
Widow Village in Madhya Pradesh : मध्यप्रदेश की राजधानी से 100 किलोमीटर दूर विदिशा जिले के गंजबसोदा क्षेत्र के घटेरा गांव निवासी भुजबल की उम्र अभी 50 से कम ही है, लेकिन हालत ऐसी कि बिस्तर से मुश्किल से उठ पाते हैं। सामने छह बेटियों से भरे पूरे परिवार की जिम्मेदारी है पर वे अब सुबकने के अलावा कुछ नहीं कर पा रहे हैं। दरअसल, बेटे की चाहत में भुजबल छह बेटियों के पिता बन गए। उनकी चिंता सताने लगी तो काम की तलाश में राजस्थान के उदयपुर चले गए।
वहां उन्होंने पत्थर की खदान में 20 साल तक काम किया। लेकिन कमाई के नाम पर ऐसी बीमारी मिली, जिसके प्रति न तो उनमें जागरुकता थी और न ही उसकी समझ। दम फूलने लगा, पैदल चलना मुश्किल हो गया। थोड़े समय में ही थकान ऐसी कि काम करना मुश्किल हो गया। हारकर वह अपपने गांव वापस आ गए। हालत बिगड़ने लगी तो इलाज के लिए अस्पताल पहुंचे। प्रथमदृष्टया टीबी होने की आशंका पर उपचार शुरू किया गया। बाद में जांच रिपोर्ट में सिलकोसिस की पुष्टि हुई। भुजबल को जब परिवार का सहारा बनना था, वह इस बीमारी से जूझ रहे हैं। भोपाल के मेडिकल कॉलेज के पल्मोनरी विभाग में उनका इलाज चल रहा है।
इस गंभीर बीमारी से पीड़ित भुजबल अकेले नहीं हैं, बल्कि विदिशा जिले और उसके आसपास के दूसरे जिलों में बलुआ पत्थरों को गढ़ने वाले सैकड़ों लोग सिलकोसिस की बीमारी के शिकार हैं। यह अस्पताल तभी पहुंचते हैं जब हालत बिगड़ने लगती है। सिलिकोसिस के मरीज समय पर इलाज नहीं मिलने के चलते आगे चलकर टीबी के शिकार भी हो जाते हैं। मेडिकल कॉलेज में हर महीने सिलिकोसिस के औसतन 8 से 10 मरीज पहुंच रहे हैं। इनमें कई टीबी की चपेट में पहुंच चुके होते हैं। पल्मोनरी विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. अजय उपाध्याय के अनुसार सिलिकोसिस की बीमारी से अक्सर वहीं लोग पीड़ित होते हैं, जो लंबे समय तक पत्थर की खदानों में काम करते हैं।
अशोक नगर जिले की सबसे बड़ी पंचायतों में शुमार कदवाया की पहचान यहां के पत्थर शिल्प से है। प्रतिमाओं से लेकर खिड़की-दरवाजे और दूसरी कलाकृतियां बलुआ पत्थरों से ऐसी जीवंत हो उठती हैं कि देखने वाले की आंखें फटी रह जाती हैं। कई तो कल्चुरी कालीन, परमार कालीन दौर की याद दिला देते हैं। लेकिन यही हुनर उनके लिए जानलेवा बन रहा है। बलुआ पत्थरों के महीन कण उन्हें जानलेवा बीमारी की ओर खींच ले जा रहे हैं। लेकिन परिवार की चिंता उन्हें इस जानलेवा काम से रोक नहीं पा रही है, वे पत्थरों के शिल्प के साथ खुद के हाथ से अपनी मौत गढ़ रहे हैं। बलुआ पत्थर कारीगरों को बहुत देर में बीमारी की जानकारी होती है। फेफड़ों के संक्रमण से श्वसन तंत्र से जुड़ी बीमारियां से जूझ रहे मरीज अमूमन तभी डॉक्टर्स के पास पहुंचते हैं, जब हालात बेहद खराब हो चुके होते हैं। बीमारी के गंभीर स्टेज पर पहुंचने के बाद जब कभी इलाज शुरू होता है, तो मरीजों को ज्यादा फायदा नहीं मिल पाता है।
