
Shaheed Mandir : राजस्थान के सीकर शहर से डीडवाना रोड पर 20 किमी दूर एक छोटा सा गांव है बाडलवास। मुख्य सड़क से करीब 500 मीटर दूर गांव के बीचोंबीच खुले मैदान में स्थित एक मंदिर परिसर में रोजाना सैंकड़ों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। इस परिसर में यूं तो संतों व देवी-देवताओं के पांच अलग-अलग मंदिर है, लेकिन एक मंदिर जितना अनूठा है, लोगों की उस पर उतनी ही अगाध व अडिग आस्था है।
इस मंदिर में सेना के एक जवान की मूर्ति है, जो घोड़े के पास घुटने टेककर बंदूक से निशाना लगाने की मुद्रा में है। यहां यही जवान मुख्य देवता के रूप में पूजे जाते हैं। नाम है शहीद अमरचंद। अमरत्व के साथ उन्हें यहां देवत्व के उस सर्वोच्च रूप में पूजा जाता है कि ये धाम भी उनके ही नाम से शहीद अमरचंद झुंझार धाम कहलाता है। अमरचंद सिर्फ 19 वर्ष में शहीद हो गए थे। ये देश का पहला मंदिर है, जहां शहीद की देवता के रूप में पूजा शुरू हुई। पर एक शहीद की अराध्य के रूप में आराधना यूं ही शुरू नहीं हुई। इसके पीछे घटनाओं का एक कड़ी थी, जिसके साथ जुड़ते गए चमत्कारों ने इस धाम को आस्था के साथ आकर्षण एक बड़ा केंद्र बना दिया है। शहीद जवान को इस इलाके में लोक देवता की मान्यता मिल चुकी है। इस मंदिर से जुड़े चमत्कारों के बहुत से किस्से बताए जाते हैं। आइए कुछ चमत्कारों के किस्से आप भी पढ़िए।
पत्रिका टीम जब झुंझारजी के धाम पहुंची तो ओंकार ने बताया कि 15 साल का था तो एक दिन अचानक उनके मुंह से खून की उल्टियां शुरू हो गई। चिकित्सकों को दिखाया तो भी बीमारी समझ में नहीं आई। दिनोंदिन कमजोर होते गए शरीर को चिकित्सकों ने भी जवाब दे दिया। आखिर में परिजनों ने उन्हें झुंझारजी को ही सौंप दिया और चमत्कारिक ढंग से वे कुछ दिनों में ही बिल्कुल स्वस्थ हो गए। उन्होंने आगे बताया कि बहन एकता को भी तीन साल पहले फेंफड़ों का केंसर हो गया था। जयपुर के निजी अस्पताल में करीब 10 लाख रुपए खर्च करने पर भी उसका उपचार नहीं हुआ। बाद में झुंझारजी के धोक लगाकर मनौती मांगी तो वह स्वस्थ हो गई। चिकित्सकों ने भी उसे कैंसर मुक्त घोषित कर दिया। शादी के बाद अब वह एक बच्चे की मां है और दोनों यहां मंदिर आते हैं।
पत्रिका टीम धाम पहुंची तो वहां पहुंची तारा देवी ने बताया कि वे बचपन से झुंझारजी की भक्त है। 9 साल पहले भतीजे की शादी में बारात रोहिणा जा रही थी। बारात की एक गाड़ी बेटा चला रहा था। अचानक तेज रफ्तार गाड़ी डिवाइडर से टकराकर चकनाचूर हो गई। पर उसमें झुंझारजी की महर से उसमें सवार छह लोगों में से किसी को खरोंच तक नहीं आई। परिवार ऐसे ही छोटे-बड़े कई चमत्कार देख चुका है। धाम में पहुंचे अन्य लोगों ने भी कई असाध्य बीमारी व बिगड़े काम बनने का दावा किया।
मंदिर के पुजारी रामप्रसाद पारीक से धाम पर चर्चा के दौरान वहां पहुंची एक महिला फरियादी ने अपने घर चोरी होने की बात कहते हुए समाधान पूछा। इस पर पुजारी ने भी मंदिर में चोरी से संबंधित चमत्कारिक घटना बताई। वह बोले, पिछले दिनों धाम से भी करीब 350 चांदी के छत्र चोरी हो गए थे। जिस समय मंदिर में चोरी हो रही थी, उसी समय झुंझारजी ने उन्हें आवाज देकर बताया, पर भ्रम मानकर वे सोते रहे। अगले दिन मंदिर आए तो छत्र गायब मिले। इसके बाद उन्होंने पुलिस को खबर करने के साथ झुंझारजी से भी धाम की मान्यता पर कलंक नहीं लगने की मनौती मांगी। इस पर झुंझारजी ने उन्हें अंतरमन में चोर का सुराग दे दिया। बाद में वह चोर पुलिस द्वारा पकड़ा गया तो उसके द्वारा की गई दर्जनों चोरियों में से उससे केवल मंदिर के छत्र ही बरामद हुए, जो वापस धाम को मिल गए।
