
Diwali : विजय दशमी का पर्व देशभर में आस्था व उल्लास से मनाया जाता है। हर वर्ष ये पर्व आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है, जिसमें जगह- जगह रावण का दहन कर भगवान श्रीराम का विजयोत्सव मनाए जाने की परंपरा है। पर इससे इतर शेखावाटी में आततायी रावण के अंत अलग-अलग दिनों में और अनूठे ढंग से करने की रवायतें हैं, जो विजय दशमी से लेकर दीपावली से पांच दिन पहले तक निभाई जाती है।
मूक व संवादपूर्व रामलीला, तो कहीं इस दौरान नृसिंह लीला व 24 अवतारों की झांकी सजती है। श्रीराम व रावण की सेना के रूप में बंटकर ग्रामीणों की आमने-सामने की लड़ाई वाली रामलीला भी यहां का प्रमुख आकर्षण है। पेश है अंचल की इन्हीं अनूठी परंपराओं को पेश करती सचिन माथुर की विशेष रिपोर्ट…
बाबा श्याम की खाटूनगरी में रावण दहन विजय दशमी के 15 दिन बाद यानी दीपावली के पांच दिन पहले आने वाली कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की दशमी को होता है। विशाल नृसिंह लीला समिति के आयोजन में भगवान राम की सेना शोभायात्रा के रूप में मुख्य बाजार से रावण से युद्ध के लिए प्रस्थान करती है। फिर पीएमश्री राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय के खेल मैदान पहुंचती है। यहां श्रीराम व रावण और उनकी सेना के बीच युद्ध के सजीव मंचन के बाद रावण के पुतले का दहन किया जाता है। इसके बाद विजयोत्सव के रूप में प्राचीन शिव मंदिर के सामने रात को नृसिंह लीला का आयोजन होता है, जिसमें रातभर भगवान विष्णु के 24 अवतारों की झांकियों के प्रदर्शन व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ रातभर मेला आयोजित रहता है।
बताया जाता है कि विजय दशमी के आयोजन को लेकर दो पक्षों में हुए मतभेद के चलते यहां रावण दहन और भगवान श्रीराम का विजयोत्सव अलग मनाने की परंपरा 26 साल से पहले शुरू हुई थी, जो ही अब तक कायम है।
खाटूश्यामजी में रावण दहन का पर्व इस बार 4 नवंबर को हुआ, जिसमें राम व रावण सेना के युद्ध के बाद जिले के सबसे ऊंचे 70 फीट के रावण का दहन किया गया। इसके बाद भगवान विष्णु के 24 अवतारों के अलावा पंचमुखी शिव, भगवान गणेश, ब्रह्मा, नल-नील, सुग्रीव, अंगद, हनुमान, सूर्य, काली मां, केसरिया वीर आदि देवी-देवताओं की झांकियों भी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही। रंगीन आतिशबाजी के साथ इस दौरान कालबेलिया सहित अन्य राजस्थानी लोकनृत्यों ने भी खूब समां बांधा।
नृसिंह लीला में दक्षिण भारतीय शैली के पारंपरिक नृत्यों और आकर्षक वेशभूषा में कलाकारों की प्रस्तुतियां विशेष आकर्षण का केंद्र रही। देर रात तक चले आयोजन में श्याम नगरी की धार्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं की कई झलक देखने को मिली।
झुंझुनूं के बिसाऊ में भी रावण दहन अश्विनी मास की दशमी तिथि की जगह चार दिन बाद चतुर्दशी को होता है। खास बात ये है कि यहां इससे पहले 15 दिन की अनूठी मूक रामलीला का मंचन होता है, जिसमें एक शब्द भी मुंह से निकाले बिना केवल चेहरे के भाव भंगिमाओं व इशारों से ही पूरी रामायण का प्रस्तुतिकरण करते हैं। इसके बाद चौदस को रावण दहन किया जाता है। करीब 180 साल से निभाई जा रही इस सांस्कृतिक परंपरा का मुम्बई की आई प्रोडक्शन टीम ने डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई थी, जिसे मुम्बई, अयोध्या व जयपुर सहित कई शहरों में दिखाया गया। उसे कई अवार्ड भी मिले। अपनी अनूठी विशेषता के कारण मूक रामलीला गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी दर्ज हो चुकी है।
