
सांकेतिक इमेज (सोर्स- Chatgpt)
संयुक्त राष्ट्र महासचिव की एक विशेष रिपोर्ट ने भारत के दो सबसे बड़े महानगरों- मुंबई और कोलकाता के लिए बढ़ते समुद्री जलस्तर के खतरे को रेखांकित किया है। उप महासचिव अमीना मोहम्मद ने प्रशांत द्वीप समूह मंच की 55वीं बैठक में पलाऊ में यह रिपोर्ट पेश की थी। इस रिपोर्ट का शीर्षक है- समुद्री जलस्तर वृद्धि से जुड़ी चुनौतियां और उनसे निपटने के तरीके।
रिपोर्ट के मुताबिक, दक्षिण एशिया के निचले डेल्टा क्षेत्रों में बसे मुंबई, कोलकाता और ढाका, इन तीनों शहरों को मिलाकर 1.4 करोड़ से ज्यादा लोग स्थायी जलभराव के कारण अपना घर खोने के खतरे में हैं। यानी यह आंकड़ा अकेले मुंबई-कोलकाता का नहीं, बल्कि तीनों शहरों के निचले इलाकों को मिलाकर है।
बढ़ते खतरे के बीच बीएमसी ने मुंबई की 149 किलोमीटर लंबी तटरेखा का नया क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट शुरू करने की बात कही गई है। यह तटरेखा शहर की एक स्थापित और वास्तविक तटरेखा लंबाई है, जिसे 5 साल में दूसरा बड़ा आकलन बताया जा रहा है। बीएमसी ने इससे पहले 2022 में वर्ल्ड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट इंडिया की मदद से मुंबई क्लाइमेट एक्शन प्लान के तहत पहला बड़ा वल्नरेबिलिटी असेसमेंट तैयार किया था।
UN की रिपोर्ट के मुताबिक 2024 में वैश्विक समुद्री जलस्तर में करीब 5.9 मिलीमीटर की बढ़ोतरी हुई, जो अब तक की सबसे ज्यादा सालाना वृद्धि है। इससे पहले 2014 से 2023 के बीच औसत सालाना वृद्धि करीब 4.7 मिलीमीटर रही थी। यानी मौजूदा रफ्तार 1993-2002 के दशक की तुलना में दोगुने से भी ज्यादा हो चुकी है।
दुनिया भर में करीब 77 करोड़ लोग यानी हर 10 में से 1 इंसान हाई-टाइड स्तर से पांच मीटर से कम ऊंचाई वाले तटीय इलाकों में रहता है। रिपोर्ट के अनुसार बहुत कम उत्सर्जन वाले परिदृश्य (1 से 1.9 डिग्री सेल्सियस वार्मिंग) में भी IPCC के छठे आकलन के हिसाब से 2050 तक वैश्विक औसत समुद्री स्तर करीब 23 सेंटीमीटर बढ़ सकता है।
मुंबई की चुनौती सिर्फ समुद्र का बढ़ता पानी नहीं है। जमीन धंसना, खारे पानी का भूजल में प्रवेश और तूफानी लहरें जोखिम को और बढ़ा सकती हैं। कोलकाता गंगा-ब्रह्मपुत्र डेल्टा में बसा होने के कारण जलस्तर वृद्धि, कटाव और खारेपन के दोहरे खतरे में है। यह सिर्फ भारत तक सीमित समस्या नहीं है।
UN की रिपोर्ट के अनुसार, जर्मनी की करीब 70% तटरेखा कटाव की चपेट में है। नीदरलैंड का करीब 60% हिस्सा डूबने के खतरे में बताया गया है। इसी तरह फ्रांस के रिवेरा क्षेत्र में रेतीले समुद्र तट 19वीं सदी के अंत से अब तक करीब आधे तक सिकुड़ चुके हैं। ब्रिटेन में 2100 तक समुद्र का स्तर एक मीटर से ज्यादा बढ़ सकता है, जबकि भूमध्यसागर और अटलांटिक तट के कई इलाकों में सदी में एक बार आने वाली तटीय बाढ़ की घटनाएं 2050 तक करीब 10 गुना तक बढ़ने का अनुमान जताया गया है।
यूएन रिपोर्ट के मुताबिक समुद्री जलस्तर बढ़ने का असर रहने की जगह, पेयजल, भोजन, स्वास्थ्य और आजीविका तक पहुंचेगा। अगर समय रहते जरूरी अनुकूलन उपाय नहीं किए गए, तो 2050 तक करीब 1.2 अरब लोग विस्थापन के खतरे में आ सकते हैं। प्रशांत द्वीप समूह के कई समुदाय पहले ही पुनर्वास की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। आर्थिक असर भी कम गंभीर नहीं है। तटीय ढांचे को होने वाला नुकसान अभी ही 1.8 लाख करोड़ डॉलर से ज्यादा आंका गया है। अगर अनुकूलन उपाय नहीं अपनाए गए तो सदी के अंत तक सालाना नुकसान 1.2 से 4 लाख करोड़ डॉलर तक पहुंच सकता है।
मुंबई और कोलकाता जैसे आर्थिक केंद्रों के लिए यह चेतावनी सिर्फ पर्यावरणीय नहीं, बल्कि आर्थिक और सामाजिक स्थिरता से जुड़ा मसला है। कारोबार, रोजगार और बुनियादी ढांचे तक इसका असर पहुंच सकता है। रिपोर्ट ने सामाजिक जोखिम (मानव विस्थापन) को भी उतनी ही गंभीरता से देखने की जरूरत बताई है, जितनी गंभीरता से अमीर देशों के शहरों में अरबों डॉलर के वित्तीय नुकसान को देखा जाता है। रिपोर्ट में सदस्य देशों के लिए उत्सर्जन में तेज कटौती, बेहतर पूर्व चेतावनी तंत्र और जलवायु अनुकूलन के लिए ज्यादा वित्तीय मदद जैसी 18 सिफारिशें भी दी गई हैं।
Updated on:
08 Sept 2026 08:58 pm
Published on:
08 Sept 2026 08:58 pm