मंदिर पुजारी रामप्रसाद पारीक व परिजनों ने बताया कि झुंझार शहीद अमरचंद पारीक का जन्म बाडलवास गांव में ही 1956 में हुआ था। पिता का नाम कन्हैयालाल व माता जतना देवी थी। अमरचंद बचपन से ही निडरता व साहस के धनी थे। छोटी सी उम्र में सांपों को उनके बिल से पकड़ लाते थे। 18 वर्ष की आयु में 1964 में उनका चयन भारतीय सेना में आरएसी में हो गया। 1965 के भारत— पाकिस्तान युद्ध में श्रीगंगानगर सीमा पर युद्ध हुआ तो बिना सेवा कार्य के ही 15 सितम्बर की रात को साथियों के साथ दुश्मनों का डटकर मुकाबला किया और अंत में श्रीसालासर बालाजी का जयकारा लगाते हुए दुश्मन की तोप के गोले का शिकार होकर शहादत दे दी।
पुजारी पारीक ने बताया कि शहादत के बाद शहीद अमरचंद ने उनकी दादी को सपने में दर्शन देकर देवता होने की बात कही। पर उन्होंने विश्वास नहीं किया। बाद में उनके पूरे घर में लाल बिंदुओं व पादुकाओं के निशान दिखने लगे। दादी में उनके देवत्व का अहसास होने पर परिजनों ने घर में प्रतिष्ठित करना चाहा। पर उन्होंने दादी के जरिये खुद ही हनुमानजी के मंदिर के पास प्रतिष्ठित होने की इच्छा जाहिर की। इस पर उनका बालाजी के पास ही छोटा मंदिर बनाया गया। मान्यता बढ़ने के साथ मंदिर का स्वरूप बढ़ता गया और बाद में राम दरबार, हरिराम बाबा और गोरक्षनाथजी का मंदिर भी धाम में स्थापित किया गया। दादी के साथ पिता लालचंद पारीक धाम की सेवा में जुट गए।
पुजारी रामप्रसाद ने आगे बताया कि धाम में उनसे पहले पिता लालचंद पारीक महंत थे। वे खुद तो टाइल्स का काम करते थे। झुंझारजी ने उसी दौरान उनसे धाम में सेवा देने की प्रेरणा दी। पर रोजगार को ज्यादा महत्व देने से उन्होंने उनकी बात पर ध्यान नहीं दिया। इसके बाद वे 22 महीने बीमार होकर मरणासन्न हालत में पहुंच गए। आखिर में झुंझारजी से प्रार्थना करने पर ही वे ठीक हुए। उसके बाद से वे भी मंदिर में सेवा देने लगे। पिता के देहावसान के बाद मंदिर की महंताई उनके पास ही है।
धाम में झुंझारजी द्वारा पुजारी रामप्रसाद के माध्यम से अपनी बात कहलाने की मान्यता है। खुद पुजारी भी कहते हैं कि किसी फरियादी के आने पर झुंझारजी ही उनसे कुछ कहलवा देते हैं और जो भी मुंह से निकलता है वो उनकी ही कृपा से सच हो जाता है। उन्होंने बताया कि नि:संतान लोगों को संतान पैदा होने की जो तिथियां तक बताई गई, उसी दिन उनके संतान होने जैसी घटनाएं भी धाम में घट चुकी है। इसके अलावा असाध्य बीमारियों सहित अन्य परेशानियों के साथ भी जो फरियादी धाम आया उसे कभी निराशा हाथ नहीं लगी। बोले, पहले देश की सेवा करने वाले शहीद अमरचंद अब भी झुंझार देवता के रूप में जन सेवा में जुटे हैं। मंदिर में फरियादी से किसी भी तरह की कोई मांग नहीं होना भी धाम की प्रमुख विशेषता है।
मंदिर में रोजाना 12 बजे ज्योत हेाती है। काफी संख्या मेें दूरदराज तक के श्रद्धालु उसके दर्शन करने पहुंचते हैं। शहादत दिवस 15 सितंबर पर हर साल वार्षिक मेला भरता है, जिसमें धार्मिक अनुष्ठानों के साथ विशाल भंडारा होता है। खास बात ये भी है कि आयोजन में राष्ट्रगान के साथ देशभक्ति गीतों की गूंज भी सुनाई देती है।
शहीद अमरचंद झुंझारजी को उनके मूल गांव बाडलवास के अलावा अन्य धामों में भी पूजा जाता है। सीकर में बांडियाबास के अलावा जयपुर व अन्य स्थानों पर भी उनकी मंदिर में पूजा की जाती है। उनकी शहादत दिवस पर वार्षिक मेले का आयोजन भी होता है।