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GRMC : सर्किट! अपुन को एक फ्रेश बॉडी मांगता है…फिल्मों में आसान था मुन्ना भाई बनना, यहां 250 भावी डॉक्टरों पर सिर्फ 5 शव, कैसे सीखेंगे सर्जरी?

GRMC : ग्वालियर के जीआरएमसी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों को प्रैक्टिल के शव नहीं मिल रहे हैं। रील लाइफ की चुहलबाजी से रियल लाइफ बिल्कुल अलग है। सच तो यह है कि असल जिंदगी में डॉक्टरों का प्रशिक्षण बगैर एनाटॉमी के चीरफाड़ के पूरा नहीं हो सकता है। इस बारे प्रवेन्द्र तोमर की खास रिपोर्ट पढ़िए।
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Oct 21, 2026
Anatomy Crisis in GRMC Medical College Gwalior
जीआरएमसी मेडिकल कॉलेज में डॉक्टरों को प्रैक्टिल के शव नहीं मिल रहे हैं। (ChatGpt)

GRMC : राजकुमार हिरानी की कल्ट-क्लासिक फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस का वह मशहूर दृश्य आज भी हर किसी के जेहन में ताजा है, जब मेडिकल कॉलेज के डिसेक्शन हॉल में डॉक्टर अस्थाना मानव शरीर रचना की क्लास लेते हैं और बैकबेंच पर बैठे मुन्ना भाई अपने खास गुर्गे सर्किट को फोन घुमाकर ठसके से कहते हैं- सर्किट, एनाटॉमी सीखने के लिए एक बॉडी मांगता है… एकदम फ्रेश वाली! और सर्किट कुछ ही घंटों में एक जिंदा आदमी को बोरी में भरकर टेबल पर पटक देता है।

कैसे डॉक्टर सीख पाएंगे सर्जरी?

सिनेमा हॉल की अंधेरी दीर्घाओं में बैठकर इस दृश्य पर सीटियां बजाना और ठहाके लगाना बेहद आसान था। लेकिन अगर आप ग्वालियर के ऐतिहासिक गजराराजा मेडिकल कॉलेज (जीआरएमसी) के एनाटॉमी डिसेक्शन हॉल में कदम रखेंगे, तो आपको समझ आएगा कि फिल्मों में मुन्ना भाई बनना भले कितना भी आसान रहा हो, हकीकत की दुनिया में एक काबिल, संजीदा और हुनरमंद डॉक्टर बनना रूह कंपा देने वाली चुनौतियों से भरा है!

चालू शैक्षणिक सत्र से एमबीबीएस की सीटें बढ़ीं

ग्वालियर-चंबल अंचल के सबसे बड़े मेडिकल संस्थान जीआरएमसी में इस शैक्षणिक सत्र से एमबीबीएस की सीटें 200 से बढ़ाकर 250 कर दी गई हैं। सरकार ने कागजों पर कलम चलाकर सीटें तो बढ़ा दीं और मेधावी छात्रों को डॉक्टर बनने का सपना भी बेच दिया, लेकिन सबसे बड़ा और कड़वा सच यह है कि इन भावी सर्जनों को डॉक्टरी का पहला और सबसे बुनियादी पाठ सिखाने के लिए कॉलेज के पास शव (कैडेवर) ही नहीं हैं।

250 छात्रों पर सिर्फ 5 नए शव: एक टेबल पर 25 डॉक्टरों की भीड़

मेडिकल साइंस का अटल नियम है कि कोई भी छात्र तब तक एक कुशल सर्जन नहीं बन सकता, जब तक वह एनाटॉमी लैब में मानव शरीर की जटिल संरचना, मांसपेशियों के रेशे, खून की बारीक धमनियां, सूक्ष्म नसें और हड्डियों के जोड़ को अपने हाथों से छूकर, चीरकर और परखकर न देख ले। इसे मेडिकल की जुबान में डिसेक्शन प्रैक्टिकल कहा जाता है।

मानक क्या कहते हैं?

  • राष्ट्रीय आयुर्विज्ञान आयोग और चिकित्सा शिक्षा के स्थापित मानकों के अनुसार, 250 एमबीबीएस छात्रों और 10 पीजी (एमएस/एमडी) रेजीडेंट्स के अध्ययन के लिए एक सत्र में कम से कम 10 से 12 नए मानव शवों की अनिवार्य दरकार होती है। आदर्श स्थिति यह मानी जाती है कि 10 से 12 छात्रों के बीच एक शव उपलब्ध हो।
  • जीआरएमसी की जमीनी हकीकत: इस पूरे सत्र में कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को केवल 5 नए शव ही मिल सके हैं।

