
भारत में लंबे समय से पर्यावरण वैज्ञानिक यूकेलिप्टस के पेड़ उगाए जाने को लेकर चिंता जाहिर करते रहे हैं। अब दुनिया भर में यूकेलिप्टस लगाए जाने के पर्यावरणीय प्रभावों ने वैज्ञानिकों की चिंता और बढ़ा दी है। अफ्रीका से लेकर दक्षिण अमेरिका तक के देशों में कई दशकों तक यूकेलिप्टस के पेड़ों को बढ़ावा दिया, जिसके बाद यहां बड़े-बड़े बागान तैयार हो गए। लेकिन दशकों में इन बड़े बागानों ने देश के कई हिस्सों में नजारे बदल दिए हैं। इससे पेड़ों के मौजूद पानी को लेकर चिंताएं पैदा हो गई हैं। चार देशों में हुई वैज्ञानिक शोधों में हैरान करने वाली जानकारी सामने आई है।
दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील का यूकेलिप्टस उद्योग का एक मकसद था- तेजी से पेड़ उगाना, लुगदी के लिए उन्हें काटना और ग्लोबल पेपर इंडस्ट्री के लिए दोबारा इस्तेमाल हो सकने वाली सप्लाई बनाना। वैज्ञानिकों ने पाया है कि इसने भूजल के स्तर को बहुत बुरी तरह प्रभावित किया है। मिनास गैरेस के यूकेलिप्टस उगाने वाले एक इलाके में 45 सालों में भूजल का स्तर 4.5 मीटर गिर गया है। स्थानीय लोग इसे हरा रेगिस्तान कहने लगे हैं।
अर्जेंटीना के विशाल पम्मास घास के मैदानों में कभी यूकेलिप्टस के पेड़ लगाए गए थे, जो अब खतरनाक स्तर से भूजल को प्रभावित कर रहे हैं। मध्य अर्जेंटीना के फ्लडिंग पम्मास इलाके में 40 हेक्टेयर के बागान में वैज्ञानिकों ने स्टडी की। यह बागान 1951 में लगाया गया था। दो साल की स्टडी में पता चला कि घास के मैदानों की तुलना में यूकेलिप्टस वाले इलाके में भूजल 0.5 मीटर से ज्यादा नीचे थे। इसने जमीन के नीचे एक ढाल बना दिया और घास के मैदानों से पानी बागान की और क्षैतिज रूप से बहने लगा। यानी यूकेलिप्टस के पेड़ सिर्फ अपने नीचे ही पानी का इस्तेमाल नहीं कर रहे, बल्कि आस-पास के इलाकों से भी भूजल खींच रहे हैं।
दक्षिण अमेरिका की एक और देश उरुग्वे में भी इस वनस्पति के दुष्परिणाम दिखने लगे हैं। उरुग्वे में 20 साल तक चले अध्ययन में इस असर का साफ डेटा मिलता है। शोधकर्ताओं ने साल 2000 से दो आस-पास के वॉटरशेड पर नजर रखी। एक को चारागाह ही रहने दिया गया, जबकि दूसरे यूकेलिप्टस और पाइन के बागान लगाए गए। पेड़ लगाने के 17 साल बाद घास के मैदान की तुलना में जंगल वाले वॉटरशेड में 35% पानी की कमी आई।
पूर्वी अफ्रीकी देश रवांडा में विदेशी यूकेलिप्टस पर की गई स्टडी में इसे बड़ी मात्रा में पोषक तत्व सोखने वाला बताया गया है, जिससे मिट्टी दूसरे उपयोग के लिए कम उपजाई हो सकती है। शोधकर्ताओं ने मिट्टी की गुणवत्ता के साथ ही पानी के इस्तेमाल तक चिंता जाहिर की है। रवांडा में यूकेलिप्टस मुख्य बागान वाला पेड़ बन गया है। स्टडी के अनुसार, वन बागानों में यूकेलिप्टस की हिस्सेदारी 78% थी। 1970 के दशक की शुरुआत में इथियोपिया, रवांडा, युगांडा, केन्या और सूडान में यूकेलिप्टस के बागान 95684 हेक्टेयर में फैले हुए थे। इसमें उस समय रवांडा का हिस्सा लगभग 23000 हेक्टयर था।
अत्यधिक पानी की खपत: यूकेलिप्टस की जड़ें बहुत गहरी और लंबी होती हैं, जो जमीन के अंदर से भारी मात्रा में पानी खींचती हैं, जिससे आसपास के भूजल स्तर में भारी गिरावट आती है।
मिट्टी की उर्वरता और नमी को नष्ट करना: यह पेड़ जमीन से सभी पोषक तत्वों और नमी को पूरी तरह सोख लेता है, जिससे वह जमीन बंजर और उपजाऊ नहीं रह पाती।
जैविक विविधता (Biodiversity) का ह्रास: यूकेलिप्टस के आसपास अन्य पेड़-पौधे और घास आसानी से नहीं उग पाते। इसके पत्तों में मौजूद रसायन (Allelopathic properties) दूसरी वनस्पतियों के विकास को रोकते हैं।
पक्षियों और जीवों के लिए अनुपयुक्त: इसकी पत्तियों और छाल में एक खास गंध और रासायनिक तत्व होता है, जिसके कारण पक्षी इस पर घोंसला नहीं बनाते और स्थानीय जीव-जंतु इस तरफ आकर्षित नहीं होते।
जंगल की आग (Wildfires) का खतरा: यूकेलिप्टस के पेड़ों में तेल की मात्रा अधिक होती है और इसकी सूखी पत्तियां व छाल अत्यधिक ज्वलनशील होती हैं, जिससे जंगलों में भीषण आग लगने का खतरा बहुत बढ़ जाता है।
मिट्टी का कटाव (Soil Erosion): इन पेड़ों के नीचे जमीन पर अक्सर कोई घास या छोटी वनस्पति नहीं उग पाती, जिससे भारी बारिश के दौरान पानी सीधे मिट्टी पर गिरता है और मिट्टी का कटाव तेजी से होता है।
कृषि भूमि के लिए हानिकारक: यदि खेतों के आसपास यूकेलिप्टस के पेड़ लगा दिए जाएं, तो वे फसल की पैदावार को बहुत कम कर देते हैं क्योंकि वे फसलों का पानी और खाद चुरा लेते हैं।
एलर्जी और स्वास्थ्य समस्याएं: इसके परागकण (Pollen grains) हवा में फैलकर अस्थमा, सांस की तकलीफ, खांसी और त्वचा से जुड़ी एलर्जी जैसी समस्याओं को बढ़ा सकते हैं।
लकड़ी की सीमित उपयोगिता: इसकी लकड़ी बहुत मजबूत और टिकाऊ नहीं होती। यह जल्दी टेढ़ी-मेढ़ी हो जाती है, इसलिए इसका उपयोग उच्च गुणवत्ता वाले फर्नीचर के लिए नहीं किया जा सकता।
पर्यावरणीय असंतुलन: चूंकि यह स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र (Ecosystem) के अनुकूल नहीं होता और मिट्टी व पानी के प्राकृतिक चक्र को बिगाड़ देता है, इसलिए बड़े पैमाने पर इसका रोपण पर्यावरण के लिए दीर्घकालिक नुकसानदेह साबित होता है।