
बॉलीवुड के अभिनय सम्राट दिलीप कुमार से बातचीत करते पत्रकार एम आई'ज़ाहिर'। (फाइल फोटो)
भारत के पश्चिम में स्थित राजस्थान के दूसरे बड़े शहर जोधपुर में हर तरफ ठहरे हुए पानी-सी हलचल, ढलती दोपहर, अनार जैसे पेशावरी पठान, नफ़ासत भरा ख़ूबसूरत शाइस्ता लहजा और गुफ़्तगू के अंदाज़ में भी शान। ये थे ट्रेजिडी किंग दिलीप कुमार।
शहर में सभी की चाह थी कि उनकी एक झलक देखने को मिल जाए। मैंने 5 मार्च 1996 को दूरदर्शन और अख़बार के लिए उनका इंटरव्यू किया तो मुझे ऐसा ही महसूस हुआ था। फ़िल्म इंडस्ट्री में मायानगरी को ही फ़िल्मों का केंद्र माना जाता रहा है, मगर इस महान शख़्सियत को पचहत्तरवें जन्मदिन पर एक ख़ूबसूरत सेल्युलाइ ड की लड़ियों भरी ख़ूबसूरत सौग़ात देने में राजस्थान के दूसरे बड़े शहर जोधपुर ने बाज़ी मार ली थी। हालांकि उनका जन्म 11 दिसंबर 1922 को ब्रिटिश भारत के पेशावर (वर्तमान पाकिस्तान) में हुआ था। व्यस्त रहने के कारण उस समय आयोजन नहीं हो सका और मार्च 1996 में आयोजन रखा गया।
फ़िल्म इंडस्ट्री में चेकोस्लोवाक एकेडमी से सम्मानित शहंशाह-ए-जज़्बात दिलीप कुमार के सामने एक्टिंग करना या बोलना अपनेआप में बड़ा अनुभव माना जाता है। अच्छे-अच्छों की बोलती बंद हो जाती थी। शूटिंग के वक़्त तो बहुत सारे फ़नकार उनकी मौजूदगी भर से अपने डायलॉग भूल जाते थे। मेरा कैमरामैन कह रहा था कि आप उनसे बात कर लेंगे क्या!
इसके बरअक्स यह मेरी ख़ुशक़िस्मती रही कि उनके पचहत्तरवें जन्मदिन पर आयोजित दिलीप कुमार फ़िल्म महोत्सव के मौक़े पर जोधपुर में मुझे अकेले को बीएसएफ गेस्ट हाउस में उनका इंटरव्यू लेने का मौक़ा मिला था।
हालांकि वे उम्मेद भवन पैलेस में ठहरे थे, मगर इंटरव्यू इस तरह प्लान किया गया था कि कहीं उम्मेद भवन पैलेस में भीड़ इकट्ठी न हो जाए। अगले दिन लोग यह समझकर बीएसएफ गेस्ट हाउस एकत्र हुए कि दिलीप साहब वहीं ठहरे हैं।
दिलीप साहब का जोधपुर में दिया गया वह आख़िरी इंटरव्यू रहा।
गगनचुंबी इमारतों से शानो-शौक़त नहीं होती
दिलीप साहब ने इंटरव्यू में कहा था—
“गगनचुंबी इमारतों से शानो-शौक़त नहीं होती, शानो-शौक़त तहज़ीब से होती है।”
उन्होंने कहा था कि फ़िल्म इंडस्ट्री को एक अदद अच्छे स्क्रिप्ट राइटर की ज़रूरत है।
उन्होंने इंटरव्यू में जो बातें कही थीं, वे जन्मोत्सव के दिन प्रकाशित इंटरव्यू के बाद गिरधर मंदिर पहुंचे लोगों और शहर के फ़िल्म प्रेमियों के बीच चर्चा का विषय बन गई थीं।
एक और बात, दिलीप साहब ने इस बात पर ख़ुशी ज़ाहिर की थी कि पचहत्तरवें जन्मदिन पर उनकी ज़िंदगी का सबसे हसीन तोहफ़ा उन्हें जोधपुर से मिला।
पचहत्तरवें जन्मदिन पर आयोजित दिलीप कुमार फ़िल्म महोत्सव जोधपुर फ़िल्म सोसाइटी की ओर से तत्कालीन गिरधर मंदिर छविगृह में आयोजित किया गया था। उस कार्यक्रम से एक दिन पहले ही ये इंटरव्यू समाचार पत्र में प्रकाशित हुआ था। कार्यक्रम का संयोजन करते हुए मशहूर शाइर शीन काफ़ निज़ाम साहब ने कहा था—
“दिलीप कुमार फ़न की आख़िरी लकीर का आख़िरी नुक़्ता हैं।”