कदवाया और उसके आस पास के गांवों के शायद ही कोई परिवार हों जिन्होंने अपनों को असमय नहीं खोया हो। आलय यह है कि कदवाया पंचायत को विधवाओं का गांव कहा जाने लगा है। मौत के गाल में समा चुके बलुआ पत्थर कारीगर दीपक अहिरवार की पत्नी ने बताया कि फेफड़ों की बीमारी में उनके देवर और पति दोनों की जान चली गई। इसके बाद भी उसी पत्थर खदान में उनके लिए काम करने की मजबूरी है। दीपक अहिरवार भर ही नहीं अशोकनगर जिले की कदवाया पंचायत क्षेत्र में बलुआ पत्थर तराशने का काम करने वाले सैकड़ों कारीगर फेफड़ों की गंभीर बीमारी से जान गंवा चुके हैं, जिससे बड़ी संख्या में महिलाएं विधवा हो गई हैं और कई परिवार मुखिया-विहीन हो गए हैं। सिलिका युक्त धूल से फैलने वाली सिलिकोसिस बीमारी इस त्रासदी की सबसे बड़ी वजह बताई जा रही है।
ऐसा ही हाल पन्ना जिले के भी हैं, वहां की मिताली आदिवासी आज भी हर सुबह काम की तलाश में निकलती हैं। कभी पत्थर की खदान में मजदूरी करके 180 रुपये रोज कमाने वाली मिताली अब दो बेटियों का पेट भरने के लिए गांव-गांव काम मांगती फिरती हैं। उनके पति ग्यासी आदिवासी बचपन से खदानों में काम करते रहे। लगातार खांसी, सांस फूलना और खून की उल्टियां शुरू हुईं तो सरकारी अस्पताल ने टीबी बताकर दवा शुरू कर दी। पांच साल तक टीबी का इलाज चलता रहा। बाद में एक स्वास्थ्य शिविर में पता चला कि उन्हें टीबी नहीं, सिलिकोसिस था। इलाज बदलने से पहले ही 39 वर्ष की उम्र में उनकी मौत हो गई। मिताली कहती हैं, अगर समय रहते बीमारी पहचान ली जाती, तो शायद मेरे बच्चों के सिर से पिता का साया नहीं उठता।
यही इस बीमारी की सबसे बड़ी त्रासदी है। सिलिकोसिस के शुरुआती लक्षण टीबी जैसे दिखाई देते हैं। कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था में अधिकांश मजदूरों को टीबी का मरीज मानकर वर्षों तक दवा दी जाती है, जबकि उनके फेफड़े सिलिका की महीन धूल से लगातार नष्ट होते रहते हैं। जब तक असली बीमारी सामने आती है, तब तक बहुत देर हो चुकी होती है।
अशोक नगर, शिवपुरी, पन्ना, विदिशा, राजगढ़ सहित इस पूरे बेल्ट के अधिकांश परिवारों के सामने सबसे बड़ा सवाल है, अगर खदान में नहीं जाएंगे तो खाएंगे क्या। मनरेगा (अब वीबी जीरामजी) कभी 60-70 दिन का रोजगार देता था। अब कई गांवों में 20-30 दिन का भी काम नहीं मिलता। मजदूरी का भुगतान महीनों अटका रहता है। ऐसे में गरीब मजदूर फिर उसी खदान में लौटता है, जहां हर सांस के साथ मौत उसके फेफड़ों में उतर रही होती है। सरकारी योजनाएं रोजगार नहीं दे पातीं और खदानें सुरक्षित काम का वातावरण नहीं देतीं। मजदूर के पास मरने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।
सामाजिक संगठनों का दावा है कि मध्यप्रदेश में सिलिकोसिस के मरीजों की संख्या लाखों में हो सकती है। कई गांवों में एक ही परिवार के दो-दो, तीन-तीन सदस्य इस बीमारी से मर चुके हैं। इसके बावजूद व्यापक स्क्रीनिंग, नियमित स्वास्थ्य शिविर, समय पर जांच और पुनर्वास जैसी व्यवस्थाएं अभी भी अपवाद हैं। कई मामलों में बीमारी की पुष्टि भी तब होती है, जब मरीज अंतिम अवस्था में पहुंच चुका होता है।
इन गांवों में पत्थर केवल इमारतें नहीं बनाते। वे बच्चों का बचपन छीनते हैं। वे औरतों का सुहाग छीनते हैं। वे बूढ़े माता-पिता का सहारा छीनते हैं। हर तराशी हुई शिला के पीछे किसी मजदूर की आधी बची सांसें दबी होती हैं। उन पत्थरों को काटने वाले मजदूरों की जिंदगी आज भी धूल से सस्ती है। जब तक सरकार सिलिकोसिस को केवल चिकित्सा समस्या नहीं, बल्कि रोजगार, श्रम सुरक्षा और सामाजिक न्याय के संकट के रूप में नहीं देखेगी, तब तक मध्यप्रदेश के इन गांवों में बच्चे शायद यही पूछते रहेंगे कि मेरे पास कब लौटेंगे?