Reverse brain drain: डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार राष्ट्रपति बनने के बाद भारतीयों का अमेरिका से मोहभंग होने लगा है। वहां से भारत वापस लौटने वाले टेक प्रोफेशनल्स की संख्या में 40% बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
Reverse brain drain India: डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के दोबारा राष्ट्रपति बनने के बाद से यह देखा जा रहा है कि भारत से अमेरिका गए लोग अब वापस लौट रहे हैं या लौटने की इच्छा पाल रहे हैं। वहां बहुत बड़ी संख्या में भारतीय रहते हैं, जो पहले अमेरिका को अवसरों की भूमि मानकर वहां बसने के इरादे से गए थे, लेकिन अब वह भारत वापसी या अन्य देशों की ओर रुख करने के बारे में विचार करने लगे हैं। प्यू रिसर्च के अनुसार, अमेरिका में रह रहे 10 में से 4 भारतीय ऐसा सोचने लगे हैं।
why Indians leaving America : अमेरिका खाली करने की चाह रखने वालों ने सर्वे में बताया कि वह ट्रंप की नीतियों, महंगाई और वीजा के बढ़ते जोखिम के चलते ऐसा विचार कर रहे हैं। अमेरिका छोड़ने का विचार करने वालों में 58% लोगों ने वहां के राजनीतिक माहौल को मुख्य कारण बताया है। लगभग 71% लोग ट्रंप के दूसरे कार्यकाल से असहमत हैं।
H1B visa issues India return: डोनाल्ड ट्रंप ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमेरिका की वीजा नीतियों और ग्रीन कार्ड प्रक्रिया को जटिल बना दिया, जिसके चलते भारतीय परेशान हो रहे हैं। ग्रीन कार्ड पाने के प्रक्रिया भारतीयों की लिए सबसे मुश्किल होती जा रही है। अब भारतीयों को ग्रीन कार्ड हासिल करने में 10 से 20 वर्ष तक का समय लग सकता है। इसके अलावे वहां काम करने वाले भारतीयों को नौकरी बदलने, प्रमोशन लेने या खुद का कोई धंधा शुरू करने में बहुत सारी बाधाओं का सामना करना पड़ता है। भारतीयों के अमेरिका छोड़ने का सबसे बड़ा कारण वहां की जटिल और अनिश्चित इमिग्रेशन प्रणाली है। अधिकांश भारतीय पेशेवर H-1B वीज़ा पर अमेरिका जाते हैं, जो एक अस्थायी कार्य वीज़ा है। हर साल लगभग 2-3 लाख भारतीय छात्र अमेरिका जाते हैं, लेकिन H-1B की सीमा केवल 85,000 है।
अमेरिका के बड़े शहरों खास तौर पर न्यूयॉर्क, सैन फ्रांसिस्को और सिएटल में जीवन-यापन की लागत लगातार बढ़ रही है। प्यू रिसर्च में शामिल हुए लगभग 54% लोगों ने कहा कि रहने की लागत बहुत बढ़ गई है, जबकि 38% ने महंगाई और रोजगार को बड़ी समस्या बताया है। इन शहरों में किराया 20-30% तक बढ़ चुका है। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में आवास, स्वास्थ्य सेवाएं और किराना खर्च विशेष रूप से बढ़े हैं। ऊर्जा और ईंधन की कीमतों में भी उछाल आया। कुल मिलाकर, मध्यम वर्ग के लिए जीवनयापन पहले की तुलना में काफी महंगा हो गया है। ईरान के साथ जंग छिड़ने के बाद अमेरिका में महंगाई बहुत तेजी से बढ़ रही है। अमेरिका में रह रहे भारतीयों का मानना है कि अमेरिका की तुलना में भारत में खासकर मेट्रो या टीयर टू सिटी में कम खर्च में बेहतर जीवनशैली का लुत्फ लिया जा सकता है।
