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Ashoka से RBI तक ‘UNESCO World Heritage’ करोड़ों भारतीयों की जेब में, 2300 साल की अनकही विरासत

Sanchi Stupa Untold Story: देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश ने सालों के इतिहास की गौरव गाथा और भारत की कई प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को सैकड़ों सालों से संभाल कर रखा है, जो आज भी सांस ले रही हैं। उन्हीं में से एक है सांची स्तूप…आपने कभी नहीं सुनी होगी स्तूपों की ये रोचक कहानी...

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Jan 05, 2026
Sanchi Stupa UNESCO World Heritage site India (फोटो सोर्स: पत्रिका)

Sanchi Stupa Untold Stories: आपने कभी सोचा है कि आपकी जेब में रखा 200 रुपये का नोट महज एक कागज का टुकड़ा नहीं है, बल्कि सदियों के इतिहास की किताब है? इसपर छपी तस्वीर 'सांची स्तूप' की है। देश का दिल कहे जाने वाले मध्यप्रदेश ने सालों के इतिहास की गौरव गाथा और भारत की कई प्राचीन सांस्कृतिक धरोहरों को सैकड़ों सालों से संभाल के रखा है, जो आज भी सांस ले रही हैं। उन्हीं में से एक है सांची स्तूप…।

सांची स्तूप मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से 46 किमी पूर्वोत्तर में मौजूद है। सांची अपने अंदर बौद्ध धर्म के इतिहास को समेटे हुए हैं। इसका निर्माण तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में मौर्य सम्राट अशोक ने करवाया था। सदियों के अपने सफर में सांची ने कई उतार-चढ़ाव देखे। कभी बनी…कभी इसके टुकड़े हुए तो कभी सिर्फ भारत तक अपना वजूद रखने वाली सांची को पूरी दुनिया ने सराहा। ऐसा तब हुआ जब सन् 1989 में सांची को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया। इस एक पहल ने दुनिया भर के पर्यटकों का ध्यान खींचा। आज यह यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल है और हर भारतीय की जेब में घूमता है। patrika.com पर जानें 2300 साल की अनकही विरासत का सफर…. सम्राट अशोक से RBI तक करोड़ों भारतीयों की जेब में पहुंचने तक की कहानी।

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अशोक ने ईंटों से बनवाया पहला छोटा स्तूप

Sanchi Stupa UNESCO World Heritage site India(फोटो सोर्स: पत्रिका)

मध्यप्रदेश की शांत पहाड़ी पर सदियों से खड़े सांची स्तूप की कहानी शुरू होती है तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व में, जब सम्राट अशोक ने कलिंग युद्ध की भयावहता को देखकर हिंसा त्याग दी और बुद्ध धर्म अपना लिया। सम्राट अशोक ने भगवान बुद्ध के उपदेशों-शिक्षाओं को जीवंत रखने के लिए पूरे साम्राज्य में स्तूपों का निर्माण करवाया। इन स्तूपों में सांची खास था क्योंकि यह विदिशा के नजदीक था। बता दें कि विदिशा अशोक की पत्नी देवी का जन्मस्थान था। यहां अशोक ने ईंटों से पहला छोटा स्तूप बनवाया। एक साधारण ईंट का गुम्बद, जिसमें बुद्ध के अवशेष रखे गए। इसकी देखरेख खुद अशोक ने की और उन्होंने यहां एक स्तंभ भी स्थापित किया, जिसमें ब्राह्मी लिपि में संघ की एकता का संदेश लिखा गया था।

धीरे-धीरे भव्य हुआ सांची स्तूप…

Sanchi Stupa UNESCO World Heritage site India (फोटो सोर्स: पत्रिका)

