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Navratri : माता का ऐसा मंदिर जहां आज भी निकलती हैं प्राचीन प्रतिमाएं, कभी यहां था एक किला

Navratri : राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले के पल्लू कस्बे में मां ब्रह्माणी के मंदिर की घंटियां सुनाई देती हैं, श्रद्धालुओं की कतारें दिखाई देती हैं और नवरात्र में पूरा कस्बा आस्था के रंग में डूब जाता है। लेकिन इसी मंदिर के नीचे एक ऐसी कहानी दबी है, जिसका सिरा आज से नहीं, सदियों पीछे जाता है। आइए इस बारे में युगलेश शर्मा की पढ़िए खास रिपोर्ट।
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Oct 17, 2026
Maa Brahmani
मां ब्रह्माणी मंदिर (Photo: Patrika, Designed: ChatGpt)

Navratri : हनुमानगढ़ के पल्लू कस्बे के जिस ऊंची थेहड़ पर आज मां ब्रह्माणी, मां काली और भैरव का मंदिर है, स्थानीय इतिहास के अनुसार कभी वहां एक किला हुआ करता था। किले के अवशेषों के बीच से आज भी प्राचीन पत्थर और मूर्तियां मिलने की बातें सामने आती रही हैं। आइए इस बारे में विस्तार से जानते हैं।

घर की नींव खोदी तो निकल आई सदियों पुरानी प्रतिमा

पल्लू की पुरानी थेहड़ पर बसे घरों में निर्माण के दौरान पत्थर की प्राचीन प्रतिमाएं निकलने की घटनाएं स्थानीय लोगों के लिए नई नहीं हैं। कुछ प्रतिमाओं पर जैन तीर्थंकरों की आकृतियां दिखाई देती हैं। इससे यहां कभी जैन परंपरा से जुड़े लोगों की मौजूदगी की संभावना को बल मिलता है। कुछ वर्ष पहले कृषि पर्यवेक्षक भंवरसिंह नाई के घर खुदाई के दौरान भी एक सुंदर प्राचीन प्रतिमा मिली थी। इसकी सूचना प्रशासन को दी गई। अनुमति के बाद प्रतिमा को श्रीगंगानगर के जैन मंदिर में सुरक्षित रखा गया।

1917 में आया था इटली का पुरातत्वविद्

वर्ष 1917 में इटली के पुरातत्वविद् लुईजी पियो टैसिटोरी ने यहां पुरातात्विक अवशेषों की खोज और खुदाई करवाई थी। स्थानीय विवरणों के अनुसार खुदाई में दुर्लभ कलाकृतियां और सिक्के मिले थे। लेकिन यह खोज पूरी नहीं हो सकी। टैसिटोरी की मृत्यु के बाद खुदाई रुक गई और पल्लू की पुरानी सभ्यता से जुड़े कई सवाल जमीन के नीचे ही रह गए।

यहां मिली पुरातात्विक सामग्री का एक हिस्सा आज बीकानेर संग्रहालय और दिल्ली में सुरक्षित होने की बात कही जाती है। पल्लू के इतिहास से जुड़े कुछ अवशेष स्वामी केशवानंद भी अपने साथ संगरिया ले गए थे, जो आज ग्रामोत्थान संग्रहालय में बताए जाते हैं।

मंदिर से पहले यहां था किला!

पल्लू में मां ब्रह्माणी मंदिर की उत्पत्ति को लेकर स्थानीय मान्यता राजा कुलर के किले से जुड़ी है। कहा जाता है कि यहां राजा कुलर का किला था, जो किसी संघर्ष में नष्ट हो गया। किले के साथ जुड़े चार द्वारपालों की भी मान्यता है और इनमें से सादुला जी की पूजा आज भी पल्लू में मां ब्रह्माणी के मंदिर से पहले की जाती है। किले के नष्ट होने के बाद यह जगह वीरान थेहड़ में बदल गई। इसके बाद मां ब्रह्माणी की आस्था से जुड़ी कहानी सामने आती है।

क्या है यहां की कहानी?

स्थानीय मान्यता के अनुसार वर्ष 1308 में बीकानेर के गीगासर निवासी भोजराज अपना घोड़ा तलाशते हुए पल्लू के पुराने कोट कलूर क्षेत्र में पहुंचे। थककर एक खेजड़ी के नीचे विश्राम के दौरान उन्हें मां ब्रह्माणी के दर्शन हुए। मान्यता है कि माता ने उन्हें इस वीरान क्षेत्र की सेवा करने का संकेत दिया और पास ही पत्थर हटाने पर पानी वाला कुआं होने की बात कही। अगले दिन भोजराज ने यहां माता की प्रतिमा स्थापित कर पूजा शुरू की। धीरे-धीरे इस स्थान की आस्था दूर-दूर तक फैलती गई और बाद में यहां भव्य मंदिर का निर्माण हुआ। यह कहानी इतिहास के दस्तावेज से ज्यादा पल्लू की लोकस्मृति का हिस्सा है, लेकिन आज भी मंदिर की आस्था के केंद्र में मौजूद है।

एक ही परिसर में ब्रह्माणी, काली और भैरव

आज मंदिर परिसर में मां ब्रह्माणी के साथ मां काली और भैरव की प्रतिमाएं भी श्रद्धा का केंद्र हैं। स्थानीय मान्यता के अनुसार करीब दो सौ साल पहले मां काली और सरस्वती की प्रतिमाएं जमीन से निकली थीं। मंदिर के चांदी से बने दरवाजे इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

नवरात्र के दिनों में यही मंदिर हजारों श्रद्धालुओं से भर जाता है। सुबह-शाम आरती के समय लंबी कतारें लगती हैं। दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालु दिनभर उपवास रखकर माता की आराधना करते हैं। धर्मशालाओं में जगह कम पड़ जाती है और मेला क्षेत्र में अस्थायी बाजार सज जाता है।

जमीन के नीचे आखिर क्या है?

पल्लू की पुरानी थेहड़ पर प्राचीन पत्थरों और प्रतिमाओं के मिलने की घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि यहां अतीत में कैसी बस्ती थी। क्या यहां सिर्फ एक किला था? क्या किले से पहले भी कोई आबादी यहां रहती थी? क्या अलग-अलग कालखंडों में यहां अलग सभ्यताएं बसीं?

12वीं शताब्दी की दुर्लभ प्रतिमा

पल्लू गांव से 1917 में हुई खुदाई में मिली मां सरस्वती की प्रतिमा आज नई दिल्ली के राष्ट्रीय संग्रहालय में रखी है। इसे 12वीं शताब्दी की चौहानकालीन दुर्लभ शिल्पकृति बताया जाता है। इस प्रतिमा को भारत सरकार के डाक विभाग ने दो अलग-अलग अवसरों पर जारी डाक टिकटों पर स्थान दिया।

Updated on:
17 Oct 2026 10:39 am
Published on:
17 Oct 2026 10:39 am