टेबल का गणित और छात्रों की बेबसी

पहले लैब में 8 टेबल लगती थीं, जिन्हें मजबूरी में बढ़ाकर 10 कर दिया गया है। इसका सीधा और डरावना गणित यह है कि एक टेबल पर 20 से 25 मेडिकल छात्र एक साथ खड़े होकर अध्ययन कर रहे हैं। हालात यह हैं कि आगे की कतार में खड़े दो-चार छात्र ही शव पर चीर-फाड़ कर पाते हैं, जबकि पीछे खड़े छात्र सिर्फ उचक-उचक कर औपचारिकता पूरी करते हैं। एक छात्र ने नाम न छापने की शर्त पर अपना दर्द बयां किया- "हम किताबों में तो रट लेते हैं कि फलां नस कहां से गुजरती है, लेकिन जब 25 लोगों के बीच खड़े होकर देखने का मौका ही न मिले, तो हम कल ऑपरेशन थियेटर में मरीज के शरीर पर पहली बार छुरी कैसे चलाएंगे?"

2024 में जगी थी उम्मीद, फिर क्यों ठंडा पड़ गया देहदान?

जीआरएमसी के एनाटॉमी विभाग के दस्तावेज बताते हैं कि वर्ष 2024 में कॉलेज को रिकॉर्ड 15 पार्थिव देह दान में प्राप्त हुई थीं। उस वक्त लगा था कि अंधविश्वासों, रूढ़ियों और सामाजिक भ्रांतियों को तोड़कर लोग चिकित्सा विज्ञान के लिए आगे आ रहे हैं। लेकिन यह उम्मीद महज एक साल में ही दम तोड़ गई।

बीते दो सालों में देहदान का ग्राफ ऐसा लुढ़का कि पूरे संभाग से बमुश्किल 10 शव ही मिल पाए- यानी सालाना औसत महज 5 शव पर सिमट गया। देहदान को लेकर प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर कोई सतत जागरूकता अभियान न चलने के कारण समाज में फैली हिचक दोबारा हावी हो गई है।

खुद तंगहाल जीआरएमसी, ऊपर से नए श्योपुर कॉलेज का बोझ

जीआरएमसी खुद कैडेवर के भीषण सूखे से जूझ रहा है, लेकिन उस पर 'बड़ा भाई' होने का प्रशासनिक दबाव भी है। प्रदेश सरकार ने अंचल में नए मेडिकल कॉलेज तो खोल दिए, लेकिन वहां न तो कोई देहदान नेटवर्क है और न ही संसाधन।

हाल ही में वरिष्ठ अधिकारियों के मौखिक व लिखित निर्देशों के बाद जीआरएमसी को अपने सीमित कोटे में से 2 कैडेवर नवस्थापित श्योपुर मेडिकल कॉलेज को भेजने पड़े। यानी ग्वालियर के छात्रों के हिस्से की तालीम काटकर दूसरे जिले की व्यवस्था की लाज बचाई गई। इससे जीआरएमसी के डिसेक्शन हॉल में संकट और अधिक गहरा गया।

लावारिस शवों का पुराना सहारा भी नियमों में उलझा

एक दशक पहले तक मेडिकल कॉलेजों की 70 फीसदी जरूरतें सरकारी अस्पतालों और रेलवे ट्रैक से मिलने वाले अज्ञात व लावारिस शवों से पूरी हो जाती थीं। पुलिस पंचनामा बनाकर तय समय सीमा बीतने के बाद ऐसे शव मेडिकल कॉलेज के एनाटॉमी विभाग को सौंप देती थी।

लेकिन हाल के वर्षों में मानव अधिकारों, डीएनए सैंपलिंग, डिजिटल फोटोग्राफी और पुलिस अनापत्ति के कड़े नियमों के चलते लावारिस शव मिलने की प्रक्रिया बेहद जटिल हो गई है। पुलिस अब किसी भी झंझट या कानूनी विवाद से बचने के लिए लावारिस शवों को मेडिकल कॉलेज सौंपने के बजाय सीधे अंतिम संस्कार करवाना ज्यादा सुरक्षित समझती है।

प्लास्टिक मॉडल और सिमुलेटर नहीं ले सकते इंसान का स्थान

कुछ निजी मेडिकल कॉलेज वर्चुअल डिसेक्शन टेबल और 3डी प्लास्टिक मॉडल्स के जरिए पढ़ाई का दावा करते हैं, लेकिन वरिष्ठ सर्जन इसे अधूरा ज्ञान मानते हैं। उनका कहना है कि हर इंसान के शरीर की आंतरिक संरचना में कुछ न कुछ व्यक्तिगत भिन्नता होती है। किसी की धमनी थोड़ी बाईं तरफ हो सकती है, किसी की नस थोड़ी गहराई में। यह बारीक फर्क प्लास्टिक के पुतलों पर कभी नहीं सीखा जा सकता। इसे केवल वास्तविक इंसानी देह पर ही महसूस किया जा सकता है।

Updated on:
21 Oct 2026 01:07 pm
Published on:
21 Oct 2026 01:07 pm