Patrika Special News

Devjhar Madhya Pradesh : पहाड़ों की गहराई में छिपा देवताओं का धाम, चट्टानों पर नाखूनों से उकेरी भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की अद्भुत प्रतिमाएं

Devjhar Madhya Pradesh : 150 फीट नीचे गुफा में प्राचीन शिवलिंग विराजित हैं। यह लोक मान्यता है कि तपस्वी टीले पर ऋषि-मुनि साधना किया करते थे। यइ स्थान पांडवों से भी जुड़ी है। दुर्गम रास्तों के बीच छिपे देवझर की अद्भुत दुनिया की कहानी आशीष पाठक विस्तार से बता रहे हैं।
7 min read
• •
Updated: 7 Nov 2026, 11:40 AM IST
Devjhar Ratlam Madhya pradesh
150 फीट नीचे गुफा के अंदर शिवलिंग स्थापित हैं। (Photo: Rajasthan Patrika)

Devjhar Madhya Pradesh : प्रकृति ने पहाड़ों, जंगलों और झरनों के बीच न जाने कितने ऐसे रहस्य छिपा रखे हैं, जिन तक आज भी आम इंसान की पहुंच नहीं हो सकी है। कुछ स्थान ऐसे हैं, जहां पहुंचते ही ऐसा महसूस होता है मानो समय ठहर गया हो और प्रकृति की गोद में सदियों पुरानी कोई आध्यात्मिक कथा आज भी जीवित हो।

रतलाम जिले की मध्य प्रदेश-राजस्थान सीमा पर स्थित देवझर भी ऐसा ही एक रहस्यमयी और अद्भुत स्थान है। यहां ऊंचे पहाड़ों के बीच करीब 150 फीट नीचे उतरने पर चट्टानों की दुनिया में प्राचीन आस्था के ऐसे चिह्न दिखाई देते हैं, जिन्हें देखकर हर कोई आश्चर्यचकित रह जाता है।

यहां भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हैं

कहीं प्राकृतिक गुफा में प्राचीन शिवलिंग विराजमान हैं तो कहीं विशाल चट्टानों पर भगवान विष्णु को शेषनाग की शैया पर विश्राम करते और उनके समीप मां लक्ष्मी को विराजित दर्शाया गया है। भगवान गणेश, भैरव और अन्य देवी-देवताओं की आकृतियां भी यहां चट्टानों पर उकेरी गई हैं। स्थानीय मान्यता है कि इन प्रतिमाओं को प्राचीन काल में तपस्वियों ने अपने नाखूनों से चट्टानों को कुरेदकर बनाया था। इतना ही नहीं, यहां मौजूद तपस्वी टीला और गुफा को लेकर पांडवों तथा ऋषि-मुनियों से जुड़ी मान्यताएं भी प्रचलित हैं।

Photo: Rajasthan Patrika

इतिहास के पन्नों में इस स्थान की प्राचीनता और शिल्पकला का प्रमाण भले ही दर्ज नहीं है, लेकिन यहां मौजूद दृश्य अपने आप में कई अनकही कहानियां समेटे हुए हैं। दीपोत्सव के अवसर पर मां लक्ष्मी के पूजन और भगवान विष्णु की आराधना के बीच पत्रिका की टीम ने दुर्गम रास्तों और कठिन परिस्थितियों को पार कर इस अनदेखे देवस्थान को पहली बार मीडिया के माध्यम से सामने लाने का प्रयास किया है। पत्रिका के रतलाम रिपोर्टर आशीष पाठक ने देवझर पहुंचकर यहां की अद्भुत प्राकृतिक छटा, प्राचीन गुफा और चट्टानों पर उकेरी गई देव प्रतिमाओं की छवि को कैमरे में कैद किया।

पहाड़ों के बीच छिपा है देवताओं का यह अद्भुत धाम

रतलाम जिला मुख्यालय से करीब 50 किलोमीटर दूर मध्य प्रदेश और राजस्थान की सीमा के समीप स्थित देवझर तक पहुंचना किसी रोमांचक यात्रा से कम नहीं है। रतलाम से सैलाना और फिर कोटड़ा होते हुए पहाड़ों के बीच से गुजरने वाले पथरीले और दुर्गम रास्तों से यहां पहुंचा जा सकता है। रास्ते में चारों ओर ऊंचे पहाड़, घनी प्राकृतिक वनस्पति और चट्टानों के बीच से बहते पानी की कलकल ध्वनि मन को एक अलग ही अनुभूति कराती है।