बिसाऊ की मूक रामलीला में पारंपरिक रंगमंच की तरह मंच तैयार नहीं किया जाता। खुले मैदान में मिट्टी डालकर रामलीला के लिए अस्थाई स्थान तैयार किया जाता है। उसी जगह पर कलाकार मूक अभिनय से अपनी प्राचीन सांस्कृतिक विरासत को आगे बढ़ाते हैं। नवरात्र के दौरान मंडावा और महनसर आने वाले विदेशी पर्यटक भी इस दौरान इस अनूठी रामलीला को देखने बिसाऊ पहुंचते हैं। आयोजन समिति के संरक्षक महावीर सोती ने बताया कि रामलीला मंचन व रावण दहन में स्थानीय लोगों सहित प्रवासियों का भी विशेष सहयोग रहता है। पिछले कुछ वर्षों में उद्योगपति कमल पोद्दार, जगदीश कसेरा, रामप्रकाश बिरमीवाला सरीखे भामाशाह समिति से जुड़े हुए हैं।
सीकर के दांतारामगढ़ कस्बे के खाचरियावास गांव में रावण के अंत की परंपरा विजय दशमी की जगह त्रयोदशी को निभाई जाती है। करीब आठ दशक पुरानी इस परंपरा की खास बात ये है कि इसमें रावण के अंत से पहले यहां उसी दिन पहले रामलीला का मंचन होता है। इसके बाद शाम को आतिशबाजी के साथ रावण का दहन किया जाता है।
भगवान राम के विजयोत्सव के रूप में यहा रात को चेहरा नृत्य धार्मिक नाटक का आयोजन होता है। जिसमें विभिन्न धार्मिक झांकियां भी मेले का आकर्षण बढ़ाती है। मेले में खास बात ये भी है कि यहां हिंदुओं के साथ मुस्लिम भी बराबर की भागीदारी निभाते हैं। गांव में इस बार विजय दशमी का पर्व विजय दशमी से तीन दिन बाद 23 अक्टूबर को मनाया गया। इस दौरान गणगौरी चौक में दोपहर 12 बजे से रामलीला का मंचन शुरु हुआ। इसके बाद शाम 7 बजे बाय रोड स्थित दशहरा मैदान पर 40 फीट के रावण के पुतले का दहन का रात्रिकालीन विजयोत्सव आयोजित हुआ, जिसमें विभिन्न झांकियों व सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ कलाकारों के हैरतअंग्रेज कारनामों ने दर्शकों का देर रात तक मनोरंजन किया।
खाचरियावास में विजयदशमी का पर्व त्रयोदशी को मनाने के पीछे एक खास वजह रही है। दशहरा मेला समिति के अध्यक्ष द्वारका प्रसाद सोलंकी ने बताया कि राजशाही के दौर में विजयदशमी पर जयपुर के महाराजा शस्त्र पूजन करते थे। उसमें उनके स्टेट के अधीन राजाओं को भी आमंत्रित किया जाता था। ऐसे में कस्बे के राजा भी उस दिन जयपुर के शस्त्र पूजन कार्यक्रम में शामिल होते थे। जब वे कार्यक्रम से वापस लौटते तो उसके बाद त्रयोदशी पर ही रावण दहन होता। तब से ही गांव में विजय दशमी का पर्व त्रयोदशी को मनाने की परंपरा पड़ गई।
विजयदशमी के पर्व को लेकर शेखावाटी में सीकर का बाय और झुंझुनूं का उदयपुरवाटी कस्बा भी पर्व के विशेष तरीके से आयोजन को लेकर चर्चा में रहता है। बाय गांव में पूरा गांव एक महीने पहले ही रामलीला के कलाकारों के मुखौटे व वेशभूषा तैयार करता है और इसके बाद विजय दशमी को राम व रावण की सेना के रूप में दो खेमों में बंटकर युद्ध का सजीव मंचन करता है। दक्षिण भारतीय शैली के इस मंचन में रावण का दहन नहीं कर उसे तीर से ही मारा जाता है। वहीं, उदयपुरवाटी में रावण को बंदूक से मारने की लंबी परंपरा चलती आई है। हालांकि प्रशासन से अनुमति नहीं मिलने की वजह से कुछ सालों से वहां भी बंदूक की जगह बाण से ही रावण वध होने लगा है।