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Black marketing of medicines: 100 से 6000% तक का मुनाफा, प्रोपेगेंडा मेडिसिन के सहारे चल रहा जिंदगी-मौत का धंधा

Black marketing of medicines : आरजीएचएस में 3,400 करोड़ रुपये भुगतान के बावजूद मरीज लुट रहा है। 9 रुपये में खरीदी दवा 500 रुपये तक की MRP पर मिल रही है। आइए विकास जैन की रिपोर्ट से समझते हैं दवा की कालाबाजारी के चलते मरीजों को कितनी परेशानी उठानी पड़ती है।
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Jul 28, 2026
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दवा की कालाबाजारी से मरीजों की हो रही परेशानी (Photo: ChatGpt)

Black marketing of medicines : अस्पताल में भर्ती मरीज वेंटिलेटर पर सांसें गिन रहा है। परिजन बाहर बिल जमा कर रहे हैं और अंदर दवा की एक शीशी, एक गोली, एक सिरिंज पर 100 से 6000 प्रतिशत तक मुनाफा कमाया जा रहा है।

राजस्थान का 20 हजार करोड़ और देश का 4 लाख करोड़ का निजी दवा बाजार अब सेवा नहीं, प्रोपेगेंडा मेडिसिन के नाम पर संगठित लूट का जरिया बन चुका है। 'राजस्थान पत्रिका' ने दवा बाजार की पड़ताल की। चौंकाने वाले नतीजे सामने आए। जो दवा 13 रुपये में बनती है, वही 500 रुपये में मरीज को थमाई जा रही है। फर्क सिर्फ लेबल और कमीशन का है।

RGHS का बोझ, मरीज की जेब पर वार

सरकारी आंकड़े बताते हैं कि राजस्थान गवर्नमेंट हेल्थ स्कीम पिछले 3 साल में 346 करोड़ से बढ़कर 3400 करोड़ सालाना भुगतान तक पहुंच गई है। पिछले 2 साल में अस्पतालों और फार्मेसियों को 7200 करोड़ से ज्यादा दिए जा चुके हैं। लाभार्थी 12.35 लाख से 13.61 लाख, पैकेज 2129 से 3367 और अस्पताल 1500 से 1729 हो गए। फिर भी तस्वीर बदरंग है।

निजी अस्पताल कैशलेस इलाज कर रहे बंद

निजी अस्पताल भुगतान में 6-9 महीने की देरी का हवाला देकर कैशलेस इलाज बंद कर रहे हैं। ओपीडी दवा का बहिष्कार महीनों से चल रहा है। अब 30 अप्रैल तक चरणबद्ध आंदोलन और 15 मई से संपूर्ण बहिष्कार की चेतावनी है। छोटे शहरों में विकल्प सीमित हैं। ऑनलाइन टीआईडी जनरेशन और अप्रूवल की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि इमरजेंसी वाले मरीज घंटों यहां से वहां भटकते रहते हैं।सरकार के लिए आरजीएचएस सफेद हाथी बन गई है। अस्पतालों की कार्यशील पूंजी अटकी है, पैकेज रेट लागत से कम हैं और बीच में मरीज जो चिन्हित होने के बावजूद काउंटर पर कैश दे रहा है।

प्रोपेगेंडा मेडिसिन: लूट का मॉडल

इसे ऐसे समझिए कि कोई व्यक्ति दवा के साल्ट को सीधे फैक्ट्री से खरीदता है। अपना ब्रांड नेम रजिस्टर कराता है। लेबल छपवाता है। एमआरपी अपनी मर्जी से छापता है। यही ब्रांडेड जेनरिक या "प्रोपेगेंडा मेडिसिन है। इथिकल दवा में कंपनी का खर्च सैंपल, एमआर, रिटर्न पॉलिसी पर होता है। प्रोपेगेंडा में वह सब नहीं। पूरा पैसा कमीशन में बंट जाता है - डॉक्टर को लिखने का, स्टॉकिस्ट को रखने का, रिटेलर को बेचने का। 70% तक कमीशन की चर्चा आम है। नतीजा? मरीज को वही साल्ट 10 गुना दाम पर मिलता है। और यह सिर्फ छोटी दुकानों पर नहीं हो रहा है बल्कि डॉक्टर के क्लिनिक से सटी फार्मेसी, या अस्पताल की अपनी दवा दुकान में हो रहा है। नतीजा मरीजों की पॉकेट कट रही है।बिलों ने खोली पोल: खरीद 36 पैसे, एमआरपी 236 रुपये

एक सिरिंज जो 3.36 रुपये में बनती है, मरीज को 18 रुपये में मिलती है। एक मेडिकैथ 9 रुपये की लागत में बनती है, मरीज को 235 में मिलती है। कैंसर, किडनी, हार्ट, न्यूरो की दवाओं में भी यही रेशियो। डिस्काउंट देकर भी 300-400% मार्जिन बच जाता है।