देवझर के झरने पर देवताओं का होता था आगमन

देवझर नाम अपने आप में इस स्थान की धार्मिक मान्यता को उजागर करता है। स्थानीय लोगों के बीच प्रचलित कथाओं के अनुसार, प्राचीन समय में इस झरने पर देवताओं का आगमन हुआ करता था। इसी कारण इस स्थान को देवझर कहा जाने लगा। हालांकि इस नाम की ऐतिहासिक उत्पत्ति का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, लेकिन आसपास के लोगों की आस्था में इस स्थान का विशेष महत्व है।

ऊंचे पहाड़ों के बीच से नीचे उतरते हुए जब इस स्थान पर पहुंचते हैं तो प्रकृति का एक बिल्कुल अलग रूप सामने आता है। ऊपर से सामान्य पहाड़ी क्षेत्र दिखाई देने वाला यह इलाका नीचे उतरने पर झरनों, विशाल चट्टानों और प्राकृतिक संरचनाओं की अद्भुत दुनिया में बदल जाता है। इसी प्राकृतिक परिवेश के बीच प्राचीन धार्मिक अवशेष और देव प्रतिमाएं मौजूद हैं, जो इस स्थान को सामान्य पर्यटन स्थल से अलग पहचान देती हैं।

गुफा में विराजित हैं प्राचीन शिवलिंग, रहस्यमयी है रास्ता

देवझर की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यहां चट्टानों के बीच मौजूद प्राकृतिक गुफा है। इस गुफा के भीतर प्राचीन शिवलिंग विराजमान हैं। चट्टानों के बीच से होकर गुफा तक पहुंचने का रास्ता दिखाई देता है, लेकिन इसके आगे गुफा किस दिशा में जाती है और कहां खुलती है, इसकी स्पष्ट जानकारी किसी के पास नहीं है।

गुफा के भीतर मौजूद शिवलिंग को लेकर स्थानीय स्तर पर गहरी धार्मिक आस्था है। मान्यता है कि पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान इस स्थान पर आकर शिवलिंग की स्थापना की थी। कहा जाता है कि वनवास और अज्ञातवास के समय पांडवों ने अनेक धार्मिक स्थलों पर भगवान शिव की आराधना की थी। देवझर की गुफा को भी इसी परंपरा से जोड़कर देखा जाता है। गुफा में विराजित शिवलिंग की मौजूदगी इस स्थान को श्रद्धा और जिज्ञासा का केंद्र बनाती है।

Photo: Rajasthan Patrika

चट्टानों के बीच स्थित इस गुफा को देखकर सहज ही कल्पना की जा सकती है कि प्राचीन समय में तपस्वियों के लिए यह स्थान कितना एकांत और साधना के अनुकूल रहा होगा। बाहर की दुनिया से लगभग अलग-थलग, पहाड़ों से घिरा यह प्राकृतिक परिवेश आध्यात्मिक साधना के लिए उपयुक्त प्रतीत होता है।

चट्टानों पर भगवान विष्णु के समीप विराजती हैं मां लक्ष्मी

देवझर का सबसे अद्भुत और आकर्षक दृश्य यहां की विशाल चट्टानों पर उकेरी गई देवी-देवताओं की आकृतियां हैं। करीब 150 फीट नीचे चट्टानी क्षेत्र में पहुंचने पर ऐसी आकृतियां दिखाई देती हैं, जिन्हें देखकर पहली नजर में विश्वास करना कठिन हो जाता है कि प्राकृतिक चट्टानों पर इस तरह की कलाकृतियां किसने और कैसे बनाई होंगी।

इन आकृतियों में सृष्टि के पालनहार भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर विश्राम करते हुए दिखाई देते हैं। उनके समीप मां लक्ष्मी विराजमान हैं। भगवान विष्णु की शेषशैया का यह स्वरूप सनातन धर्म में सृष्टि के पालन, संरक्षण और अनंत काल का प्रतीक माना जाता है। भगवान विष्णु के इस दिव्य स्वरूप के साथ मां लक्ष्मी की उपस्थिति इस दृश्य को और भी विशेष बना देती है।

दीपावली पर जहां घर-घर में मां लक्ष्मी और भगवान विष्णु की आराधना की जाती है, वहीं पहाड़ों की गहराई में चट्टानों पर मौजूद यह प्राचीन स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण बन सकता है।

यहां केवल भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की आकृतियां ही नहीं हैं, बल्कि भगवान गणेश और भगवान भैरव के स्वरूप भी दिखाई देते हैं। कुछ आकृतियों में भैरव को तपस्या करते हुए दर्शाया गया है। इनके अलावा अन्य देवी-देवताओं के चित्र भी चट्टानों पर मौजूद हैं।

