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भारत में Starlink आने से इंटरनेट कितना बदल जाएगा? गांवों तक पहुंचेगा सैटेलाइट इंटरनेट या कीमत बनेगी सबसे बड़ी बाधा

Starlink Satellite Internet in India : जानें भारत में Starlink आने से इंटरनेट कितना बदलेगा। सैटेलाइट इंटरनेट की तकनीक, ग्रामीण कनेक्टिविटी, संभावित कीमत और Jio AirFiber से मुकाबले का पूरा गणित समझें।
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Starlink Satellite Internet in India

Starlink Satellite Internet in India : भारत में Starlink आने से कितना बदल जाएगा इंटरनेट, PC- Chatgpt

भारत में इंटरनेट की अगली बड़ी लड़ाई जमीन पर नहीं, आसमान में लड़ी जा सकती है। Starlink भारत में सैटेलाइट इंटरनेट शुरू करने की तैयारी में है। हालांकि 20 अगस्त 2026 तक इसकी व्यावसायिक सेवा शुरू नहीं हुई है और कंपनी ने अपने सैटेलाइट नेटवर्क की तैनाती के लिए नई नियामकीय मंजूरी के लिए आवेदन किया है।

भारत सरकार ने Starlink को GMPCS लाइसेंस जरूर दिया है। इसी श्रेणी में Jio Satellite Communications और OneWeb India भी लाइसेंस प्राप्त कर चुके हैं।

ऐसे में सवाल है- Starlink आने से आम भारतीय का इंटरनेट कितना बदलेगा? क्या गांवों में भी तेज इंटरनेट पहुंचेगा और क्या मोबाइल टावरों की जरूरत कम हो जाएगी?

Starlink आखिर अलग क्या करेगा?

आज ज्यादातर मोबाइल और ब्रॉडबैंड इंटरनेट जमीन पर बिछे फाइबर, मोबाइल टावर और दूसरे स्थलीय नेटवर्क से चलता है। लेकिन पहाड़ी, जंगल, रेगिस्तान, सीमावर्ती और बेहद दूर-दराज के इलाकों में फाइबर बिछाना या टावर लगाना महंगा और मुश्किल होता है।

सैटेलाइट इंटरनेट में जमीन पर हर गांव तक फाइबर पहुंचाने की जरूरत नहीं होती। घर या संस्थान में लगाया गया टर्मिनल सीधे ऊपर मौजूद सैटेलाइट से जुड़ता है।

इसी वजह से सरकार खुद मानती है कि सैटेलाइट आधारित संचार उन ग्रामीण, दूरस्थ, सीमावर्ती, तटीय और पहाड़ी इलाकों में उपयोगी हो सकता है, जहां फाइबर या माइक्रोवेव नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है। यानी Starlink का सबसे बड़ा असर उन इलाकों में हो सकता है जहां आज इंटरनेट की आखिरी कड़ी सबसे कमजोर है।

किन गांवों तक पहुंच सकता है?

सैटेलाइट इंटरनेट की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके लिए हर गांव में मोबाइल टावर या फाइबर लाइन जरूरी नहीं है। ऐसे इलाके जहां:

  • पहाड़ों के कारण फाइबर बिछाना मुश्किल है
  • घने जंगल हैं
  • आबादी बहुत कम है
  • सीमावर्ती गांव हैं
  • द्वीप या तटीय इलाके हैं
  • मोबाइल टावर लगाना आर्थिक रूप से मुश्किल है

वहां सैटेलाइट इंटरनेट उपयोगी हो सकता है। सरकार के मुताबिक भारत में ग्रामीण इंटरनेट पहुंच अभी भी शहरी क्षेत्रों से पीछे है। सितंबर 2025 के PIB बैकग्राउंडर में ग्रामीण क्षेत्र में इंटरनेट घनत्व लगभग 46 इंटरनेट ग्राहक प्रति 100 आबादी बताया गया था।इसलिए Starlink का लक्ष्य केवल शहरों में नया विकल्प देना नहीं होगा। इसकी असली उपयोगिता ‘लास्ट माइल कनेक्टिविटी’ में होगी।

Starlink बनाम Jio-AirFiber: कौन किससे मुकाबला करेगा?

दोनों को एक जैसा समझना गलती होगी।

सेवातकनीकसबसे ज्यादा उपयोगी
StarlinkLEO सैटेलाइटदूर-दराज और कठिन इलाके
Jio AirFiber5G/FWAजहां मोबाइल नेटवर्क मजबूत है
फाइबर ब्रॉडबैंडऑप्टिकल फाइबरशहर और अच्छी कनेक्टिविटी वाले इलाके
BSNLफाइबर/मोबाइल/सैटेलाइट फोन आदिव्यापक सरकारी नेटवर्क

Jio के मौजूदा AirFiber/ब्रॉडबैंड प्लान ₹399+GST से शुरू होते हैं और 30 Mbps से लेकर 300 Mbps तक के विकल्प उपलब्ध हैं।

Jio की सैटेलाइट कंपनी को भी GMPCS लाइसेंस मिला हुआ है और कंपनी भविष्य में सैटेलाइट आधारित कनेक्टिविटी पर काम कर रही है।

दूसरी ओर, BSNL को Starlink जैसा उपभोक्ता सैटेलाइट ब्रॉडबैंड विकल्प समझना अभी सही नहीं होगा। फरवरी 2026 में सरकार ने स्पष्ट किया कि BSNL की Global Satellite Phone Service मुख्य रूप से वॉयस कॉल और SMS देती है, इंटरनेट ब्रॉडबैंड नहीं।

सबसे बड़ा सवाल-कीमत कितनी होगी?

