Patrika+

भाग्यश्री साठे ने कैसा रचा इतिहास, बनीं भारत की पहली महिला शतरंज मास्टर

28 August History Bhagyashree Sathe: क्या आप जानते हैं कि एक महिला ने अपने हौसले और मेहनत से भारतीय शतरंज में एक नया अध्याय लिखा? भाग्यश्री साठे का संघर्ष से निकल एक प्रेरणादायक कहानी के रूप में खुद को स्थापित करना आपको लगेगा कि सीमाएं बस एक विचार हैं, तो आइए जानते हैं, भाग्यश्री साठे की कहानी...
2 min read
Aug 28, 2026
Bhagya shree sathe motivational story
Bhagya shree sathe motivational story

28 August History Bhagyashree Sathe: 28 अगस्त ऐतिहासिक पन्नों को पलटते हुए जब सफलता की कहानियां देखते या याद करते हैं, तो उनमें एक भारतीय महिला शतरंज का एक नये युग की शुरुआत भी नजर आती है। इसी दिन 1986 को भाग्यश्री साठे (अब भाग्यश्री थिप्से) ने ‘इंटरनेशनल वुमन मास्टर’ (WIM) का खिताब हासिल किया। उनकी यह उपलब्धि उनके लिए भारत की पहली महिला खिलाड़ी के रूप में मान्यता प्राप्त करने का दिन था।

भाग्यश्री साठे का सफर

भाग्यश्री साठे का जन्म 4 अगस्त 1961 को मुंबई में हुआ था। बचपन से ही शतरंज में रुचि थी, और 1979 में मद्रास नेशनल वुमन्स चैम्पियनशिप में उन्होंने अपनी शुरुआत की, जहां वे आठवें स्थान पर रहीं। इसके बाद उन्होंने लगातार मेहनत की और 1985 में राष्ट्रीय चैम्पियनशिप जीतकर अपनी पहचान बनाई। उन्होंने 1985, 1986, 1988, 1991 और 1994 में भारतीय महिला चैम्पियनशिप जीती और 1991 में एशियन महिला चैम्पियनशिप का खिताब भी अपने नाम किया। 1986 में उन्हें WIM का खिताब मिला, और 1987 में उन्हें अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया।

महिला शतरंज में भारत का परिदृश्य

1970 और 1980 के दशक में खदीलकर बहनें (वसन्ती, जयश्री, रोहिणी) महिला शतरंज में अग्रणी थीं। भाग्यश्री साठे ने उनकी विरासत को आगे बढ़ाया और 1986 में WIM का खिताब जीतकर महिला खिलाड़ियों के लिए नए रास्ते खोले। बाद में, 2002 में कोनेरु हम्पी भारत की पहली महिला ग्रैंडमास्टर बनीं। यह उपलब्धि उस समय की चुनौतियों और सीमाओं को पार करने की कहानी है। उस दौर में महिला खिलाड़ियों को कोचिंग, संसाधन और मंच मिलना मुश्किल था, लेकिन भाग्यश्री ने अपनी मेहनत और परिवार के समर्थन से यह मुकाम हासिल किया।

जानिए आज इनके संघर्ष और सफलता की कहानी जानना आज क्यों जरूरी

28 अगस्त 1986 का दिन इसलिए खास है क्योंकि यह भारतीय महिला शतरंज में एक मील का पत्थर था। पहली महिला खिलाड़ी जिसने अंतरराष्ट्रीय मान्यता (WIM) हासिल की। यह उपलब्धि उस समय की चुनौतियों और सीमाओं को पार करने की कहानी है। उस दौर में महिला खिलाड़ियों को कोचिंग, संसाधन और मंच मिलना मुश्किल था, लेकिन भाग्यश्री ने अपनी मेहनत और परिवार के समर्थन से यह मुकाम हासिल किया।

अब आगे क्या?

भाग्यश्री साठे की कहानी हमें यह सिखाती है कि समर्थन, संसाधन और अवसर कितने महत्वपूर्ण हैं। आज जब महिला शतरंज में भारत विश्व स्तर पर चमक रहा है, तब हमें जमीनी स्तर पर और अधिक कोचिंग, टूर्नामेंट और समर्थन सुनिश्चित करना चाहिए। इससे और अधिक प्रतिभाएं उभरेंगी और देश का गौरव बढ़ेगा।

महिला शतरंज का भविष्य

आज के युवा खिलाड़ी, विशेषकर महिलाएं, उनके इस संघर्ष और सफलता से प्रेरणा ले सकते हैं। यह याद दिलाता है कि सीमित संसाधन भी अगर सही दिशा और मेहनत के साथ हों, तो बड़े मुकाम हासिल किए जा सकते हैं। भारतीय शतरंज महासंघ और अन्य संगठनों को महिला खिलाड़ियों के लिए विशेष कार्यक्रम और कोचिंग कैंप आयोजित करने चाहिए। इससे न केवल महिला खिलाड़ियों की संख्या बढ़ेगी, बल्कि उनकी गुणवत्ता में भी सुधार होगा।

शतरंज में महिलाओं की भूमिका

महिला शतरंज में भारत की सफलता का श्रेय उन खिलाड़ियों को भी जाता है, जिन्होंने अपने समय में सीमित संसाधनों के बावजूद उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। आज, भारत में कई महिला ग्रैंडमास्टर और अंतरराष्ट्रीय मास्टर हैं, जो विश्व स्तर पर देश का नाम रोशन कर रही हैं। इन खिलाड़ियों की सफलता से प्रेरित होकर, अधिक से अधिक लड़कियां शतरंज को करियर के रूप में चुन रही हैं।

Updated on:
28 Aug 2026 11:39 am
Published on:
28 Aug 2026 11:39 am