इन आकृतियों की सबसे खास बात यह है कि ये किसी मंदिर के गर्भगृह या दीवारों पर नहीं, बल्कि प्राकृतिक चट्टानों की सतह पर उकेरी गई हैं। स्थानीय मान्यता है कि प्राचीन काल में ऋषि-मुनि और तपस्वी यहां साधना के लिए आते थे। इसी दौरान उन्होंने अपने नाखूनों से चट्टानों को धीरे-धीरे कुरेदकर देवी-देवताओं की आकृतियां बनाई थीं।

यदि यह मान्यता सही है तो इन कलाकृतियों को तैयार करने में कितना समय और कितनी साधना लगी होगी, इसकी कल्पना करना भी कठिन है। हालांकि इन चित्रों को बनाने की तकनीक, कालखंड और कलाकारों की पहचान के संबंध में अभी तक कोई प्रमाणिक अध्ययन सामने नहीं आया है। यही कारण है कि देवझर की ये आकृतियां धार्मिक आस्था के साथ-साथ पुरातात्विक जिज्ञासा का विषय भी हैं।

तपस्वी टीला… जहां साधना में लीन रहते थे ऋषि-मुनि

देवझर में चट्टानों पर उकेरी गई देव प्रतिमाओं से कुछ दूरी पर पत्थरों का एक विशेष टीला मौजूद है। स्थानीय लोग इसे तपस्वी टीला कहते हैं। मान्यता है कि प्राचीन समय में ऋषि-मुनि और साधक इसी टीले पर बैठकर तपस्या किया करते थे।

चारों तरफ ऊंचे पहाड़ और प्राकृतिक एकांत के बीच स्थित यह स्थान साधना के लिए अनुकूल दिखाई देता है। यहां पहुंचने पर ऐसा लगता है कि कभी इस क्षेत्र में तपस्वियों का ठहराव रहा होगा। आसपास की चट्टानें, गुफा और झरने का प्राकृतिक वातावरण इस संभावना को और रोचक बनाते हैं।

स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, देवझर केवल जलप्रपात या प्राकृतिक सुंदरता वाला स्थान नहीं था, बल्कि यह ऋषियों की तपस्थली भी रहा है। यहां की गुफा में शिवलिंग, तपस्वी टीला और चट्टानों पर देवी-देवताओं की आकृतियां इस धार्मिक परंपरा से जुड़ी अलग-अलग कथाओं को सामने लाती हैं।

हालांकि इन मान्यताओं की ऐतिहासिक पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इनका संरक्षण और व्यवस्थित अध्ययन किया जाए तो देवझर के अतीत से जुड़े कई महत्वपूर्ण तथ्य सामने आ सकते हैं।

Photo: Rajasthan Patrika

झरने की कलकल और पहाड़ों की शांति में बसा है देवझर

देवझर केवल धार्मिक रहस्यों के कारण ही खास नहीं है, बल्कि प्राकृतिक सुंदरता के मामले में भी यह क्षेत्र बेहद आकर्षक है। ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों के बीच से बहता झरना, चट्टानों पर गिरते पानी की आवाज और चारों तरफ फैली हरियाली यहां आने वाले प्रत्येक व्यक्ति को सुकून का अनुभव कराती है।

झरने की कलकल ध्वनि और पहाड़ों के बीच गूंजती प्राकृतिक आवाजें किसी संगीत से कम नहीं लगतीं। यहां कुछ समय बिताने पर शहरों के शोरगुल से दूर प्रकृति के साथ एक अलग ही जुड़ाव महसूस होता है।

पानी और चट्टानों से निर्मित प्राकृतिक संरचनाएं इस क्षेत्र को विशेष बनाती हैं। पहाड़ों के बीच नीचे उतरने पर एक के बाद एक ऐसे दृश्य सामने आते हैं, जो किसी अनदेखी दुनिया में पहुंचने का अहसास कराते हैं।

यही प्राकृतिक सुंदरता और धार्मिक विरासत देवझर को एक संभावित धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन स्थल के रूप में स्थापित करने की क्षमता रखती है।

इतिहास के पन्नों से दूर, कई सवालों के जवाब तलाश रहा देवझर

देवझर की सबसे बड़ी विशेषता ही इसका रहस्य है। यहां मौजूद शिवलिंग कितना पुराना है? चट्टानों पर भगवान विष्णु, मां लक्ष्मी, भगवान गणेश और भैरव की आकृतियां किसने बनाई थीं? क्या वास्तव में ऋषि-मुनियों ने नाखूनों से इन्हें उकेरा था?
गुफा का वास्तविक विस्तार कितना है? क्या इस क्षेत्र का संबंध किसी प्राचीन धार्मिक परंपरा या ऐतिहासिक सभ्यता से रहा है?

ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब अभी सामने आने बाकी हैं।

स्थानीय स्तर पर प्रचलित कथाएं इस स्थान को पांडवों, ऋषि-मुनियों और देवताओं के आगमन से जोड़ती हैं, लेकिन इनकी प्रमाणिकता जानने के लिए पुरातत्वविदों, इतिहासकारों और विशेषज्ञों द्वारा अध्ययन किया जाना आवश्यक है। चट्टानों पर बनी आकृतियों की उम्र, निर्माण शैली और उनके धार्मिक प्रतीकों का वैज्ञानिक परीक्षण किया जाए तो इस क्षेत्र के इतिहास की नई परतें खुल सकती हैं।

संरक्षण और विकास से बन सकता है बड़ा धार्मिक पर्यटन केंद्र

देवझर की सबसे बड़ी चुनौती यहां तक पहुंचने का दुर्गम रास्ता और सुविधाओं का अभाव है। प्राकृतिक सुंदरता और प्राचीन धार्मिक धरोहर होने के बावजूद यह स्थान अब तक व्यापक पहचान नहीं बना पाया है। यदि प्रशासन और पर्यटन विभाग इस दिशा में पहल करें तो देवझर को धार्मिक एवं प्राकृतिक पर्यटन के नक्शे पर प्रमुख स्थान मिल सकता है।

इसके लिए सबसे पहले यहां तक पहुंचने वाले रास्ते को सुरक्षित और सुगम बनाने, उचित संकेतक लगाने, साफ-सफाई, पेयजल और आवश्यक सुरक्षा इंतजाम करने की जरूरत है। साथ ही चट्टानों पर उकेरी गई प्राचीन आकृतियों और गुफा में मौजूद शिवलिंग का संरक्षण विशेषज्ञों की देखरेख में किया जाना चाहिए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विकास के नाम पर यहां की प्राकृतिक संरचनाओं और प्राचीन कलाकृतियों को कोई नुकसान नहीं पहुंचे। गुफा की सुरक्षा, चट्टानों की स्थिति और झरने के प्राकृतिक प्रवाह को बनाए रखते हुए योजनाबद्ध विकास किया जाए।

देवझर की धार्मिक मान्यताओं, प्राकृतिक सौंदर्य और रहस्यमयी इतिहास को एक साथ प्रस्तुत किया जाए तो यह स्थान रतलाम जिले की नई पहचान बन सकता है। दीपावली के अवसर पर भगवान विष्णु और मां लक्ष्मी की चट्टानों पर उकेरी गई आकृतियों का सामने आना भी अपने आप में विशेष महत्व रखता है।

पहाड़ों की गहराई में छिपा देवझर आज भी अपने भीतर सदियों पुराने रहस्य समेटे हुए है। यहां की गुफा, प्राचीन शिवलिंग, तपस्वी टीला और चट्टानों पर उकेरी गई देव प्रतिमाएं मानो अतीत की कोई अनकही कथा सुनाने को तैयार हैं। जरूरत है तो बस इस धरोहर को पहचानने, उसके रहस्यों की प्रमाणिक जांच करने और आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित रखने की।

Updated on:
7 Nov 2026, 11:40 AM IST
Published on:
Also Read
View All
Guest Editor: महिला सरपंच ने जल प्रबंधन सिखाकर बदल दी गांव की तस्वीर

Diwali : राजस्थान में यहां दीपावली के 5 दिन पहले तक जलते हैं रावण, मूक संवाद तो कहीं ग्रामीणों की आमने-सामने की लड़ाई में होता है दशानन का अंत

Shree Mahalaxmi Temple : दुनिया में अपनी अनूठी पहचान बना चुका रतलाम का महालक्ष्मी मंदिर, पांच दिन मां के दरबार में सजेगा करोड़ों का खजाना

Who is Popabai : न राजा का पता, न रियासत का… फिर भी मशहूर है पोपाबाई का राज, सादुलशहर में सजा है दरबार

दीप पर्व पर यहां मिलेगा लक्ष्मी कृपा के साथ आरोग्य का आशीष, छत्तीसगढ़ का पहला धन्वंतरि मंदिर बना आस्था और आयुर्वेद का महाकेंद्र