
Navratri : राजस्थान के भीलवाड़ा जिले में स्थित माता घटारानी के गर्भगृह के द्वार नवरात्रि में आठ दिन बंद रहते हैं। यह पढ़ते हुए आपको अजीब लगा होगा, लेकिन मेवाड़ क्षेत्र की प्रगाढ़ आस्था का प्रमुख केंद्र प्राचीन माता घटारानी मंदिर अपनी इस अनोखी परंपरा के कारण पूरे प्रदेश में अनूठा स्थान रखता है।
भीलवाड़ा जिला मुख्यालय से करीब 140 किलोमीटर दूर जहाजपुर की सुरम्य पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर में चैत्र और शारदीय, दोनों ही नवरात्रों में अमावस्या को घट स्थापना के साथ ही गर्भगृह के पट पूरे आठ दिनों के लिए बंद कर दिए जाते हैं। इस दौरान श्रद्धालु गर्भगृह के बाहर बंद द्वारों के सम्मुख ही शीश नवाकर पूजा-अर्चना करते हैं।
आठ दिनों के कड़े नियमों के बाद महाअष्टमी के दिन पूर्व राजपरिवार की ओर से माता घटारानी को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। मान्यताओं के अनुसार, राजपरिवार के भोग अर्पण के बाद जब माता रानी की आज्ञा प्राप्त होती है, तब भव्य महाआरती का आयोजन होता है। आरती संपन्न होते ही जैसे ही आठ दिनों बाद गर्भगृह के पट खोले जाते हैं, माता के अलौकिक दर्शन के लिए भक्तों का सैलाब उमड़ पड़ता है।
माता घटारानी के प्राकट्य की कथा सदियों से पीढ़ियों दर पीढ़ियों सुनाई जाती रही है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, प्राचीनकाल में माता रानी स्वयं एक बालिका का रूप धरकर पहाड़ी के शिखर से नीचे क्रीड़ा करने आया करती थीं। पहाड़ी के नीचे एक कलकल बहती नदी और घने छायादार वृक्ष थे, जहां आसपास के गांवों के ग्वाले गाय चराने आते थे। यह कहा जाता है कि बालिका रोज चुपके से आकर गायों का दूध पी जाती थी।
जब गाय मालिकों ने दूध न मिलने की शिकायत की, तो एक ग्वाले ने पेड़ के पीछे छिपकर पहरा दिया। दोपहर में जैसे ही बालिका गाय का दूध पीने लगी, ग्वाले ने उसे देख लिया और आवाज लगाई। ग्वाले की आवाज सुनते ही बालिका पहाड़ी की ओर भागी। ग्वाला भी पीछे दौड़ा और दौड़ते-दौड़ते बालिका की चोटी उसके हाथ में आ गई। मान्यता है कि उसी क्षण बालिका का पूरा शरीर भूमि में समा गया और केवल सिर का भाग धरती के ऊपर रह गया, जो कालांतर में पाषाण रूप में परिवर्तित हो गया।
मंदिर के पुजारी शक्ति सिंह तंवर के अनुसार, नवरात्र के पावन दिनों में गर्भगृह के द्वार बंद रखने के पीछे गहरी आध्यात्मिक मान्यता है। माना जाता है कि इन आठ दिनों में माता स्वयं एकांत में गहन आराधना में लीन रहती हैं। इसके साथ ही गर्भगृह की परम पवित्रता और स्वच्छता बनाए रखने के लिए भक्तों का प्रवेश पूरी तरह वर्जित रहता है।
मंदिर के ऐतिहासिक स्वरूप की बात करें तो संवत 1986 में चंपा बाई की ओर से प्रथम बार मंदिर का निर्माण करवाने के साक्ष्य मिलते हैं। इसके अलावा, माता घटारानी धाम में नवरात्र के दौरान बोए जाने वाले ज्वारे का विशेष मौसम वैज्ञानिक महत्व माना जाता है। स्थानीय ग्रामीणों और किसानों की आस्था है कि नवरात्र में ज्वारे की वृद्धि और उसके रंग-रूप से आने वाले मानसून और फसल की पैदावार के सटीक संकेत मिलते हैं।
मंदिर के मुख्य पुजारी शक्ति सिंह तंवर का कहना है कि मां घटारानी मंदिर में दोनों नवरात्र में हर अमावस्या पर घट स्थापना होने के साथ मंदिर के गर्भ ग्रह के पट बंद हो जाते हैं जो अष्टमी पर ही खुलते हैं भक्तगण बाहर से मां की पूजा-अर्चना करते हैं। राज्य में एक मात्र मां घटारानी का ऐसा स्थान है जहां नवरात्र में मां के दर्शन नहीं होते। नवरात्र के नौ दिन तक मां मंदिर में विशेष आराधना करती है। पौराणिक मान्यता भी है की माता यहां विराजमान होती है और विशेष आराधना करती है।
मंदिर के सहायक पुजारी दुर्गेश शर्मा ने पत्रिका से बताया कि यहां की मान्यता है कि माता घटारानी बालिका रूप में पहाड़ी से नीचे आती थीं। गाय का दूध पीने की घटना के बाद बालिका का शरीर धरती में समा गया और सिर का हिस्सा पत्थर के रूप में प्रकट हुआ। इसी मान्यता के कारण पहाड़ी पर माता का मंदिर और नदी किनारे माता के सिर के रूप की पूजा होती है।
ग्रामीण कैलाश सिंह राणावत का कहना है कि घाटारानी माता धाम केवल दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि क्षेत्र की पुरानी धार्मिक परंपराओं का केंद्र है। नवरात्र में ज्वारा को विशेष महत्व दिया जाता है। स्थानीय मान्यता है कि ज्वारा के स्वरूप से मानसून को लेकर संकेत मिलते हैं। यही परंपरा आज भी श्रद्धालुओं की आस्था से जुड़ी हुई है।