40% कमीशन का खेल

सूत्रों के मुताबिक निर्माता से सीएंडएफ, डिस्ट्रीब्यूटर, स्टॉकिस्ट, रिटेलर तक पहुंचते-पहुंचते करीब 40% कमीशन बंटता है। 13 रुपये की दवा रिटेल तक 50 रुपये पहुंचती है। फिर एमआरपी 500 छाप दी जाती है। 20% डिस्काउंट देकर भी 350% मुनाफा। इस पैसे से क्या होता है? लक्ष्य तय होता है। डॉक्टर को हर महीने 100 पत्ते लिखने पर एडवांस। लक्ष्य पूरा हो तो गोल्ड बिस्किट, विदेश टूर।

एक मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव ने नाम न छापने पर बताया, "स्विट्जरलैंड टूर 10 लाख का है। उतनी दवा लिखवानी ही पड़ेगी। अस्पताल में मरीज जिंदगी से लड़ता है, हम टारगेट से।"

बड़ी कंपनियां भी मैदान में

पहले यह काम छोटे प्लेयर करते थे। अब बड़ी ब्रांडेड कंपनियां भी नए नाम से प्रोपेगेंडा लाइन उतार रही हैं। कारण साफ है कि इथिकल दवा में मार्जिन 24-26%, प्रोपेगेंडा में 1000%। रिटर्न का झंझट नहीं, एक्सपायरी की गारंटी नहीं। भारत में 26 हजार दवा निर्माण इकाइयां हैं। हम दुनिया को जेनेरिक सप्लाई करते हैं, पर अपने देश में उसी जेनेरिक को ब्रांड के नाम पर महंगा बेच रहे हैं।

तीन पक्ष, तीन शिकायतें

मरीज : डॉक्टर ने नाम लिख दिया, बाहर वही दवा मिली। ऑनलाइन सर्च किया तो सॉल्ट 10 रुपये का था।

अस्पताल: आरजीएचएस भुगतान अटका है। पैकेज रेट में लागत भी नहीं निकलती। स्टाफ की सैलरी कैसे दें?

सरकार: "बजट बढ़ रहा है, पर दुरुपयोग और फर्जी क्लेम की आशंका भी।"

क्या कहते हैं एक्सपर्ट

सारा बाजार खराब नहीं है। अधिकांश उचित मुनाफे पर काम करते हैं। मुनाफाखोरी को रोकने के लिए इनकी अधिकतम कीमत तय होनी चाहिए।" - शैलेन्द्र भार्गव, दवा कारोबारी, राजस्थान।

"ड्रग विभाग लाइसेंसिंग अथॉरिटी है। एमआरपी तय करना रसायन मंत्रालय का काम है। मरीजों के लिए प्रधानमंत्री जनऔषधि केंद्र बेहतर विकल्प हैं। वहां 1200 दवाएं न्यूनतम दाम पर मिलती हैं।" - अजय फाटक, औषधि नियंत्रक, राजस्थान।

क्या है आखिर समाधान?

  1. एमआरपी कैप : प्रोपेगेंडा दवाओं की अधिकतम खुदरा कीमत तय हो। खरीद का 3 गुना से ज्यादा न हो।
  2. जेनेरिक को बढ़ावा: हर प्रिस्क्रिप्शन पर साल्ट लिखना अनिवार्य हो। जनऔषधि केंद्र हर ब्लॉक में।
  3. आरजीएचएस सुधार : भुगतान 30 दिन में, पैकेज रेट लागत के आधार पर रिवाइज। कैशलेस OPD दवा शुरू।
  4. पारदर्शिता : अस्पताल में दवा का खरीद बिल डिस्प्ले हो। मरीज मांगे तो देना पड़े।
  5. सख्त कार्रवाई : बगैर वैध सीईसीडीएससीओ के उपकरण और बिना मूल्य नियंत्रण की दवा पर ड्रग एक्ट के तहत केस।

मरीज नहीं, सिस्टम बीमार है

4 हजार अरब का दवा बाजार। उसमें 800 अरब यानी 25% सिर्फ प्रोपेगेंडा पर खर्च। यह पैसा दवा में नहीं, कमीशन में जाता है। और अंत में बिल मरीज भरता है। आरजीएचएस जैसी योजना 3400 करोड़ खर्च कर भी फेल हो रही है, क्योंकि सप्लाई चेन में ही घुन लगा है। जब तक प्रोपेगेंडा मेडिसिन पर लगाम नहीं लगेगी, तब तक "स्वास्थ्य" एक बिजनेस और मरीज एक ग्राहक ही बना रहेगा। अगली बार डॉक्टर पर्चे पर दवा लिखे, तो एक बार साल्ट जरूर पूछिए। और दवा दुकान पर MRP से पहले खरीद बिल मांगिए। क्योंकि आपकी एक जागरूकता, इस 6000% की लूट पर ब्रेक लगा सकती है।

Updated on:
28 Jul 2026 11:42 am
Published on:
28 Jul 2026 11:42 am