भारत में पिछले एक दशक में कोरोनाकाल छोड़ दिया जाए तो भारत की अर्थव्यवस्था मोटे तौर पर सकारात्मक बनी हुई। यहां स्टार्टअप के इकोसिस्टम में काफी वृद्धि दर्ज की गई है। स्टार्टअप के लिहाज से भारत एक आकर्षक जगह बन चुका है। देश में आईटी, फिनटेक, ई-कॉमर्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में तेजी से अवसर बढ़े हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारतीय कंपनियां अब वैश्विक स्तर की कंपनियों के मुकाबले अच्छे वेतन पैकेज दे रही हैं। यही वजह है कि अमेरिका में रह रहे भारतीयों को यह लगने लगा है कि अपने देश में भी वैसी या उससे बेहतर अवसर मिल सकते हैं।
लिंक्डइन (LinkedIn) और ब्लूमबर्ग (Bloomberg) के डेटा के अनुसार, वर्ष 2025 में अमेरिका से भारत लौटने वाले टेक प्रोफेशनल्स की संख्या में 40% की वृद्धि देखी गई। अमेरिका से भारत लौटने वालों में IT और टेक सेक्टर सबसे बड़ा योगदान है। H-1B वीज़ा में 65% नौकरियां कंप्यूटर या IT से जुड़ी हैं। भारतीयों को मिलने वाले H-1B वीज़ा का 70% हिस्सा उन्हीं को जाता है। इसका मतलब यह है कि जो लोग सबसे ज्यादा अमेरिका जाते हैं (IT), वही सबसे ज्यादा लौट भी रहे हैं।
हाल के वर्षों में अमेरिका में एशियाई समुदाय के खिलाफ नस्लीय घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। एफबीआई के आंकड़ों के अनुसार, 'वर्ष 2024 में अमेरिका में 11,679 घृणा आधारित (hate crime) घटनाएं दर्ज की गईं। इनमें से 50% से अधिक हमले नस्ल/जातीय आधार पर थे।' जाहिर है कि नस्लीय पहचान जिसमें भारतीय भी शामिल हैं, के खिलाफ अपराध बहुत ज्यादा बढ़े हैं। द गार्जियन के अनुसार, 2024 के एक सर्वे में 53% एशियाई-अमेरिकी ने किसी न किसी रूप में नफरत या हिंसा झेली। 2024 में एंटी-एशियन हिंसा की 973 धमकियां दर्ज हुईं। इनमें से 75% दक्षिण एशियाई (भारतीय, पाकिस्तानी आदि) को निशाना बनाया गया। पिछले 10 वर्षों में सिखों के खिलाफ हेट क्राइम 10 साल में 3700% बढ़े। 2024 में सिख तीसरे सबसे ज्यादा निशाना बने धार्मिक समूह रहे। सिख अक्सर 'भारतीय पहचान' के कारण टारगेट होते रहे हैं।
अमेरिका में काम का दबाव खासकर टेक और कॉर्पोरेट सेक्टर में काफी होता है। OECD के अनुसार, अमेरिका में औसतन कर्मचारी साल में 1,800 घंटे काम करते हैं। यह कई विकसित देशों जर्मनी, फ्रांस से अधिक है। अमेरिका में टेक और फाइनेंस सेक्टर में सप्ताह में 45-60 घंटे काम आम बात है। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन (APA) की रिपोर्ट के अनुसार, 77% कर्मचारी काम से जुड़े तनाव का अनुभव करते हैं। वहीं 57% ने यह माना कि यह तनाव उनके निजी जीवन को प्रभावित करता है। Gallup सर्वे के अनुसार, लगभग 44% कर्मचारी काम के अधिक बोझ के चलते अक्सर थका हुआ महसूस करते हैं, जबकि 23 फीसदी पूरी तरह बर्नआउट महसूस करते हैं।
विदेश में रहने वाले भारतीयों को अक्सर सांस्कृतिक अवसरों या भारत में रह रहे परिवारों के यहां शादी, गृहप्रवेश या किसी के घर किसी के मौत होने पर उसमें शामिल नहीं हो पाने का दुख सालता रहता है। परिवार से दूर रहना मानसिक रूप से बहुत चुनौतीपूर्ण होता है। वहां बसे भारतीयों के लिए अपने बच्चों को अपनी संस्कृति और मूल्यों से जोड़कर रखना बेहद चुनौतीपूर्ण होता है। कोरोनाकाल महामारी के दौरान परिवार से दूर रह रहे लोगों को परिवार को लेकर असुरक्षा और परिवार के पास रहने की महत्ता समझ में आई।