
भारत के विभिन्न हिस्से हर साल मानसून की दस्तक के साथ ही भारी तबाही और अव्यवस्था का सामना करते हैं। एक तरफ देश की राजधानी दिल्ली और उसके प्रमुख आर्थिक केंद्र गुरुग्राम में कुछ ही घंटों की बारिश से जीवन थम जाता है, तो दूसरी तरफ पूर्वोत्तर का असम राज्य महीनों तक विनाशकारी बाढ़ की चपेट में रहता है। यह अंतर दिखाता है कि भारत में बाढ़ और जलजमाव की समस्या के पीछे केवल मौसम जिम्मेदार नहीं है, बल्कि योजनागत कमियां और भौगोलिक चुनौतियां भी हैं।
हाल के वर्षों में दिल्ली और गुरुग्राम में बारिश का ढर्रा बदला है। कुछ ही घंटों में कई सौ मिलीमीटर बारिश दर्ज की जाती है। उदाहरण के लिए, गुरुग्राम में केवल दो दिनों में 350 मिमी तक वर्षा दर्ज की गई। इतनी कम अवधि में इतनी अधिक बारिश को संभालने की क्षमता मौजूदा ड्रेनेज (जल निकासी) सिस्टम में नहीं है।
अनियोजित शहरीकरण और सीमेंट का जाल
गुरुग्राम और दिल्ली का तेजी से विस्तार हुआ, लेकिन इस दौरान प्राकृतिक जल संचयन क्षेत्रों (Wetlands) और नालों को नजरअंदाज कर दिया गया। पक्की सड़कों और इमारतों के निर्माण के कारण पानी जमीन के भीतर नहीं जा पाता। परिणामस्वरूप, सारा पानी सड़कों पर एकत्र हो जाता है।
सड़क धंसने और ट्रैफिक जाम की समस्या
दिल्ली-जयपुर हाईवे (NH-8) जैसी प्रमुख सड़कों पर जलजमाव और सड़क धंसने की घटनाएं आम हो चुकी हैं। इसके कारण वाहनों की रफ्तार थम जाती है और आम जनता को घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है।
असम में बाढ़ केवल जलजमाव की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक प्राकृतिक आपदा है जो हर साल व्यापक तबाही लाती है।
भौगोलिक संरचना और नदी प्रणाली
असम का लगभग 40% हिस्सा बाढ़-प्रवण क्षेत्र के अंतर्गत आता है। राज्य से होकर गुजरने वाली ब्रह्मपुत्र और बराक नदियां अपनी 50 से अधिक सहायक नदियों के साथ मानसून में प्रचंड रूप धारण कर लेती हैं। पहाड़ी इलाकों से आने वाला पानी मैदानी हिस्सों में तेजी से फैलता है।
गाद (Sedimentation) और नदी तल का उठना
हिमालयी क्षेत्रों से बहकर आने वाली नदियां अपने साथ भारी मात्रा में गाद, मिट्टी और चट्टानें लाती हैं। यह गाद नदी के तल में जमा हो जाती है, जिससे नदी की गहराई कम हो जाती है। गहराई कम होने के कारण थोड़ा सा भी अतिरिक्त पानी तटबंधों को तोड़कर बाहर आ जाता है।
सहायक नदियों की भूमिका
असम में बाढ़ का कारण केवल मुख्य ब्रह्मपुत्र नदी नहीं है। छिमे, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश की पहाड़ियों में होने वाली मूसलाधार बारिश के कारण सहायक नदियां (जैसे धंसिरी) उफान पर आ जाती हैं और अचानक बाढ़ (Flash Floods) की स्थिति उत्पन्न कर देती हैं।
मानवीय हस्तक्षेप और वनों की कटाई
पहाड़ी क्षेत्रों में अनियमित निर्माण, अवैध खनन और वनों की कटाई से मिट्टी का कटाव बढ़ा है। इसके अलावा, पुराने और कमजोर तटबंध (Embankments) समय पर मरम्मत न होने के कारण टूट जाते हैं, जिससे दर्जनों गांव जलमग्न हो जाते हैं।
शहरी क्षेत्रों (दिल्ली-एनसीआर) के लिए उपाय
तटबंधों का आधुनिक जीर्णोद्धार: पारंपरिक तटबंधों के स्थान पर आधुनिक तकनीक का उपयोग करके मजबूत और टिकाऊ तटबंध बनाना।
वेटलैंड्स का संरक्षण: प्राकृतिक जल निकायों और बील (असम और बंगाल के बाढ़ के मैदानों में स्थिर पानी वाली झील जैसी आर्द्रभूमि को भी स्थानीय भाषा में 'बील' (Beel) कहा जाता है। ) का पुनरुद्धार करना ताकि वे अतिरिक्त जल को सोख सकें।
उन्नत पूर्वानुमान प्रणाली: सटीक मौसम और बाढ़ पूर्वानुमान की तकनीक को मजबूत करना ताकि समय रहते लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया जा सके।
मौसम का बदलना प्राकृतिक है, लेकिन तैयारियों में कमी से नुकसान का दायरा बढ़ता है। चाहे दिल्ली का शहरी ढांचा हो या असम का नदी प्रबंधन, दोनों ही जगह तात्कालिक राहत कार्यों से इतर दीर्घकालिक और टिकाऊ नीतियों को लागू करने की तत्काल आवश्यकता है।