सम्राट अशोक के बाद शुंग वंश ने सांची स्तूप को लिए भव्य रुप प्रदान किया। ईंटों को मजबूत पत्थर से ढका गया और गुम्बद के चारो ओर रेलिंग बनाई गई। इसके बाद सातवाहन राजा सतकर्णी के समय इसका और विकास हुआ। इस दौरान चार भव्य तोरण द्वार बनाए गए। ये तोरण आज भी दुनिया को हैरान करते हैं। पत्थर पर बारीक नक्काशी की गई है। इनमें भगवान बुद्ध की जीवन गाथाएं और जातक कथाएं उकेरी गई हैं। खास बात ये है कि इसे बनाने में हाथी दांत के कारीगरों का विशेष योगदान है।

आक्रमणों और नए धर्मों के उदय का प्रभाव

आक्रमणों और नए धर्मों के उदय का प्रभाव (फोटो सोर्स: पत्रिका)

चौथी-पांचवीं शताब्दी में सांची अपने चरम पर था। चार मंदिर जोड़े गए, नक्काशियां और भी सुंदर हुईं। लेकिन एक समय ऐसा भी आया जब सांची को अपने अस्तित्व के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। दरअसल, 12वीं शताब्दी तक बौद्ध धर्म भारत में कमजोर पड़ गया। आक्रमणों और नए धर्मों के उदय ने सांची को जंगल की आगोश में छोड़ दिया।

ब्रिटिश काल में फिर सांची का पुनरुद्धार

(फोटो सोर्स: पत्रिका)

ब्रिटिश काल में मध्यप्रदेशसांची का फिर से खोजा गया। 1818 में ब्रिटिश जनरल हेनरी टेलर ने जंगल काटकर सांची को खोजा था। वहीं 1851 में अलेक्जेंडर कनिंघम ने व्यवस्थित अध्ययन शुरू किया। शुरुआती खुदाई में कुछ क्षति हुई, लेकिन 1912-1919 में सर जॉन मार्शल ने बड़े पैमाने पर बहाली करवाई। भोपाल की शाहजहां बेगम और सुल्तान जहां बेगम ने आर्थिक मदद की। टूटे तोरणों को फिर से खड़ा किया गया और सांची दुनिया के सामने आया।

यूनेस्को विश्व धरोहर… विश्व ने देखा सांची स्तूप

(फोटो सोर्स: पत्रिका)

सन् 1989 में सांची को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल किया गया। इस एक पहल ने दुनिया भर के पर्यटकों का ध्यान खींचा। सांची को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल में शामिल करने के पीछे बड़ी खास वजह थी। सांची बौद्ध कला और वास्तुकला का अपने भीतर समेटे हुए है। पत्थरों पर जातक कथाएं भरी पड़ी हैं। वहीं यूनेस्को के अनुसार सांची मानव इतिहास की 6 में से 4 श्रेणियों में फिट बैठता है। ये कला का उत्कृष्ट नमूना, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, ऐतिहासिक गवाही और वास्तुकला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

करोड़ों भारतीयों ने देखी अपने देश की विरासत

Sanchi Stupa on 200 rupee note (फोटो सोर्स: पत्रिका)

अगस्त 2017 में जब रिजर्व बैंक ने नया 200 रुपए का नोट जारी किया, जिस पर सांची स्तूप की तस्वीर छपी। इस एक फैसले ने सांची को घर-घर पहुंचा दिया। पहले जहां सिर्फ इतिहास प्रेमी ही सांची जाते थे, अब आम लोग भी नोट देखकर इसके बारे में जानने लगे। पर्यटन बढ़ा, स्कूलों में चर्चा हुई और सांची फिर से जीवंत हो उठा।

सांची स्तूप महज पत्थरों का ढेर नहीं, बल्कि एक जीवंत इतिहास है जो आज भी सांस ले रहा है। अगली बार जब आपके हाथ में 200 का नोट हो तो उसे पलटकर देखिएगा और महसूस कीजिएगा अपनी विश्व धरोहर को…।

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Updated on:
05 Jan 2026 03:14 pm
Published on:
05 Jan 2026 03:00 pm
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