
आज, 13 अगस्त 2026 को हम एक ऐसे ऐतिहासिक मोड़ पर खड़े हैं जब भारत ने संविधान अपनाने के बाद न्याय की नींव रखी थी। 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ, और इसके ठीक दो दिन बाद, 28 जनवरी 1950 को, देश ने अपना सर्वोच्च न्यायालय स्थापित किया और न्यायपालिका की नई राह शुरू हुई। इस महत्वपूर्ण क्षण में न्यायपालिका की बागडोर संभालने वाले पहले मुख्य न्यायाधीश थे - न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया।
26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के साथ ही भारत गणराज्य बना, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय औपचारिक रूप से इसके दो दिन बाद, 28 जनवरी 1950 को अस्तित्व में आया। उसी दिन न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया ने भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ ली। उद्घाटन समारोह 28 जनवरी 1950 को पुराने संसद भवन के चैंबर ऑफ प्रिंसेस में सुबह 9:45 बजे हुआ, जहां न्यायमूर्ति कानिया और अन्य न्यायाधीशों ने भाग लिया।
न्यायमूर्ति कानिया का जन्म 3 नवंबर 1890 को गुजरात के सूरत में हुआ था। उन्होंने भावनगर के समालदास कॉलेज से बी.ए. और बॉम्बे के गवर्नमेंट लॉ कॉलेज से एलएल.बी. और एलएल.एम. की पढ़ाई पूरी की।
1915 में उन्होंने बॉम्बे हाई कोर्ट में वकालत शुरू की और बाद में एक्टिंग जज, एडिशनल जज और स्थायी जज के रूप में सेवा दी। 1946 में उन्हें फेडरल कोर्ट ऑफ इंडिया का जज बनाया गया, जो बाद में सुप्रीम कोर्ट की नींव बना।
न्यायमूर्ति कानिया ने सुप्रीम कोर्ट की प्रारंभिक कार्यप्रणाली, अनुशासन और संविधान के प्रति सम्मान की नींव रखी। उनका कार्यकाल 28 जनवरी 1950 से शुरू हुआ और 6 नवंबर 1951 तक चला, जब वे अपने पद पर थे तभी उनका निधन हो गया था। इस तरह वे न केवल पहले CJI बने, बल्कि पद पर रहते हुए निधन होने वाले पहले CJI भी बने।
आज, जब हम 13 अगस्त 2026 को खड़े हैं, उस समय की यह घटना हमें याद दिलाती है कि संविधान लागू होते ही न्यायपालिका को मजबूत आधार देने की कितनी दूरगामी सोच थी। न्यायमूर्ति कानिया की भूमिका ने यह सुनिश्चित किया कि सुप्रीम कोर्ट एक स्वतंत्र, सम्मानित और प्रभावी संस्था के रूप में स्थापित हो।
वोटर, राजनीति में रुचि रखने वाले और UPSC/PCS के छात्र इस घटना से यह समझ सकते हैं कि न्यायपालिका की स्थापना केवल एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह लोकतंत्र की रक्षा और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा का पहला कदम था। न्यायपालिका की स्वतंत्रता और उसकी संरचना की नींव न्यायमूर्ति कानिया के समय में ही रखी गई थी।
न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारतीय लोकतंत्र का एक महत्वपूर्ण स्तंभ है। न्यायमूर्ति कानिया के कार्यकाल में स्थापित की गई प्रक्रियाएं आज भी न्यायिक सुधारों और संवैधानिक विवादों के समाधान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। यह स्वतंत्रता सुनिश्चित करती है कि न्यायपालिका सरकार के अन्य अंगों से स्वतंत्र रहकर निष्पक्ष निर्णय ले सके।
न्यायमूर्ति कानिया की विरासत आज भी भारतीय न्यायपालिका में जीवित है। उनके द्वारा स्थापित अनुशासन और कार्यप्रणाली ने न्यायपालिका को एक मजबूत और स्वतंत्र संस्था के रूप में स्थापित किया। यह विरासत आज भी न्यायिक सुधारों और संवैधानिक विवादों के समाधान में मार्गदर्शन करती है।
न्यायमूर्ति हरिलाल जे. कानिया ने 28 जनवरी 1950 को भारत के पहले मुख्य न्यायाधीश के रूप में शपथ लेकर न्यायपालिका की नींव रखी। उनका जीवन, करियर और कार्यकाल आज भी हमें याद दिलाता है कि संविधान लागू होते ही न्यायपालिका को मजबूत और स्वतंत्र बनाने की दूरदर्शिता कितनी महत्वपूर्ण थी। इस ऐतिहासिक घटना का असर आज भी न्यायपालिका की संरचना और लोकतंत्र की रक्षा में गहराई से महसूस किया जाता है। न्यायमूर्ति कानिया की विरासत भारतीय न्यायपालिका के लिए एक प्रेरणा स्रोत बनी हुई है।