जोधपुर में आयोजित दिलीप कुमार फ़िल्म महोत्सव में उनकी 11 मशहूर फ़िल्मों का प्रदर्शन किया गया था। यह महोत्सव दिलीप साहब के 75वें जन्मदिन और उनकी जोधपुर यात्रा के अवसर पर आयोजित हुआ था।
जोधपुर के तत्कालीन गिरधर मंदिर सिनेमा हॉल में सजे इस फ़िल्मी आयोजन में उनकी कालजयी फ़िल्में ‘मुगल-ए-आज़म’, ‘मधुमती’ और ‘देवदास’ सहित कई यादगार फ़िल्में दिखाई गईं। इन फ़िल्मों के ज़रिये दर्शकों को दिलीप कुमार के अभिनय के अलग-अलग रंगों और उनकी अदाकारी की गहराई फिर से महसूस करने का मौक़ा मिला।
इस ख़ास मौक़े पर ही ख़ुद दिलीप कुमार और सायरा बानो जोधपुर पहुंचे थे। महोत्सव का उद्घाटन उनकी मौजूदगी में हुआ, जबकि कार्यक्रम में अशोक गहलोत विशेष तौर पर शामिल रहे।
दिलीप साहब का इंटरव्यू किसी भी हालत में लेना था। इंटरव्यू के लिए मैंने इस तरह तैयारी की थी कि रिसर्च पूरी हो जाए।
इस इंटरव्यू से जुड़ा प्रसंग भी कम दिलचस्प नहीं है।
दिलीप साहब के सचिव स्वर्गीय कमलेश पुरोहित और जोधपुर फ़िल्म सोसाइटी के तत्कालीन सचिव स्वर्गीय प्रो. मोहनस्वरूप माहेश्वरी ने शुरू से आख़िर तक बहुत साथ दिया।
उस समय जोधपुर में टीवी पत्रकारिता के नाम पर केवल दूरदर्शन ही था। जब जोधपुर के बीएसएफ गेस्ट हाउस में तत्कालीन फ़ोटो जर्नलिस्ट और अब दिवंगत दिनेंद्र चौहान ‘टिल्लू’ ने वे तस्वीरें अपने कैमरे में क़ैद की थीं।
नज़ारा कुछ यूँ था कि मैं बहुत देर तक सफेद सूट में, कोट पर चेक की काली टाई लगाए दिलीप साहब को निहारता रहा और वो बोले, भई पूछिए! क्या पूछना है तो सहसा ही चौंक कर सवाल पूछने का सिलसिला शुरू किया।
जब उन्हें पता चला कि इंटरव्यू अख़बार के साथ-साथ टीवी के लिए भी है तो उन्होंने हल्के-फुल्के अंदाज़ में बातचीत शुरू की।
उन्होंने अदाकारा सायरा बानो से कहा—
“सायरा बी! आप ज़रा उधर बैठ जाइए।”
उस दिन वहां लाइट व कैमरा ऑन थे। इंटरव्यू के समय बीएसएफ गेस्ट हाउस में ऑफ़िसर्स और उनके परिवार के लोग मौजूद थे। सामने टेबल पर नाश्ता रखा था और दिलीप साहब हंसते हुए उनसे बोले—
“आइए आप लोग ख़ामोशी से मुफ़्त का शो देख लीजिए।”
उन्होंने ख़ुद सोफ़ा सेट कैमरे के अनुरूप सही जगह लगवाए और खिड़की में लगे हॉल के कर्टन बंद करवाए।
आज जब फ़िल्मों के रीमेक और सीक्वल बनाए जा रहे हैं, तो उनकी वह बात याद आती है। उन्होंने कहा था कि फ़िल्म इंडस्ट्री को अच्छे पटकथा लेखकों की ज़रूरत है, और वक़्त ने उनकी इस बात को सही साबित कर दिया।
इस तरह एक जीता-जागता सेट तैयार हुआ। डायरेक्शन ख़ुद दिलीप साहब दे रहे थे और अकिंचन ने उनसे सवाल करना शुरू किया और वो धाराप्रवाह जवाब देते चले गए। वो जब बोल रहे थे तो मानो उनके हर जुमले से फूल झड़ रहे थे। बीएसएफ गेस्ट हाउस में ऑफ़िसर्स की पत्नियां उनके हर जवाब का आनंद ले रही थीं। आज याद करते हैं तो ऐसा लगता है कि एक सुनहरा सपना था। वे 7 जुलाई 2021 को मुंबई में दुनिया से विदा हो गए,लेकिन सेल्युलाइड के पर्दे पर अपनी अदाकारी की अमिट यादगार छोड़ गए। आज दिलीप साहब नहीं हैं, मगर उनसे हुई बातचीत यादों के एलबम में आज भी सुरक्षित है।
Updated on:
08 Sept 2026 07:11 pm
Published on:
08 Sept 2026 07:11 pm
