
Water Crisis : आमतौर पर पानी की किल्लत झेलने वाला रेगिस्तान फिर से पानी के संकट के मुहाने पर पहुंच गया है। इस बार सर्दियों की दस्तक के साथ ही पानी की कमी ने खतरे की घंटी बजा दी है। पश्चिमी राजस्थान में एक तरफ पंजाब से आने वाले नहरी पानी की आवक घट रही है, दूसरी तरफ जलाशयों में पहले से जमा पानी भी लगातार कम हो रहा है। यानी संकट दो तरफ से है। पानी आने का रास्ता कमजोर पड़ रहा है और जो पानी जमा है, वह भी तेजी से खत्म हो रहा है।
जोधपुर की स्थिति इस दोहरे संकट की सबसे बड़ी तस्वीर पेश करती है। शहर को राजीव गांधी लिफ्ट कैनाल से प्रतिदिन करीब 15 एमसीएफटी पानी की आपूर्ति हो रही है, लेकिन इसके बावजूद जलाशयों का स्टॉक 160 एमसीएफटी से नीचे पहुंच गया है। करीब 150 एमसीएफटी को डेड स्टोरेज की सीमा माना जाता है। यानी जलाशयों में उपलब्ध पानी का भंडार अब खतरे के स्तर के करीब है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि पिछले पांच दिनों में पंजाब से पानी की आवक में करीब 33 फीसदी की गिरावट आई है।
पिछले एक महीने में औसतन 300 क्यूसेक पानी मिल रहा था, जो अब घटकर करीब 200 क्यूसेक रह गया है। ऐसे में सवाल है कि जब पानी आने की रफ्तार ही धीमी पड़ रही है तो आने वाले दिनों में जलाशयों का घटता स्टॉक कैसे संभलेगा?
पश्चिमी राजस्थान की पेयजल व्यवस्था का बड़ा आधार पंजाब से आने वाला नहरी पानी है। पिछले 30 दिनों में राजस्थान को औसतन 300 क्यूसेक पानी मिल रहा था, जो अब घटकर करीब 200 क्यूसेक रह गया है। यानी आवक में लगभग एक तिहाई कमी। नहरी पानी की उपलब्धता में बदलाव का असर सिंचाई के साथ पेयजल व्यवस्था पर भी पड़ता है। मई 2026 में राजस्थान फीडर की रिलाइनिंग और मरम्मत में देरी से करीब 45 दिन तक आपूर्ति प्रभावित हुई थी। उस दौरान पश्चिमी राजस्थान के करीब 12 जिलों में पेयजल और सिंचाई व्यवस्था पर दबाव बढ़ा था। यह नहरी तंत्र पर क्षेत्र की निर्भरता को दर्शाता है।
जोधपुर के जलाशयों में पानी का भंडार पहले करीब 140 एमसीएफटी था, जो सुधरकर 180 एमसीएफटी तक पहुंचा। अब यह फिर घटकर 160 एमसीएफटी से नीचे आ गया है। करीब 150 एमसीएफटी से कम पानी को डेड स्टोरेज की सीमा माना जाता है। इसका मतलब पानी पूरी तरह खत्म होना नहीं, बल्कि सामान्य उपयोग के लिए पानी निकालने और जलाशय संचालन में मुश्किलें बढ़ना है। ऐसे में कुल जमा पानी के साथ वास्तविक उपयोग योग्य स्टॉक का आकलन जरूरी है। नहरी आवक कम रहने और रोजाना खपत जारी रहने से जलाशयों पर दबाव और बढ़ सकता है।
राजीव गांधी लिफ्ट कैनाल से जोधपुर को प्रतिदिन करीब 15 एमसीएफटी पानी दिया जा रहा है। शहर की पेयजल व्यवस्था का बड़ा हिस्सा इसी पर निर्भर है। नहर से पर्याप्त पानी मिलने पर जलाशयों का स्टॉक संभलता है और आवक प्रभावित होने पर जमा पानी से आपूर्ति का संतुलन बनाया जाता है। 1997 के बाद शहर की जलापूर्ति धीरे-धीरे स्थानीय सतही और भूजल स्रोतों से हटकर लिफ्ट कैनाल पर अधिक निर्भर हो गई। ऐसे में दूर से आने वाले पानी की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव सीधे शहर की जल सुरक्षा को प्रभावित करता है।
रेगिस्तान में पानी का नुकसान केवल खपत से नहीं होता। तेज धूप और गर्म हवाओं के कारण खुले जलाशयों का पानी वाष्प बनकर उड़ता रहता है। आईसीएआर-काजरी, जोधपुर के वैज्ञानिक आरके गोयल और महेश के. गौर के शोध में कायलाना और तख्तसागर के वाष्पीकरण का आकलन किया गया है। शोध के मुताबिक, दोनों जलाशयों के पूर्ण जलस्तर पर संयुक्त औसत वाष्पीकरण करीब 9,733.6 घन मीटर प्रतिदिन है। यानी लगभग 97.33 लाख लीटर पानी रोज वाष्प बन सकता है। अध्ययन में सर्दियों में वाष्पीकरण दर 2.73 मिलीमीटर प्रतिदिन और गर्मियों में 13.76 मिलीमीटर प्रतिदिन तक बताई गई है। यह पूर्ण जलस्तर पर आधारित अनुमान है, मौजूदा जलस्तर पर वास्तविक दैनिक नुकसान नहीं। फिर भी यह आंकड़ा जलाशयों के संरक्षण की जरूरत बताता है।
बारिश की कमी के कारण पश्चिमी और उत्तरी राजस्थान के बड़े हिस्से में जलस्रोतों पर दबाव बढ़ गया है। इस कारण राज्य सरकार ने हाल ही में 14 जिलों की 80 तहसीलों को सूखा प्रभावित घोषित किया है। इनमें 69 तहसीलें गंभीर और 11 मध्यम श्रेणी में हैं। जोधपुर, फलोदी, बाड़मेर, बालोतरा, जैसलमेर, बीकानेर, नागौर और पाली सहित कई जिले इसमें शामिल हैं। जोधपुर की 12 तहसीलें भी प्रभावित हैं। इसका असर पेयजल के साथ खेती और पशुधन पर भी पड़ रहा है।