
भारत ने हाल ही में एक व्यापक जलवायु परिवर्तन कानून संसद में पेश किया है, जिसका उद्देश्य देश में जलवायु संकट से निपटने के लिए एक समग्र और कानूनी रूप से बाध्यकारी ढांचा तैयार करना है। इस कानून को "जलवायु परिवर्तन विधेयक" कहा गया है, जो जलवायु परिवर्तन के मुद्दों को अब तक अलग-अलग पर्यावरण कानूनों के बजाय एक केंद्रीकृत कानून के तहत लाने का प्रयास करता है। संसद में पेश किए गए नए विधेयक का उद्देश्य उत्सर्जन में कटौती, अनुकूलन, और जलवायु जोखिमों का आकलन करना है। साथ ही एक समर्पित संस्थान बनाना जो इन सभी पहलुओं को देखे।
संसद में पेश किए गए विधेयक का एक प्रमुख आधार इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज (IPCC) की छठी मूल्यांकन रिपोर्ट है। जिसमें चेतावनी दी गई है कि जलवायु परिवर्तन व्यापक, तेज और तीव्र हो रहा है और इसके प्रभाव आने वाले दशकों में और बढ़ेंगे। जैसे कि अधिक गर्मी की लहरें, असामान्य वर्षा और चरम मौसम की घटनाएं। विधेयक में यह भी उल्लेख है कि पेरिस समझौते के तहत भारत ने 2030 तक अपने GDP के प्रति उत्सर्जन तीव्रता में 33–35 प्रतिशत की कटौती और अतिरिक्त वन कवर से 2.5–3 बिलियन टन CO₂ समाशोधन बनाने का वादा किया था, लेकिन ये प्रतिबद्धताएं अभी तक स्वैच्छिक थीं और वैश्विक तापमान लक्ष्य हासिल करने के लिए पर्याप्त नहीं थीं।
वैश्विक प्रतिक्रिया में, अभी तक इस विधेयक पर सीधे कोई व्यापक अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। यह विधेयक अभी संसद में पेश किया गया है और पारित नहीं हुआ है। हालांकि, भारत की जलवायु नीति और अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसकी भूमिका पर पहले से मौजूद रुझानों से कुछ संकेत मिलते हैं।
भारत ने जून 2026 में बॉन में आयोजित UNFCCC की SB64 बैठक में स्पष्ट किया कि वह UN जलवायु वार्ता में "नई जिम्मेदारियां और मुद्दे" नहीं चाहता, बल्कि मौजूदा समझौतों के कार्यान्वयन पर ध्यान केंद्रित करना चाहता है। भारत ने विशेष रूप से Article 9.1 (जलवायु वित्त) के कार्य कार्यक्रम को प्राथमिकता देने की बात कही, और विकसित देशों से वित्तीय सहायता में गिरावट और अनुकूलन वित्त की कमी पर चिंता जताई। यह रुख यह दर्शाता है कि भारत वैश्विक मंच पर न्याय और वित्तीय सहायता की मांग जारी रखेगा, और नए कानून के माध्यम से घरेलू स्तर पर अपनी स्थिति मजबूत करना चाहता है।
UNFCCC की एक हालिया अध्ययन रिपोर्ट में कहा गया है कि यदि भारत समय रहते घरेलू जलवायु कार्रवाई करता है। जैसे- नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश और कम-उत्सर्जन वाले स्टील उत्पादन की ओर बदलाव तो वह अपने निर्यात पर लगाए जाने वाले कार्बन सीमा समायोजन के प्रभाव को कम कर सकता है। इसके साथ ही अपनी वैश्विक प्रतिस्पर्धा को मजबूत बना सकता है। यह सुझाव विधेयक के महत्व को और बढ़ाता है, क्योंकि यह न केवल पर्यावरणीय बल्कि आर्थिक दृष्टिकोण से भी भारत के हित में है।
इसके अलावा, UNFCCC के कार्यकारी सचिव साइमन स्टिएल ने जुलाई 2026 में कहा कि भारत अब एक "सोलर सुपरपावर" बन चुका है, जिसने अपनी अर्थव्यवस्था और जीवन स्तर को तेजी से आगे बढ़ाया है। उन्होंने यह भी कहा कि स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु कार्रवाई से भारत को स्वच्छ हवा, बेहतर स्वास्थ्य, बजट बचत और ऊर्जा सुरक्षा जैसी कई लाभ मिल रहे हैं।
भारत का नया जलवायु परिवर्तन कानून एक महत्वपूर्ण कदम है। यह देश को जलवायु संकट से निपटने के लिए कानूनी रूप से सशक्त बनाएगा, साथ ही वैश्विक मंच पर उसकी मांगों को मजबूत करेगा। हालांकि अभी तक कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन भारत की नीति रुख, वित्तीय मांगें और स्वच्छ ऊर्जा की उपलब्धियां इस कानून को एक सकारात्मक संकेत के रूप में प्रस्तुत करती हैं। संसद में पेश किया गया जलवायु परिवर्तन से जुड़ा विधेयक को 'कानून' बनने में समय लगेगा। यदि यह कानून पारित होता है, तो यह भारत के जलवायु लक्ष्य, उद्योगों, वित्तीय योजनाओं और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर गहरा असर डाल सकता है।