यहीं Starlink के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। भारत में Jio जैसे ऑपरेटर बेहद कम कीमत पर ब्रॉडबैंड दे रहे हैं। वहीं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में Starlink की कीमत काफी ज्यादा रही है।

भारत के लिए अभी Starlink की आधिकारिक उपभोक्ता कीमत घोषित नहीं हुई है, इसलिए कोई निश्चित रकम बताना जल्दबाजी होगी।

हालांकि 2025 में Reuters से बात करने वाले विश्लेषकों ने भारत में शुरुआती Starlink प्लान करीब 15 डॉलर यानी लगभग ₹1,200-1,300 प्रति महीने से शुरू होने की संभावना जताई थी। यह अनुमान था, आधिकारिक कीमत नहीं।

इसके अलावा ग्राहक को सैटेलाइट टर्मिनल खरीदने या लगाने का शुरुआती खर्च भी उठाना पड़ सकता है। यानी अगर गांव में पहले से 400-700 रुपये में फाइबर या AirFiber उपलब्ध है तो Starlink का इस्तेमाल सिर्फ तेज इंटरनेट के लिए करना हर परिवार के लिए आकर्षक नहीं होगा। जहां दूसरा विकल्प नहीं है, वहीं इसकी असली मांग होगी।

क्या मोबाइल टावरों की जरूरत कम हो जाएगी?

पूरी तरह नहीं। यह सबसे बड़ा भ्रम होगा कि Starlink आने के बाद मोबाइल टावरों की जरूरत खत्म हो जाएगी। मोबाइल फोन का सामान्य नेटवर्क अभी भी 4G और 5G टावरों पर निर्भर रहेगा। सैटेलाइट ब्रॉडबैंड मुख्य रूप से उन जगहों पर विकल्प देगा जहां जमीन आधारित नेटवर्क पहुंचाना मुश्किल है।

हां, भविष्य में Starlink जैसी कंपनियां Direct-to-Device (D2D) तकनीक विकसित कर रही हैं। इसमें विशेष टर्मिनल के बिना सीधे सामान्य मोबाइल डिवाइस से सैटेलाइट कनेक्टिविटी देने का लक्ष्य है। Starlink ने भारत में इसी तरह की D2D सेवाओं को अनुमति देने की मांग भी रखी है।

अगर यह तकनीक बड़े पैमाने पर सफल होती है तो दूर-दराज के इलाकों में हर जगह टावर लगाने की जरूरत कुछ हद तक कम हो सकती है। लेकिन, यह अभी भविष्य की तकनीक है, मौजूदा मोबाइल नेटवर्क का सीधा विकल्प नहीं।

क्या Starlink भारत का इंटरनेट सस्ता कर देगा?

संभव है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। अगर Starlink, Jio Satellite, OneWeb और दूसरे सैटेलाइट ऑपरेटर बाजार में आते हैं तो कंपनियों के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी।

लेकिन भारत में पहले से ही फाइबर और 5G आधारित इंटरनेट काफी सस्ता है। इसलिए सैटेलाइट इंटरनेट के लिए ‘सस्ता इंटरनेट’ से ज्यादा बड़ा बाजार ‘जहां इंटरनेट पहुंचा ही नहीं है’ हो सकता है।

TRAI ने 2026 में सैटेलाइट संचार नेटवर्क के लिए स्पेक्ट्रम और प्राधिकरण व्यवस्था पर अलग से परामर्श प्रक्रिया भी चलाई है। इसका मतलब है कि भारत अभी इस पूरे बाजार के नियमों को अंतिम रूप देने के चरण में है।

असली बदलाव कहां दिखेगा?

Starlink का सबसे बड़ा असर शायद शहरों में नहीं, बल्कि भारत के आखिरी 5-10 प्रतिशत कठिन इलाकों में दिखाई देगा। एक पहाड़ी गांव का स्कूल, सीमा क्षेत्र की चौकी, जंगल में स्वास्थ्य केंद्र, आपदा के समय राहत शिविर या ऐसी जगह जहां फाइबर टूटने के बाद कनेक्टिविटी पूरी तरह बंद हो जाती है-इन जगहों पर सैटेलाइट इंटरनेट बेहद महत्वपूर्ण हो सकता है।

सरकार भी मोबाइल टावरों के साथ ऐसे विकल्पों पर काम कर रही है। फरवरी 2026 तक 4G Saturation Scheme के तहत करीब 30,000 गांवों की पहचान की गई थी और 21,000 टावर लगाने का लक्ष्य था, जिनमें लगभग 17,000 पूरे हो चुके थे।