवे और देश के लगभग सभी प्रमुख राज्यों से आने-जाने वाली ट्रेनों का ठहराव होता है। निकटतम हवाई अड्डा इंदौर में (देवी अहिल्याबाई होल्कर अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा) है, जो देश के सभी मुख्य शहरों से उड़ानों द्वारा सीधे जुड़ा हुआ है।
इंदौर से रतलाम के बीच एक आधुनिक फोरलेन हाईवे बना हुआ है। इंदौर एयरपोर्ट से टैक्सी या बस द्वारा रतलाम आसानी से पहुंचा जा सकता है। शहर के अंदर मित्र निवास रोड पर मंदिर स्थित है। रतलाम शहर में तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के लिए हर बजट श्रेणी के होटल, लॉज और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं, जहां परिवार के साथ सुखद प्रवास किया जा सकता है। रतलाम का यह गीता मंदिर इस बात का जीवंत उदाहरण है कि जब आस्था सच्ची होती है, तो ईश्वर के दर्शन के लिए मार्ग में आने वाली कोई भी बाधा रुकने का कारण नहीं बनती। धुलजी प्रजापत के उस एक निर्णय ने आज मालवा क्षेत्र को एक अनूठी और महान सांस्कृतिक विरासत प्रदान की है।