
रेलवे यात्रियों के लिए स्टेशन पर साफ पानी और बुनियादी सुविधाओं की कमी एक पुरानी समस्या रही है, लेकिन हाल ही में नियंत्रक और महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट ने इस पर बड़ी चेतावनी दी है। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 512 गैर-उपनगरीय रेलवे स्टेशनों में से 89 प्रतिशत पर न्यूनतम आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। इसके अलावा कई जगहों पर पीने के पानी में खतरनाक बैक्टीरिया पाया गया है। इस लेख में हम समझेंगे कि रेलवे यात्रियों को कौन-सी सुविधाएं देता है? CAG रिपोर्ट में क्या खुलासे हुए हैं और रेलवे ने अब ‘टैप टू टैंक’ जैसे नए उपायों के जरिए क्या कदम उठाए हैं?
CAG की रिपोर्ट 12 अगस्त 2026 को संसद में पेश हुई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक, 512 गैर-उपनगरीय स्टेशनों में से 89 प्रतिशत पर बुनियादी सुविधाओं की कमी पाई गई है। इसमें पीने का पानी, शौचालय, बैठने की व्यवस्था, पंखे, वाटर कूलर, प्लेटफॉर्म शेल्टर और डस्टबिन शामिल हैं। सबसे चिंताजनक बात है कि 8 प्रमुख स्टेशनों- कोयम्बटूर, पलक्कड़ जंक्शन, हैदराबाद, छत्रपति शिवाजी महाराज टर्मिनस (CSMT), भिवंडी रोड, कल्याण, लोनावला और मधुपुर के वाटर कूलरों में 'E. coli' बैक्टीरिया पाया गया, जो स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा है। इसके अलावा, 105 स्टेशनों पर पानी में 'कोलिफॉर्म बैक्टीरिया' पाया गया और 59 स्टेशनों ने जरूरी बैक्टीरियोलॉजिकल टेस्टिंग तक नहीं की। CAG ने 102 प्रमुख स्टेशनों की जांच में पाया कि 86 में वाटर रीसाइक्लिंग प्लांट्स नहीं थे। इसके साथ ही 720 स्टेशनों के अध्ययन में केवल 25 प्रतिशत में पानी संरक्षण उपाय थे और सिर्फ 9 प्रतिशत में ही पानी पुनःचक्रण की सुविधा थी।
भारतीय रेलवे यात्रियों को कई प्रकार की सुविधाएं उपलब्ध कराता है। एकसमान पेयजल गुणवत्ता निगरानी प्रोटोकॉल के तहत पानी की गुणवत्ता की नियमित जांच करना जरूरी है। इसके अलावा 'Rail Neer' पैकेज्ड पानी की बिक्री की सुविधा है और 685 स्टेशनों पर 1962 वाटर वेंडिंग मशीनें लगाई गई हैं। स्वच्छ रेल अभियान, स्वच्छता सर्वे, स्वच्छ ट्रेन स्टेशन, स्वच्छ ट्रेन जैसी पहल की गई है।
दिव्यांग यात्रियों के लिए विशेष शौचालय, पेड एंड यूज टॉयलेट, डीलक्स टॉयलेट, डस्टबिन, बायो-टॉयलेट्स, ऑटोमैटिक कोच वॉशिंग प्लांट्स, ऑन-बोर्ड हाउसकीपिंग सर्विस आदि की सुविधा मिलती है। हालांकि, CAG रिपोर्ट बताती है कि इन नीतियों और सुविधाओं के बावजूद, जमीन पर इनका क्रियान्वयन कमजोर रहा है। कई स्टेशनों पर न तो पर्याप्त वाटर टैप हैं, न वाटर कूलर और न ही नियमित पानी की जांच हो रही है।
अभी तक 'टैप टू टैंक' नाम से कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन इस संदर्भ में रेलवे को पानी की गुणवत्ता सुनिश्चित करने के लिए नए उपायों की आवश्यकता स्पष्ट है। इसका मतलब होता है कि स्टेशन पर टैप से सीधे पानी की आपूर्ति के बजाय, पहले उसे एक टैंक में जमा कर, फिल्टर या UV ट्रीटमेंट के बाद यात्रियों को दिया जाए। इससे पानी की गुणवत्ता बेहतर नियंत्रण में रहेगी और बैक्टीरिया का खतरा कम होगा।
CAG रिपोर्ट में रेलवे बोर्ड को सुझाव दिया गया है कि वह पानी प्रबंधन के लिए ठोस योजना बनाए, जिसमें पर्याप्त पानी, पानी की ट्रीटमेंट प्लांट और पानी पुनःचक्रण (Recycling) शामिल हो। 2017 की रेलवे वाटर पॉलिसी में भी गैर-पीने योग्य उपयोग के लिए रीसायकल्ड पानी का उपयोग करने की बात कही गई थी, लेकिन अभी तक जोनल रेलवे ने वाटर रीसाइक्लिंग प्लांट्स स्थापित नहीं किए हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि रेलवे को CAG की रिपोर्ट में बताई गई खामियों को गंभीरता से लेना चाहिए। रेलवे को 'टैप टू टैंक' जैसे मॉडल को स्टेशनों पर लागू करके उसकी सफलता के आधार पर विस्तार करना चाहिए। इसके साथ ही, नियमित पानी की जांच, रीसाइक्लिंग प्लांट्स की स्थापना और स्वच्छता अनुबंधों में पानी की गुणवत्ता पर ध्यान देना जरूरी है। यात्रियों को भी जागरूक रहना चाहिए कि पानी पीने से पहले जांच करें, यदि शक हो तो पैकेज्ड पानी लें और स्टेशन पर स्वच्छता की मांग करें।
CAG रिपोर्ट में बताई गई खामियों को ठीक करके यात्रियों को साफ और सुरक्षित पानी मिल सकेगा। पीने के पानी में E. coli जैसी खतरनाक बैक्टीरिया की मौजूदगी नहीं होगी और स्वास्थ्य संबंधी जोखिम घटेंगे। साथ ही, स्टेशन पर पानी की उपलब्धता और भरोसेमंदता बढ़ेगी। यह विशेष रूप से उन यात्रियों के लिए महत्वपूर्ण है जो लंबी दूरी की यात्रा कर रहे हैं या जिनके पास पैकेज्ड पानी खरीदने की सुविधा नहीं है।