
Tribal Student : आदिवासी बच्चों को बेहतर शिक्षा, पौष्टिक भोजन और सुरक्षित माहौल देने के लिए बनाए गए छात्रावासों में ही बुनियादी सुविधाओं पर सवाल खड़े हो रहे हैं। हालात ऐसे हैं कि भोजन की गुणवत्ता और व्यवस्था से नाराज विद्यार्थी अपनी आवाज अधिकारियों तक पहुंचाने के लिए ग्रामीण अंचलों से संभागीय मुख्यालय तक पैदल मार्च करने को मजबूर हैं।
सवाल सिर्फ थाली में परोसे जा रहे भोजन का नहीं, बल्कि उन बच्चों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य का है। पत्रिका ने गोपहारू, जैतपुर और बुढ़ार क्षेत्र के छात्रावासों की जमीनी स्थिति को समझने का प्रयास किया। बच्चों की शिकायतें छात्रावासों की भोजन व्यवस्था, रसोइयों की उपलब्धता और सुुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती हैं।
छात्रावासों में विद्यार्थियों की सबसे बड़ी शिकायत भोजन की गुणवत्ता और तय मैन्यू के पालन को लेकर है। विद्यार्थियों के अनुसार, नाश्ते, दोपहर और रात के भोजन में कई बार एक जैसा खाना दिया जाता है। दाल और सब्जियों में पानी अधिक होने, चावल की गुणवत्ता ठीक नहीं तथा भोजन में कंकड़ निकलने जैसी शिकायतें भी सामने आई हैं। विद्यार्थियों का कहना है कि एक समय मिलने वाली रोटियां कभी जली हुई तो कभी अधपकी होती हैं।
भोजन तैयार करने की व्यवस्था को लेकर भी सवाल हैं। विद्यार्थियों से मिली जानकारी के अनुसार, अधिकतर छात्रावासों में प्रशिक्षित रसोइयों के स्थान पर स्थानीय महिलाओं या अन्य लोगों से खाना बनवाया जा रहा है।
रसोई में काम करने वाले व्यक्ति को स्वच्छता, खाद्य सुरक्षा और निर्धारित मैन्यू की जानकारी नहीं है। खाद्य सामग्री की सफाई, भंडारण, रसोई की स्वच्छता और भोजन की गुणवत्ता की जांच के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।
छात्रावासों में भोजन के अलावा बच्चों की सुरक्षा, अनुशासन और देखरेख भी महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। अधीक्षक रात में गायव रहते हैं। वार्डवॉय और चपरासी ही अधिकांश व्यवस्थाएं संभाल रहे हैं। रात्रिकालीन निगरानी, बच्चों की उपस्थिति, स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों और शिकायतों के निवारण के लिए पर्याप्त कर्मचारी उपलब्ध नहीं है। छात्रावासों की व्यवस्थाओं के लिए बजट और सुविधाओं का प्रावधान होने के बावजूद यदि विद्यार्थी भोजन की गुणवत्ता को लेकर सड़क पर उतर रहे हैं, तो यह निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल है।